छठ पूजा के दूसरे दिन होता है खरना, जानिये महत्व, व्रत विधि और नियम

छठ महापर्व का शुभारंभ हो गया है. कार्तिक शुक्ल षष्ठी तिथि को छठ महापर्व मनाया जाता है और पंचमी तिथि को खरना मनाया जाता है, जो कि इस साल 19 नवंबर 2020 बुधवार है. छठ पूजा चार दिनों का पर्व है. पहले दिन नहाय खाय होता है और दूसरे दिन खरना होता है. खरना के दिन को व्रती महिलाएं छोटी छठ भी कहती हैं, क्योंकि आज भी व्रत रखना होता है.

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पूरे दिन निर्जला व्रत रखने के बाद शाम में महिलाएं गुड़ की खीर (जिसे रसियाव भी कहा जाता है) बनाकर अपना व्रत खोलती हैं. छठ पूजा में इस दिन का खास महत्व है. यहां हम आपको बता रहे हैं कि खरना पूजन और व्रत की क्या विधि होती है और इसका क्या महत्व है. सबसे पहले जानिये इसका क्या महत्व होता है

छठ पूजा: खरना का महत्व

छठ पूजा के दूसरे दिन खरना की विधि होती है.

दरअसल, इसे खरना इसलिए भी कहा जाता है क्योंकि इसके एक दिन पूर्व ही नहाय खाय के दिन व्रती महिला या पुरुष एक समय का भोजन कर अपने शरीर और मन को शुद्ध करना शुरू कर देते हैं, जिसकी पूर्णता अगले दिन होती है. इसीलिए इसे खरना कहा जाता है.

इस दिन व्रती को पूरे दिन का निर्जला उपवास रखना होता है. शाम को गन्ने का जूस या गुड़ के चावल या गुड़ की खीर का प्रसाद कूल देवता, छठी माता और सूर्य भगवान को चढ़ाया जाता है और बांटा जाता है. यही प्रसाद व्रती महिलाएं भी खाती हैं. खरना को कुछ जगहों पर छोटकी छठ भी कहा जाता है. क्‍योंकि 36 घंटे का व्रत शुरू होने वाले व्रत से ठीक पहले होता है. इसके बाद से ही 36 घंटे का कठिन निर्जला व्रत शुरू हो जाता है.

खरना व्रत विधि:

1. खरना के दिन व्रती महिला या पुरुष स्नान कर सूर्य को जल चढ़ाते हैं.

2. छठ माता का ध्यान कर व्रत आरंभ करते हैं और सूर्य देवता व छठ माता से प्रार्थना करते हैं कि इस कठिन व्रत को करने की उन्हें शक्ति प्रदान करें.

3. इसके बाद रोजाना जिस प्रकार पूजन करते हैं, उसी प्रकार भगवान गणपति, भगवान शंकर और मां पार्वती की पूजा करें और तुलसी मां को अर्घ्य दें.

4. शाम के समय साफ मिट्टी के चूल्हे पर रसियाव यानी कि गुड़ की खीर बनाएं.

5. ध्यान रहे कि रसियाव लकड़ी के आग पर ही बनाई जाती है. अगर लकड़ी आम की हो तो और भी उत्तम होती है. खरना का प्रसाद पीतल के पात्र या बर्तन में ही बनता है.

6. खीर बनाने के बाद इसे सबसे पहले अपने कूलदेवता, छठी मइया और भगवान सूर्य को चढ़ाएं.

7. इसके बाद व्रती इस प्रसाद को खुद ग्रहण करती है.

8. ध्यान रहे कि व्रती के खाने के बाद ही इस प्रसाद को घर के बाकी लोग ग्रहण करते हैं.

9. इसे खाने के बाद और पानी पीने के बाद व्रती कुछ भी नहीं खास सकती. इसके बाद से ही छठ व्रत का दूसरा चरण शुरू हो जाता है, जो 36 घंटे का होता है.

10. इस व्रत का पारण चौथे दिन उगते सूर्य को अर्घ्य देने के बाद ही होता है.

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