बिहार विधानसभा चुनाव को लेकर सभी राजनीतिक पार्टियां जुटे गठबंधन की तैयारियों…

प्रदेश में विधानसभा चुनाव हालांकि अभी कई महीने दूर है, लेकिन सत्तारूढ़ खेमा मानो किसी जोखिम के लिए गुंजाइश छोडऩा नहीं चाहता। भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह की गुरुवार को वैशाली में हुई सभा ऐसे तो नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) के समर्थन में थी, लेकिन मंच से बिहार के चुनाव को साधा गया।

शाह ने बिना किसी लाग-लपेट के यह एलान किया कि बिहार की चुनावी जंग में राजग का सारथी कोई और नहीं, बल्कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ही होंगे। शाह इससे पहले भी एकाधिक बार नीतीश की अगुआई में चुनाव लडऩे की बात कह चुके हैं। ऐसे में वैशाली के सार्वजनिक मंच से इस बात को दोहराने के राजनीतिक मायने और संदेश भी हैं। इसे विपक्ष पर मनोवैज्ञानिक बढ़त बनाने की कवायद के तौर पर भी देखा जा रहा है।

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पहले दौर में एनडीए आश्वस्त, महागठबंधन में हलचल तेज

चुनाव अभी दूर बेशक है, लेकिन पक्ष और विपक्ष दोनों ओर से पेशबंदियों का सिलसिला अचानक से तेज होता दिखाई दे रहा है। खासकर विपक्ष के महागठबंधन में हलचल ज्यादा तेज है। वहां दो सवालों को लेकर रस्साकशी का दौर शुरू भी हो चुका है।

पहला तो सीटों को लेकर और दूसरा प्रश्न यह कि आखिर महागठबंधन की अगुआई कौन करेगा। कांग्रेस का मानना है कि पिछले चुनाव में चूंकि जदयू विपक्षी गठबंधन का हिस्सा था, इसलिए उसने कम सीटों पर संतोष कर लिया। इस बार उतनी सीटों से काम नहीं चलने वाला है।

मकर संक्रांति में सियासी रही विपक्ष की चूड़ा-दही पार्टी

मकर संक्रांति के मौके पर सदाकत आश्रम में कांग्रेस के चूड़ा-दही भोज के बाद पार्टी के कुछ वरिष्ठ नेताओं ने इस बात के साफ संकेत भी दिए। उसका कहना है कि राजद विपक्षी खेमे का सबसे बड़ा दल बेशक है, लेकिन इस बार कांग्रेस ज्यादा सक्रिय होकर चुनाव मैदान में उतरेगी।

पार्टी के अंदरखाने एक तर्क यह भी दिया जा रहा है कि कांग्रेस को गठबंधन की अगुआई का पुराना अनुभव है और इसका कई बार व कई स्थानों पर सफलतापूर्वक प्रयोग भी हो चुका है। ऐसे में उसके पास मुख्यमंत्री पद के प्रत्याशी के लिए चेहरों की भी कोई कमी नहीं है। जाहिर है कि नेतृत्व का प्रश्न उछालकर कांग्रेस किसी और पर नहीं, बल्कि राजद नेता तेजस्वी यादव पर दबाव बना रही है।

सीटों और नेतृत्व पर जारी है संशय की स्थिति

कुछ इसी प्रकार की बातें महागठबंधन के एक अन्य घटक हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा (हम) के अध्यक्ष जीतनराम मांझी भी कर रहे हैं। मांझी तो लोकसभा चुनाव के बाद से ही तेजस्वी के नेतृत्व पर सवाल उठाते रहे हैं। वह इस बार सीट भी कहीं ज्यादा मांग रहे हैं। फिर यह तो कांग्रेस और मांझी की ही बात है।

रालोसपा और विकासशील इंसान पार्टी (वीआइपी) जैसे घटकों का मुंह खोलना तो अभी बाकी है। महत्वाकांक्षा किसी की भी कम नहीं है। रालोसपा अध्यक्ष उपेंद्र कुशवाहा अभी हाल में विपक्ष के दो आयोजनों में समन्वयक की भूमिका निभा चुके हैं। जाहिर है कि कुशवाहा हम और वीआइपी जैसे घटकों से कहीं बढ़-चढ़कर पाना चाहेंगे।

स्पष्ट है कि महागठबंधन में अभी तमाम चीजें तय होनी बाकी है। कांग्रेस को इस बार कितनी सीटें मिलेंगी; हम और वीआइपी कितना पाएंगी; रालोसपा कितने भर से संतुष्ट होगी आदि आदि तमाम सवालों के जवाब फिलहाल तो किसी के पास नहीं हैं।

क्या जेल से लालू सुलझा सकेंगे महागठबंधन की गुत्थी

खुद तेजस्वी भी इस बात को स्वीकार करते हैं कि अभी ये सारे मुद्दे तय नहीं हुए हैं। अस्पष्टता और अनिर्णय की इस स्थिति में विपक्ष की दिक्कत इसलिए भी बड़ी दिखाई दे रही है, क्योंकि उसके सबसे बड़े रणनीतिकार और राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव जेल में हैं।

ऐसे में अभी यह देखना बाकी है कि लालू जेल के अंदर रहकर इन तमाम गुत्थियों को आखिर कैसे सुलझाते हैं। ध्यान रहे कि लोकसभा चुनाव में लालू ने जेल के अंदर से विपक्ष का मोर्चा सजाया था, लेकिन चुनाव में उसका प्रदर्शन बेहद निराशाजनक रहा।

एनडीए अपने कील-कांटे को दुरुस्त करने में लगा

विपक्ष की इस उलझन और ऊहापोह के बीच राजग अपने कील-कांटे दुरुस्त करने में लग गया है। यह ठीक है कि सीटों का सवाल तो अभी वहां भी हल नहीं हुआ है। साथ ही इशारों में ही सही, चिराग पासवान के नेतृत्व वाली लोजपा ने अपनी मांग सामने रखनी शुरू कर दी है।

फिर भी राजग के भरोसेमंद सूत्रों का कहना है कि यहां न तो अहं का कोई टकराव है और न ही सीटों को लेकर खींचतान जैसी कोई स्थिति आने वाली है। सब कुछ मिल-बैठकर दोस्ताना माहौल में तय होगा। जहां तक नेतृत्व का प्रश्न है तो बिहार में नीतीश कुमार का नाम निर्विवाद रूप से सभी को स्वीकार्य है।

अब एनडीए में निर्विवाद है नीतीश का चेहरा 

राजग के एक वरिष्ठ नेता तो यहां तक कहते हैं कि नीतीश की प्रामाणिकता पर राजग क्या, विपक्ष को भी शायद ही कोई संदेह हो। जाहिर-सी बात है कि वैशाली में भाजपा के मंच से अमित शाह ने नीतीश के नाम का एलान शायद यही संदेश देने के लिए किया कि विपक्ष जहां अभी सीट और नेतृत्व जैसे सवालों को लेकर उलझा हुआ है, वहीं राजग में सारी चीजें साफ-साफ और निर्विवाद हैं।

चुनाव से पहले इस तरह के संदेश का अक्सर सकारात्मक परिणाम सामने आता रहा है। ऐसे में फिलहाल इतना तो कहा ही जा सकता है कि चुनावी जंग से पहले राजग बिहार के मतदाताओं तक संदेश पहुंचाने में बाजी मारता दिखाई दे रहा है।

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