तीसरी लहर से पहले यूपी के 3.16 करोड़ बच्चों पर खसरे का खतरा, WHO ने जारी की नई गाइडलाइन

कोरोनावायरस महामारी की संभावित तीसरी लहर से पहले उत्तर प्रदेश के 3.16 करोड़ बच्चों पर खसरे (मीजल्स) का खतरा है। इन बच्चों का टीकाकरण भी नहीं पाया है। दोनों घातक बीमारियों के लक्षणों में समानता भी है। ऐसे में दोनों बीमारियों की पहचान में कंफ्यूजन खड़ा हो गया है। इस बीच WHO ने एक नई गाइड लाइन जारी की है। स्वास्थ्य विभाग को बच्चों की ट्रेसिंग के साथ उनका स्वैब टेस्ट कराने की सलाह दी है। साथ ही जिस इलाके में खसरे का केस मिले, उस पूरे इलाके को कंटेनमेंट जोन बनाया जाए।

संक्रमण के दोहरे संकट में बच्चे
मेरठ में डब्लूएचओ की कोडिर्नेटर डॉ. प्रिया के अनुसार कोरोना के बाद दोनों बीमारियों की पहचान का संकट खड़ा हो गया है। मीजल्स, रुबेला के प्रारंभिक लक्षण कफ, कोल्ड, बुखार, आंखों में सूजन है। कोरोना में भी यही लक्षण होते हैं। महामारी के माहौल में डॉक्टर कफ, कोल्ड, बुखार के लक्षण देखते ही उसे कोरोना मानकर आरटीपीसीआर, एंटीजन की सलाह देते हैं। जबकि ये लक्षण मीजल्स के भी हो सकते हैं। इस ओर डॉक्टर ध्यान नहीं दे रहे जो बड़े खतरे का संकेत है। ऐसे में बच्चे को मीजल्स है मगर इलाज कोरोना का होगा। समय पर सही बीमारी पकड़ में नहीं आएगी।

डॉ. प्रिया ने बताया कि मीजल्स, रुबेला भी कोरोना जैसे संक्रामक बीमारी है, जो तेजी से स्प्रेड होती है। हर जिलों में सर्विलांस बढ़ाने, रिपोर्टिंग सिस्टम दुरुस्त रखने का आदेश दिया है। ताकि संक्रमण का जल्द पता लग सके। अगर किसी इलाके में बच्चे में मीजल्स का संक्रमण मिलता है तो उस पूरे इलाके को कंटेनमेंट जोन बनाकर वहां वैक्सीनेशन ड्राइव चलाकर दूसरे बच्चों को सुरक्षित करना होगा। हर बच्चे की स्वैब टेस्टिंग की जाएगी।

डॉक्टरों को खांसी, जुकाम, बुखार के बच्चों के एंटीजन या RTPCR से पहले उनके शरीर पर लाल निशानों को जांचना होगा। अगर किसी बच्चे में बुखार, खांसी के साथ शरीर पर लाल चकत्ते या रेशेस मिलते हैं तो उसका मीजल्स स्वैब टेस्ट कराना होगा। जिला मुख्यालयों पर मीजल्स स्वैब सैंपल की जांच होगी। रेशेस नहीं है तो ही RTPCR और एंटीजन टेस्ट होगा।

WHO की नई गाइडलाइन

  • स्वास्थ्य विभाग किसी भी बच्चे को टीकाकरण से न छोड़े।
  • बच्चों की ट्रेसिंग कर अधिकतम बच्चों का स्वैब टेस्ट कराएं।
  • बच्चे में मीजल्स संक्रमण मिलने पर तुरंत उपचार दें।
  • जिस इलाके में केस आया पूरे इलाके को कंटेनमेंट जोन बनाया जाए।
  • कंटेनमेंट जोन में हर बच्चे का वैक्सीनेशन प्रॉपर किया जाए।
  • कोरोना और मीजल्स के लक्षणों की सही तरीके से पहचान की जाए।
  • ज्यादा से ज्यादा सैंपल लेकर उन्हें जांच के लिए भेजें और रिपोर्टिंग करें।
  • कफ, खांसी, बुखार देखकर केवल कोरोना संक्रमण न माना जाए बल्कि बच्चे की स्वैब जांच कराएं।
  • रुटीन टीकाकरण को भी बढ़ाया जाए।

टीकाकरण न होने से बढ़ा मीजल्स, रुबेला का खतरा
नियमित टीकाकरण समय पर न होने के कारण बच्चों में मीजल्स, रुबेला का खतरा बढ़ा है। प्रदेश में शून्य से 6 साल आयु के कुल 3,16,24,628 बच्चे हैं। इनमें 1,65,09,033 बालक और 1,51,16,595 बालिकाएं हैं। वहीं, मेरठ में 17,333 शिशुओं और 19 हजार गर्भवती महिलाओं को रुटीन टीका नहीं लगा है। एएनएम मुख्य तौर पर रुटीन टीकाकरण करती हैं, मगर महामारी में एएनएम पर कोरोना किट वितरण से लेकर अन्य जिम्मेदारियां थी। इसके चलते टीकाकरण नहीं हुआ। 12 से 24 महीने के नवजात बच्चों को दो महीने, चार महीने, नौ महीने के अंतराल पर सुरक्षा टीके लगते हैं। जन्म से एक साल के अंदर बच्चे को 7 बार टीका लगता है। जो कोरोना के कारण नहीं लग सके।

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