मिशन 2022 : क्या रायबरेली में फेल हो रही है प्रियंका वाड्रा की रणनीति


रायबरेली ।उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के एकमात्र गढ़ रायबरेली से अब पार्टी की ज़मीन खिसकती जा रही है।हालिया पंचायत चुनावों के परिणाम कमोबेश इस ओर ही इशारा कर रहे हैं।ऐसे में एक सवाल लोगों के मन मे उठ रहा है कि क्या प्रियंका वाड्रा की रणनीति यहां फेल हो रही है या कारण कुछ और है। कांग्रेस कार्यकर्ताओं में निराशा और पार्टी संगठन की सीमित होती सक्रियता रायबरेली में कांग्रेस के अनिश्चित भविष्य का संकेत कर रहे हैं।इससे एक बात तो तय है कि रायबरेली में कांग्रेस की राह अब इतनी आसान होने वाली नहीं है। राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो कांग्रेस के गढ़ में उसकी हालत खराब है,इसके कई कारण हो सकते हैं।बावजूद इसके सोनिया और प्रियंका का यहां से जमीनी संवाद न होना प्रमुख है,जिससे मूल कार्यकर्ता अपनी बात नहीं रख पाता और समस्या हल न होने से घर बैठता है या अन्य दलों की ओर रूख करता है।जिसका असर यह होता है कि पार्टी लगातार यहां कमजोर हो रही है’। प्रदेश में कांग्रेस को मजबूती देने के लिए संगठन सृजन अभियान चलाया गया जिसमें दावा किया गया कि बूथ स्तर तक पार्टी मजबूत हुई है, जबकि रायबरेली में इसकी हकीकत कुछ और है।हालात यह हो गई कि पार्टी ब्लॉक प्रमुख चुनाव में अपने प्रत्याशी ही नहीं तय कर पाई,नतीजा यह हुआ कि पार्टी समर्थकों को अन्य दलों की गोद मे बैठना पड़ा।इसके पहले जिला पंचायत अध्यक्ष के चुनाव में पार्टी को समाजवादी पार्टी का समर्थन मिला बावजूद इसके वह चुनाव में हार गई।यहां यह ध्यान देने वाली बात है कि जिला पंचायत अध्यक्ष की जिम्मेदारी प्रियंका वाड्रा ने ले रखी थी।इसके बावजूद जिस तरह उम्मीदवार के चयन में देरी और रणनीतिक विफलता हुई वह कई सवाल खड़े करता है।पंचायत चुनावों का परिणाम यह हुआ कि कभी जिला पंचायत पर दशकों से काबिज़ कांग्रेस को यह सीट नही मिली और पूरे जिले के 18 में एक भी ब्लॉक पर पार्टी चुनाव तक नही लड़ पाई।कभी इंदिरा और सोनिया गांधी का मजबूत किले रायबरेली से गांधी परिवार की जमीन खिसकती जा रही है।


रायबरेली में प्रियंका वाड्रा राजनीति में आने से पहले ही सक्रिय रही हैं।यहां के संगठन में उनका सीधा हस्तक्षेप होता है।2019 और 20 में रायबरेली में पार्टी संगठन को लेकर प्रशिक्षण कार्यक्रम भी चलाया गया और जिले में पार्टी को मजबूत करने की कोशिश भी शुरू हुई,लेकिन नतीजा कुछ भी नहीं निकला।मज़ेदार बात यह है कि भाजपा और प्रधानमंत्री पर प्रियंका हमलावर रहती है जबकि उनके स्थानीय संगठन के नेता हमेशा भाजपा से रक्षात्मक ही रहते हैं।इसका नतीजा यह है कि ज़मीन पर पार्टी लगातार अपना जनाधार खो रही है।पार्टी के दोनों विधायक शुरू से बागी रवैया अपनाये हैं बावजूद इसके पार्टी के पास रायबरेली में कोई बड़ा चेहरा नहीं आ पाया।कई पुराने कांग्रेसी भी बागी हो रहे हैं और अन्य दलों में अपना भविष्य तलाश रहे हैं।इसी का परिणाम था कि जिला पंचायत में हार हुई और ब्लॉक प्रमुख के चुनाव में कांग्रेस चुनाव में ही नही उतरी।प्रियंका वाड्रा की रणनीति शायद रायबरेली में सफल नही हो पा रही है जिससे 2022 के चुनाव में कांग्रेस को काफ़ी मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है।रायबरेली की राजनीति को लंबे समय से समझनेवाले रविन्द्र सिंह चौहान का कहना है कि ‘जनता और कांग्रेस हाईकमान के बीच पहले जैसा संवाद अब नहीं रहा, जिसका असर यह हुआ कि बीच मे कुछ लोग आ गए और कार्यकर्ता पार्टी से अलग थलग होते गए’। जिससे कांग्रेस पार्टी बिल्कुल कमजोर होती दिख रही है देखना है कि प्रियंका गांधी पार्टी को कितना मजबूत कर पाएगी।

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