बाँदा : आधुनिकता की चकाचौंध में गुम हुईं झूले की पेंग और सावनी गीतों की बहार

िहंदू धर्म के त्यौहारों का मतलब अब िसर्फ मौज-मस्ती का दिन

बांदा। डिजिटलीकरण के बीच आधुनिक भारत में ने ऐसी करवट ली है कि समूचा समाज परंपराओं को भूल कर पाश्चात्य सभ्यता को अपनाने की होड़ में फंस कर रह गया है। एक समय था जब सावन माह की शुरूआत के साथ ही घर के आंगन और खेतों मंे लगे पेड़ झूलों से सज जाते थे और महिलाएं व युवतियां सावनी गीतों के साथ झूले की पेंग बढ़ाती थी। लेकिन बदलते परिवेश में जहां कच्चे मकानों के आंगन की जगह बहुमंजिला इमारतों ने ले ली है, वहीं पेड़ों को काटकर लोगों ने कंक्रीट के मकान खड़े दिए हैं। हालांकि अब भी ग्रामीण क्षेत्रों में युवतियां महज रस्म अदायगी के लिए ही सही सावन के महीने में झूला झूलने की पंरपरा को जीवित रखने का प्रयास करती है, लेकिन शहरी क्षेत्रांें में तो झूले की पेंग और सावनी गीतों की बहार अब बीते जमाने की बात बन कर रह गई है।

सावन के पवित्र माह को प्राकृतिक सौंदर्य और धार्मिक अनुष्ठानों से जोड़ कर देखा जाता है। हालांकि वर्षा ऋतु की खूबियां अब किताबों व इंटरनेट तक ही सीमित रह गया है। आधुनिकता की दौड़ में इंटरनेट और मोबाइल युग ने ऐसा कब्जा जमाया है कि समाज में प्रकृित के साथ जीने की परंपरा पर ब्रेक ही लग गया है। प्राकृतिक सौंदर्य और धार्मिक अनुष्ठानों के साथ ही सावन के माह में झूला और सावनी गीतों की बहार का भी अपना खास महत्व रहा है, लेकिन आधुनिकता की दौड़ में जहां प्रकृति के सौंदर्य में कमी आई है, वहीं सावन में झूला झूलने की परंपरा भी समय के साथ ही दम तोड़ती जा रही है। अब तो गांव के लेकर शहर तक पेड़-पौधों के जंगल का स्थान कंक्रीट की बहुमंजिला इमारतों ने ले ली है और बाग-बगीचे भी गिनती के ही बचें हैं। हालांकि दो दशक पहले तक सावन का महीना बिना मेंहदी सजाए और झूले की पेंग लगाए पूरा ही नहीं होता था, लेकिन तेजी से बदलते समय के साथ परंपराओं का खासा हृास हुआ है।

अब तो घर की छत या आंगन पर रेडीमेड झूले को झूलकर ही मन को संतुष्ट किया जा रहा है। गांव की बुजुर्ग महिलाएं बताती हैं कि सावन के महीने में पूरे गांव की युवतियां ससुराल से मायके आ जाती थीं और पेड़ों की डाल पर झूला डालकर झूलती थीं। सावनी गीतों के बीच झूला झूलने की परंपरा अब बीते जमाने की बात हो गई है। इसके पीछे लोग जगह और समय के आभाव को बड़ा कारण मानते हैं। पहले हर घर के आंगन या दरवाजे पर बड़े पेड़ होना स्टेटस सिंबल हुआ करते थे, लेकिन अब इसकी जगह कारों ने ले ली है। वहीं शहरी इलाकों की बात करें तो शहरों मंे तो जगह व समय की कमी परंपराओं के निर्वहन में बड़ी बाधा बन गई है। चिल्ला क्षेत्र के पदारथपुर गांव के अनिरुद्ध तिवारी बताते हैं कि पाश्चात्य सभ्यता को अपनाने की होड़ में हम अपनी सामाजिक मान्यताआें और परंपराओं को भूलते जा रहे हैं और आधुनिकता की दौड़ में आगे निकलने की होड़ में खो गए हैं। कहते हैं कि गांवों में तो फिर भी परंपराआंे की रस्म अदायगी हो जाती है, लेकिन शहरी लोग तो धार्मिक मान्यताओं और परंपराओं को ओल्ड फैशन मानकर छोड़ते जा रहे हैं।

झूला झूल कर रस्म निभाती हैं शहरी महिलाएं

ऐसा नहीं है कि अब युवतियों में झूला झूलने का शौक खतम हो गया है, लेकिन इसे फैशन के दौर बाहर मानकर गांव और खेतों में झूलने की परंपरा जरूर दम तोड़ चुकी है। फैशन की होड़ में युवतियां अब होटलों और रेस्टोरेंटों में आधुनिक झूलों को सेल्फी प्वाइंट के रूप में स्थापित किया गया है, जहां महिलाएं और युवतियां झूले पर बैठकर महज सेल्फी ही खींचकर शौक पूरा करती हैं। हालांकि पुराने जमाने में सावन के महीने को झूला और सावनी गीतों के लिए खास माना जाता था। सावन के महीने में तो शादीशुदा महिलाएं भी ससुराल से मायके आकर झूले का आनंद लेती थी और सावनी गीतों की बहार के बीच नागपंचमी व रक्षाबंधन का त्यौहार मनाती थीं। लेकिन आधुनिकता की दौड़ परंपराएं कहीं पीछे छूट गईं। अब तो परंपराएं महज रस्म अदायगी तक सिमट कर रह गई हैं। शहरों में महिलाएं सामूहिक कार्यक्रम करके झूला व सावनी गीतों की रस्म निभा कर संतुष्ट हो लेती हैं।

झूला और सावनी गीतों के बिन अधूरा है सावन

भाजपा महिला मोर्चा की जिलाध्यक्ष वंदना गुप्ता बताती हैं कि सावन का पावन महीना झूला, मेंहदी और सावनी गीतों के बगैर अधूरा लगता है, लेकिन शहरी परिवेश में न तो झूला झूलने की जगह बची है और न ही पहले जैसी उमंग ही रह गई है।हालांकि परंपरागत तरीके से सावन की खुशियां मनाने की बात तो अब गुजरे जमाने की कहानी हो गई है, लेकिन शहरी परिवेश में महिलाओं की टोलियां समूह में एकत्र होकर सावन महोत्सव का आयोजन करतीं हैं और घरों और रेस्टोरेंटों में आधुनिक झूला डालकर रस्म अदायगी कर लेती हैं। अब तो हर त्यौहार को मौज मस्ती के दिन की तरह मनाया जाने लगा है।

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