फतेहपुर : माफियाओ के मकड़जाल में उलझा प्रशासन, जांचे अटकी कार्रवाई लटकी

दैनिक भास्कर ब्यूरो

फतेहपुर । माफियाओ को लेकर योगी सरकार की सख्ती राजस्वकर्मियों के खेल के आगे औंधे मुंह गिरती नज़र आ रही है। जिले में शीर्ष ईमानदार नेतृत्व होने के बावजूद माफियाओं की जांचे क्यों अटकी पड़ी हैं यह किसी को समझ नहीं आ रहा है। बताते हैं जिलाधिकारी के अथक प्रयास भी राजस्वकर्मियों की कलंदरी के आगे बौने साबित पड़ रहे हैं। करोड़ों की अवैध संपत्ति बनाने वाले या ये कहें की भूमाफियाओं के चमचे बन चुके इन राजस्वकर्मियों से कोई जांच समय से हो जाये ये सम्भव ही नहीं है। चर्चा तो ये भी है कि कुख्यात भूमाफियाओं ने जांचों के नाम पर अपने पालतू कर्मियों के माध्यम से मामलों में अंदरखाने से सेटिंग की है तभी तो अरबो की संपत्ति वाले माफियाओ की महज एक आध करोड़ की संपत्ति कुर्क होना किसी के गले नही उतर रहा है।

शहर के अधिकतर तालाबो को बेचकर खा गए भूमाफिया

बताते हैं ये माफिया जिलाधिकारी के तबादले तक मामले को धीमी गति से या ठंडे बस्ते में डालने की फिराक में हैं ताकि बड़ी मुसीबत से बचा जा सके। इनकी अधिकतर जांचे कहीं हाईकोर्ट के नाम पर तो कहीं राजस्व परिषद के नाम पर अधर में लटकी हुई हैं। हाईकोर्ट व राजस्व परिषद में प्रशासन की तरफ से तेज गति से पैरवी न होने की वजह से माफियाओ को खासी राहत मिलती नज़र आ रही है। वर्षों से सरकारी जमीनों में कब्जा किये माफिया जांचों को लम्बे समय तक लटकाने के प्रयास में लगातार लगे हुए हैं।

अरबों की जुटाई संपत्ति, कुर्क हुई महज कुछ अंश

आपको बता दें कि हाल ही में जिले के कई भूमाफियाओं, गोतस्करों, शराब माफियाओ, बदमाशों के खिलाफ गैंगेस्टर की कार्रवाई की गई है जिनमे गैंगेस्टर की धारा के अनुसार एजाज बॉक्सर, रजा मोहम्मद, राकेश सिंह व आबिद हसन आदि की नाजायज तरीके से कमाई गई संपत्ति को भी कुर्क किया गया है। जिसमे पहले दिन से ही सवाल उठ रहा है जब प्रयागराज के अतीक अहमद के गैंग में 100 से ऊपर अभियुक्त हो सकते हैं मुख्तार अंसारी के गैंग में 100 से ऊपर अपराधी हो सकते हैं तो जिले के कुख्यात माफिया जो स्वयं 100 नम्बर के टैग से जाना जाता है उसके गैंग में महज 3 या 4 अभियुक्त होना पुलिस व जांच टीम की मिलीभगत को स्पष्ट दर्शाता है जबकि पूरा जनपद जानता है कि ज्वालागंज का सरकारी तालाब बेचने वाला कौन था, सैय्यडवाड़ा के तालाब का एक तिहाई हिस्सा मुस्सू ने बेच डाला उसके पीछे कौन था। लखनऊ बाईपास के किनारे सड़क के ऊपर बेशकीमती कई बीघे सरकारी जमीने बेचने वाले कौन थे।

भूमाफियाओं के इशारे पर नाचते हैं शहर के राजस्व कर्मी

तेलियानी ब्लॉक के सामने सरकारी भूमि बेचने वाले कौन थे, बिसौली में सरकारी जमीन बेचने वाले कौन थे, वीआईपी रोड में बीजेपी का झंडा लगाकर शत्रु संपत्ति की जमीन बेचने वाले कौन थे। लगभग ढाई दशक से हिस्ट्रीशीटर होने के बावजूद पुलिस व जांच टीम ने महज कुछ वर्षों की संपत्ति को कुर्क करके पल्ला झाड़ लिया जबकि जो ब्यक्ति लगभग ढाई दशक से अपराध की दुनिया से जुड़ा हो तो उसके और उसके करीबियों की ढाई दशक के अंदर की अर्जित संपत्ति भी कुर्की की प्रक्रिया में आनी चाहिए थी। लेकिन बताते हैं इस माफिया का मकड़जाल इतना मजबूत है कि इसके गुर्गे पुलिस, राजस्व, वकील, पत्रकार आदि सभी जगह हैं जो इसके लिए रुपया लेकर नौकर की तरह काम करते हैं।

राजस्वकर्मियों ने भी बनाई अकूत संपत्ति, करोड़ों के मालिक हैं कई राजस्वकर्मी व निरीक्षक

हाल ही में संपत्ति कम दिखाने व गैंगेस्टर के गैंग में टीम के गुर्गों का नाम बचाने की एवज में राजस्व व पुलिस के एक इंस्पेक्टर का नाम ख़ासा चर्चा में रहा जिसने नीचे से ऊपर तक का मैनेजमेंट किया। ऐसे में सवाल उठता है कि ऐसी टीम जो माफियाओ के इशारे पर नाच रही थी उसके अपराधों को छुपाने में लगी थी क्या वह भी गैंग की श्रेणी में नहीं आती, जवाब पाठकों पर छोड़ता हूँ। जबकि कुछ माह पूर्व गैंगेस्टर की कार्रवाई के पूर्व तक जिले के दर्जनों लोग यहां तक की कई सत्ताधारी, माफिया के यहां जीहुजूरी करने जाते थे। बताते हैं अगर सिर्फ माफिया और उसके करीबियों के मोबाइल नम्बरो की कॉल डिटेल गैंगेस्टर की जांच में शामिल कर ली जाए तो इनके गैंग के असल लोग जिनमे पुलिस से सम्बंधित, प्रशासनिक ब्यवस्था से जुड़े लोग, ऐसे वकील, ऐसे पत्रकार व डी 2 गैंग से जुड़े रिश्ते खुदबखुद सामने आ जाएंगे जिससे जांच टीम को इनका गैंग स्पष्ट करने में आसानी होगी।

एक दर्जन भ्रष्ट राजस्वकर्मियों की बन रही सूची

माफियाओं को सरकारी जमीनों में कब्जा दिलाने में मदद करने वाले, अवैध तरीके से करोड़ों की संपत्ति जुटाने वाले भ्रष्ट लेखपालों की जांच अंदरखाने से शुरू हो गई है। सूत्र बताते हैं प्रथम चरण में ऐसे एक दर्जन भर शहर व नगर क्षेत्र में काम करने वाले राजस्वकर्मियों की सूची बनकर तैयार हो गई है जो पूर्व में माफियाओ के सारथी बनकर काम कर रहे थे जिन पर बड़ी कार्रवाई भी हो सकती है।

न्यायालय के आदेशों में भी हुआ जमकर खेल

भूमाफियाओं ने शत्रु संपत्ति, सरकारी जमीनों में कब्जा करने का गजब तरीका खोज रखा था। जमीनों पर सीधे कब्जा न करके दो गुर्गों से राजस्व न्यायालय में वाद दाखिल करवाते थे एक गुर्गा किसी फर्जी वसीयत या अन्य आधार पर अपनी जमीन बताता था जबकि दूसरा जमीदारी का एक कागज दाखिल कर अपनी दावेदारी पेश करता था। अंत मे मुकदमा किसी के पक्ष में भी हो न्यायालय के आदेश के आधार पर जमीन उनके बाप की हो जाती थी।

ऐसी जमीनों पर प्लाटिंग करके आधा शहर बस गया। ख़रीदने वाले बेचारे फंसते गए। अंत मे स्थिति ये आई कि ज्वालागंज में एक तालाब पूरा बिक गया वहां के 67 लोगों को घर खाली करने की नोटिस भी उपजिलाधिकारी कोर्ट से वर्ष भर पूर्व जारी हो चुकी है मगर प्रशासनिक लापरवाही से मामला जस का तस अटका पड़ा है। इसी तरह शहर के लगभग दो दर्जन तालाबो का अस्तित्व मिट गया मगर दशकों से किसी अधिकारी ने तालाबो को ढूढ़ने व उन्हें खाली करवाने की जहमत नही उठाई। दशकों से चल रहे जमीनों के इस खेल में जहां सैकड़ों भूमाफिया करोड़पति, अरबपति बन गए वहीँ राजस्वकर्मियों व पूर्व के राजस्व अधिकारियों ने भी खूब मलाई चाटी जिसका खामियाजा ये रहा कि आज भी शहर में सरकारी भूमि माफियाओ के कब्जे में है जबकि तहसील स्तरीय अधिकारी शासन के अनुरूप न चलकर सिर्फ अपनी नौकरी कर रहे हैं।

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