अमृत महोत्सव पर विशेष: मिटा दो जुल्मो-सितम की हस्ती यही पैगााम है, हमारा….

भास्कर समाचार सेवा

चकरनगर/इटावा। चम्बल घाटी के पानी की तासीर ही ‘बगावती’ है।इतिहास गवाह है कि ‘परिवर्तन के प्रतीक’ इस क्षेत्र के लोगों ने सदैव ही ‘अन्याय और अत्याचार’ के विरूद्ध‘हल्ला’ बोलकर भारत माता के सच्चे वीर सपूत होने के प्रमाण दिये हैं। चम्बल के रणबाॅंकुरे ने देश की आन-बान और शान के लिए समस-समय पर अपने प्राणों की आहुति देकर यह संदेश दिया है,कि ‘‘मिटा दो जुल्मो-सितम की हस्ती यही पैगााम है हमारा,हजारों बार ‘वागी’ हॅूं ;वगाावत काम है,हमारा’’।
अमृत महोत्सव के रूप में मनाये जा रही स्वाधीनता दिवस की 75 वीं बर्षगाॅठ पर भारतीय स्वाधीनता संग्राम में माॅं भारती को विदेशी आक्रांताओं के चंगुल से मुक्त कराने के लिए हॅंसते-हॅंसते अपने प्राण की आहूति देने वाले उन तमाम रणबाॅंकुरों को नमन करते हैं,जो अपनी मातृभूमि की रक्षा करने में फनाह हो गये।उन्हीं क्रान्तिकारियों के स्मृति शेष,आज हमें अपने गौरवमयी अतीत के झरोखों की ओर झाॅंकने को विवश कर रहें हैं।‘अगस्त क्रान्ति’के अवसर पर हम ‘‘क्रान्ति’’ के उन अनछुए पहलुओं को रेखांकित करते हुए गौरान्वित होते हैं।1857 की क्रान्ति में अपने योगदान से राष्टीय क्षितिज पर दैदीप्तिमान नक्षत्र के रूप में प्रकाशमान इस चम्बल घाटी के इतिहास की पृष्ठभूमि में आज हम चलते हैं,अठारहवीं शताब्दी के उन अनछुए पहलुओं की ओर;जब इटावा पर एकाधिकार को लेकर त्रिकोणात्मक संघर्ष की स्थिति थी।अबध के नव नियुक्त नवाब बजीर शुजाउद्दौला,मराठे और रूहेले इटावा पर अधिकार के लिए संघर्षरत थे।युद्ध और संधियों का दौर चलता रहा लेकिन तीनों ही शक्तियाॅं,ये न देख पायीं कि भारतीय क्षेत्रों के वास्तविक हकदार तो कोई और ही थे ? 1602 में सूरत के तट पर आये अंग्रेज व्यापारी 1757 के प्लासी युद्ध तथा 1764 के बक्सर युद्ध में बंगाल के नवाबों और दिल्ली के सम्राट को परास्त करने के बाद,अपनी राजनैतिक सत्ता का लगातार विस्तार कर रहे थे।
मराठों और अबध के नवाब के मध्य सत्ता अधिकार में झूलता इटावा 10 नवम्बर 1801 को सहायक संधि के अन्तर्गत अवध के नवाब से ईस्ट इण्डिया कम्पनी को मिल गया। ईस्ट इण्डिया कम्पनी के अधिकार से पूर्व इटावा पर मराठों और अवध का अधिकार था।यमुना के दक्षिण का भू-भाग जिसमें चकरनगर,सहसों तथा सिण्डौस आदि शामिल थे;पर मराठों का अधिकार था।तथा शेष भाग अवध के अधीन था।यमुना के पार वाला क्षेत्र ईस्ट इण्डिया कम्पनी के अधिकार में 1805 में आया।लेकिन वगावत के चलते ईस्ट इण्डिया कम्पनी को इस क्षेत्र पर वास्तविक नियंत्रण करने में पसींने छूट गये,और ग्यारह साल के भीषण संघर्ष के बाद 1816 में कम्पनी इस क्षेत्र पर वास्तविक नियंत्रण स्थापित कर पायी।
1856 में ब्रतानियाॅं हुकूमत ने एलन आक्टेवियन हयूम को इटावा का कलेक्टर बनाकर भेजा।लार्ड डलहौजी की व्ययगत संधि के कारण; देशी राज्यों में अपने अधिकारों के हनन को लेकर,ईस्ट इण्डिया कम्पनी के विरूद्ध उपजे आक्रोश तथा 6 मई 1857 को मेरठ में चर्बी लगे कारतूसों से भड़के सैन्य विद्रोह से उत्तर-प्रदेश तथा दिल्ली से लगे हुए अन्य क्षेत्रों को ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने अत्यधिक संवेदनशील घोषित कर दिया था।लग-भग डेढ माह तक चले सैन्य विद्रोह के खूनी संघर्ष के बाद 25 जून 1857 को ग्वालियर से आयी अग्रेजों की रेजीमेंट ने इटावा पर पुनः अधिकार कर लिया। लेकिन अभी यह अधिकार नाम मात्र का ही था,इटावा में क्रान्ति की ज्वालांए अभी ठंडी नहीं पड़ी थी। तब तक भारतीय स्वाधीनता संग्राम के महानायक चकरनगर रियासत के युवराज निरंजनसिंह जूदेव अपने पड़ोसी भरेह रियासत के राजा रूप सिंह,रानी झाॅंसी लक्ष्मीबाई,तात्या टोपे,एवं नाना फड़नवीस के साथ मिलकर ब्रितानियाॅं हुकूमत के विरूद्ध ऐलान-ए-जंग करने के लिए देश भर के क्रान्तिकारियों को संगठित कर,स्वाधीनता संग्राम की बुझती लौ को चिर-स्थायित्व प्रदान कर चुके थे।बताते चलें कि 1857 की क्रान्ति के समय चकरनगर की गद्दी राजा कुशल सिंह के पास थी।सैन्य विद्रोह के रूप में इटावा में क्रान्ति के प्रथम चक्र में चकरनगर क्षेत्र शान्त रहा, हयूम ने चकरनगर को राजभक्त मानकर चकरनगर इलाके में शान्ति स्थापना के दायित्व के साथ 200 रू0 मासिक पेंशन का प्रस्ताव लेकर अपने दो बड़े अंग्रेजी अफसरों को तोपखानें सहित फौज के साथ 16 सितम्बर 1857 को चकरनगर भेजा; जिसे चकरनगर रियासत के महाराज कुशल सिंह ने अस्वीकार कर दिया। झल्लाये अंग्रेजी अफसरों ने तोपखानें के साथ तीन ओर से चकरनगर पर हमला बोल दिया।जिसका राजा कुशल सिंह और उनके इकलौते पुत्र निरंजन सिंह ने स्थानीय क्रान्तिकारियों के साथ अंग्रेजी अफसरों के सिर कलम कर दिये।चकरनगर स्टेट के वागी होते ही आस-पास के क्षेत्रों में भी क्रान्ति की ज्वालाएं पुनः धधक उठीं।अधिकांश रियासतों ने ब्रितानियाॅं हुकूमत के विरूद्ध वगावत का पुनः शंखनाद कर दिया। रानी झाॅंसी लक्ष्मीबाई,तात्या टोपे,व नाना फड़नवीस के साथ क्रान्ति की मशाल लेकर माॅं भारती की रक्षा के लिए सिर पर कफन बाॅंध चुके, चकरनगर रियासत के युवराज देश-भर के क्रान्तिकारियों के संगठन के साथ जुट गये। क्रान्तिकारियों की शरणस्थली बन चुकी चम्बल घाटी की एक अन्य रियासत भरेह के राजा रूप सिंह ने ब्रितानियाॅं हुकूतम के विरूद्ध निरंजन सिंह के साथ मिलकर ‘मरते दम तक’ आजादी का झण्ड़ा बुलंद रखा।

जब वगावत से डर गये थे, हयूम
विद्रोह से डरे सहमें इटावा के तत्कालीन कलक्टर ए0ओ0 हयूम ने अपनी ‘भावी शासन नीति’से सम्बन्धित जो आख्या अगस्त 1857 में ब्रितानियाॅं हुकूमत को भेजी थी,वह आज तक उतनी ही प्रासंगिक बनी हुयी है;जितनी कि तब थी! ब्रिटिस सरकार को भेजी अपनी आख्या में उन्होंने लिखा था कि-राजपूतों और अन्य युद्धप्रिय जातियों के लोगों को उचित साधनों द्वारा खुशहाल बनाया जाये।उन्हें ग्रामीण साहूकारों और अदालत के कष्टों से दूर रखा जाये।तब ये लोग उस सरकार के साथ मिलकर लडेगे,जिसने उन्हें पनपाया है।चोरी करने वाली जाति के लोगों को कृषि के द्वारा उन्नति करने का अवसर दिया जाये।फौजदारी की अदालतों को कम खर्चीली बनाया जाये,तो ही वह लोग सरकार के साथ रहेंगे।इसे हम बिड़म्बना कहे या व्यवस्थाजनित खामियाॅं कि 1857 में तत्कालीन जिलाधीश इटावा की‘भावी शासन नीति’ से सम्बन्धित उक्त आख्या आजादी के 74 बंसत गुजर जाने के बाद भी;उतनी ही प्रासंगिक बनी हुई है ।

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