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	<title>एमबी पाटिल &#8211; Dainik Bhaskar UP/UK</title>
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		<title>राहुल के लिए खतरे की घंटी : पार्टी के नेता की कर्नाटक कांग्रेस से नाराजगी</title>
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		<pubDate>Sun, 10 Jun 2018 13:26:28 +0000</pubDate>
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										<content:encoded><![CDATA[<p>नयी दिल्ली : कर्नाटक के अंसतुष्ट&nbsp;<strong>कांग्रेस</strong>&nbsp;नेता एम बी पाटिल से मुलाकात के दौरान शनिवार को राहुल गांधी को पूर्व में घटित घटना का आभास हुआ होगा. उनके पिता स्वर्गीय राजीव गांधी ने 1990 में कर्नाटक के मुख्यमंत्री वीरेंद्र पाटिल का अपमान किया था, जिस कारण लिंगायत समुदाय में कांग्रेस के प्रति खासी नाराजगी पैदा हो गई. राजीव गांधी ने बीमार वीरेंद्र पाटिल की जगह एस बंगारप्पा को मुख्यमंत्री बना दिया और इसका ऐलान हवाई अड्डे पर ही कर दिया. लिंगायत समुदाय कांग्रेस से दूर हो गया और आज तक वो बीजेपी का कोर वोट बैंक बना हुआ है. इस वजह से भी एमबी पाटिल की नाराजगी को कांग्रेस अध्यक्ष गंभीरता से ले रहे हैं.</p>
<p>एमबी पाटिल फिलहाल कांग्रेस के सबसे बड़े लिंगायत नेता हैं. लिंगायत समुदाय को अलग धर्म का दर्जा देने के फैसले के पीछे उन्हीं का दिमाग था. एच डी कुमारस्वामी मंत्रिमंडल में शामिल नहीं होने से पाटिल नाराज हैं. उनकी नजर उपमुख्यमंत्री के पद पर थी. सरकार में नंबर दो के रुतबे की बात तो छोड़िए, उन्हें मंत्रीपद भी नहीं दिया गया. सिद्धरमैया सरकार में जल संसाधन मंत्री रहे एमबी पाटिल ने बगावत का बिगुल बजा दिया और ये दिखा दिया कि उनके पीछे 15 असंतुष्ट विधायक लामबंद हैं. एचके पाटिल, रोशन बेग, रामलिंगा रेड्डी जैसे कई पूर्व मंत्री भी सरकार में शामिल नहीं किए जाने से असंतुष्ट हैं.</p>
<p><strong>जी परमेश्वर का ग्राफ तेजी से कांग्रेस में चढ़ा है<br />
</strong></p>
<p>पाटिल की नाराजगी की बड़ी वजह शिवानंद पाटिल को स्वास्थ्य मंत्री बनाना है, जो कांग्रेस की राजनीति में उनके विरोधी हैं. कुमारस्वामी कैबिनेट में लिंगायत समुदाय से चार मंत्री हैं और ऐसा प्रतीत होता है कि पाटिल को जान-बूझकर मंत्रिमंडल में शामिल नहीं किया गया.</p>
<p>अब यह सवाल पूछा जा रहा है कि क्या एमबी पाटिल को सिद्धारमैया से नजदीकी की सजा मिली. सिद्धारमैया भले ही कांग्रेस विधायक दल के नेता हों लेकिन उनके पास अब वैसी ताकत नहीं है, जैसी चुनाव से पहले थी. अपने गृह क्षेत्र चामुंडेश्वरी में मिली अपमानजनक हार और बादामी में मामूली अंतर से जीत ने सिद्धारमैया की राजनीतिक ताकत कम कर दी है. इसके बाद उपमुख्यमंत्री और मौजूदा प्रदेश अध्यक्ष जी परमेश्वर का ग्राफ तेजी से कांग्रेस में चढ़ा है.</p>
<p>ऐसी धारणा बनाई गई कि पाटिल को मंत्रिमंडल में शामिल करने से लिंगायत समुदाय नाराज होगा क्योंकि अलग धर्म का दर्जा देने की घोषणा के बावजूद समुदाय का एक बड़ा हिस्सा बीजेपी के साथ ही रहा. समुदाय को लिंगायत और वीरशैव में विभाजित करने के पाटिल के आक्रामक कदम को ऐसे पेश किया गया कि 2013 के मुकाबले इस बार लिंगायतों के गढ़ उत्तर&nbsp;<strong>कर्नाटक में कांग्रेस</strong>&nbsp;का प्रदर्शन निराशाजनक रहा.</p>
<p>लेकिन ये पूरी तरह सही नहीं है. 2013 में कांग्रेस इसलिए अच्छा कर पाई कि बीएस येदियुरप्पा अलग लड़ रहे थे और इस कारण बीजेपी का वोट बंट गया. पहले की तरह ही लिंगायत समुदाय बीजेपी और येदियुरप्पा के साथ खड़ा रहा और इस बार भी ये समीकरण नहीं बदला.</p>
<p>वास्तव में 2013 में पाटिल ने बाबलेश्वर विधान सभा सीट पांच हजार से भी कम वोटों के अंतर से जीती थी. लेकिन इस बार उन्होंने ये सीट 30 हजार वोटों के अंतर से जीती. ये इस बात का सबूत है कि फैसले के बाद उनकी व्यक्तिगत लोकप्रियता गिरने के बजाए बढ़ी है. इसके अलावा कांग्रेस ने लिंगायत समुदाय के 47 लोगों को टिकट दिया था इनमें से 17 ने जीत दर्ज की जो 36 फीसदी है.&nbsp;<strong>कांग्रेस विधायक दल</strong>&nbsp;में ये सबसे बड़ा खेमा है, क्योंकि वोक्कालिगा और ओबीसी के महज 14-14 विधायक ही हैं.</p>
<p>परमेश्वर समेत कर्नाटक कांग्रेस के कई नेताओं ने पाटिल को मनाने की कोशिश की लेकिन सार्थक नतीजा नहीं निकला. स्थितियों को हाथ से निकलता देख और अपनी सरकार बचाने के लिए कुमारस्वामी पाटिल के घर गए और उनसे मामले को और तूल नहीं देने की अपील की. अपने अंदरूनी मामलों में जेडीएस के दखल से कांग्रेस कतई खुश नहीं थी और इसके बाद ही हाईकमान ने पाटिल को दिल्ली बुलाने का फैसला किया. बगावत को नियंत्रित नहीं कर पाने की कांग्रेस की असमर्थता के चलते कुमारस्वामी खुद इस भाग-दौड़ से खुश नहीं थे और उनका मकसद अपनी सरकार को&nbsp;बनाए रखना है.</p>
<div class="articleimg wauto"><img fetchpriority="high" decoding="async" class=" wp-image-1410053" src="https://images.hindi.news18.com/ibnkhabar/uploads/2018/06/KUMARSWAMY-RAHUL.jpg" alt="" width="1351" height="762"></div>
<p><strong>पाटिल की धमकी को हल्के में न लें<br />
</strong>कांग्रेस नेताओं का कहना है कि हाईकमान चाहता था कि पिछली सरकार में मंत्री रहे कुछ नेता युवाओं को आगे आने का मौका दिया जाए. स्पष्ट है कि हाईकमान के इस संदेश से वरिष्ठ नेताओं को अवगत नहीं कराया गया. जब उन्हें इसकी जानकारी दी गई तो उनका गुस्सा फूट पड़ा. इससे पता चलता है कि चुनाव के बाद बनी नाजुक स्थिति को संभालने का दायित्व किसी के पास नहीं था.</p>
<p>रिपोर्टों के मुताबिक राहुल गांधी ने पाटिल से वादा किया है कि अगले दौर के कैबिनेट विस्तार में उन्हें शामिल किया जाएगा लेकिन उपमुख्यमंत्री का पद मिलने का सवाल ही पैदा नहीं होता. कांग्रेस नेतृत्व आश्वस्त है कि पाटिल पुराने कांग्रेसी हैं और मतभेदों के बावजूद पार्टी छोड़कर नहीं जाएंगे.</p>
<p>लेकिन&nbsp;<strong>कांग्रेस के भीतर</strong>&nbsp;बनी इस नाजुक स्थिति का बीजेपी फायदा उठाना चाहेगी. सत्तारूढ़ गठबंधन तथ्य को शायद ही अनदेखा कर सकता है कि 104 विधायकों के साथ बीजेपी विधान सभा से महज मामूली दूरी पर ही खड़ी है.</p>
<p>इतिहास भी राहुल गांधी को ये बता रहा है कि वो पाटिल की धमकी को हल्के में न लें. 1969 में जब कांग्रेस टूटी थी तो पाटिल के पिता बीएम पाटिल ने सिंडिकेट का साथ छोड़ इंदिरा गांधी से हाथ मिला लिया था. इसके बाद कर्नाटक में हुए अगले विधान सभा चुनाव में कांग्रेस (ओ) की हार हो गई थी.</p>
<p>मंत्रिमंडल में रिक्तियों के अलावा प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष का पद भी खाली होना है क्योंकि परमेश्वर अब मंत्री बन गए हैं. बेंगलुरु से पार्टी नेता दिनेश गुंडुराव भी प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष बनने की दौड़ में शामिल हैं. गुंडुराव को भी मंत्रिमंडल में शामिल नहीं किया गया है. लेकिन कांग्रेस जिस अंदाज में अपनी राजनीति चलाती है, उसमें इससे इनकार नहीं किया जा सकता कि प्रदेश अध्यक्ष का पद किसी लिंगायत को मिल जाए. फैसला चाहे जो हो लेकिन नेताओं के बीच नाराजगी बनी ही रहेगी.</p>
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