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	<title>सर्वोच्च न्यायलय का फैसला &#8211; Dainik Bhaskar UP/UK</title>
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		<title>सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला, समलैंगिक संबंध अब अपराध नहीं</title>
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		<pubDate>Thu, 06 Sep 2018 06:36:24 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[नई दिल्ली,  । समलैंगिकता को अपराध करार देनेवाली भारतीय दंड संहिता की धारा 377 को सुप्रीम कोर्ट ने निरस्त कर दिया है। सुप्रीम कोर्ट की पांच सदस्यीय संविधान बेंच ने सुप्रीम कोर्ट के ही 2013 के दो सदस्यीय बेंच के फैसले को निरस्त कर दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने पिछले 17 जुलाई को इस पर ... <a title="सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला, समलैंगिक संबंध अब अपराध नहीं" class="read-more" href="https://dainikbhaskarup.com/supreme-court-verdict-on-decriminalizing-section-377-news/" aria-label="Read more about सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला, समलैंगिक संबंध अब अपराध नहीं">Read more</a>]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p><img fetchpriority="high" decoding="async" class="" src="https://static.langimg.com/thumb/msid-65697826,width-400,resizemode-4/untitled-design-7.jpg" width="580" height="464" /></p>
<p>नई दिल्ली,  । समलैंगिकता को अपराध करार देनेवाली भारतीय दंड संहिता की धारा 377 को सुप्रीम कोर्ट ने निरस्त कर दिया है। सुप्रीम कोर्ट की पांच सदस्यीय संविधान बेंच ने सुप्रीम कोर्ट के ही 2013 के दो सदस्यीय बेंच के फैसले को निरस्त कर दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने पिछले 17 जुलाई को इस पर फैसला सुरक्षित रख लिया था।</p>
<p>चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा ने फैसला सुनाते हुए कहा कि हर व्यक्ति की अपनी पहचान है। व्यक्तिगत पहचान के बिना मौत है। समाज अब व्यक्तिगत पहचान के लिए तैयार है। हमारा समाज तभी स्वतंत्र होगा जब हम समाज के इन तबकों को भी अपने में शामिल करेंगे। अब हमें सामाजिक और आर्थिक अधिकारों के लिए काम करना चाहिए।</p>
<p>कोर्ट ने कहा कि भारतीय दंड संहिता की धारा 377 मनमाना है। कोर्ट ने कहा कि एलजीबीटी समुदाय को भी आम लोगों की तरह अधिकार है। उनकी गरिमा का उल्लंघन करने का किसी को अधिकार नहीं है।</p>
<p>पांच में से 4 जजों चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा, डी वाई चन्दचुड़,रोहिंटन नरीमन और इंदु मल्होत्रा ने अपने अलग-अलग फैसले लिखे हैं।</p>
<p>इस मामले में केंद्र सरकार ने अपना कोई पक्ष कोर्ट में नहीं रखा था और फैसला कोर्ट के विवेक पर फैसला पर छोड़ दिया था।</p>
<p>दो क्रिश्चियन संगठनों की ओर से कहा गया था कि धारा 377 खत्म करने से मर्द और औरत दोनों के वैवाहिक अधिकारों पर असर होगा। इसके लिए कानून में काफी बदलाव करना पड़ेगा और ये बदलाव संसद पर सकती है सुप्रीम कोर्ट नहीं। उन्होंने कहा था कि धारा 377 में दो तरह के वर्गीकरण हैं- एक प्राकृतिक और दूसरा अप्राकृतिक। कोर्ट कामुक संबंध की व्याख्या नहीं कर सकता है। तब जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा था कि कोर्ट धारा 14 के तहत प्राकृतिक सिद्धांत जरुर देखेगी। तब क्रिश्चियन संगठनों की ओर से मनोज जॉर्ज ने कहा था कि किसी की सहमति के लिए मौत का भय भी दिखाया जा सकता है। धारा 377 में सहमति शब्द नहीं है जबकि याचिकाकर्ता इस शब्द को जुड़वाना चाहते हैं। रेप के मामले में सहमति और स्वतंत्र सहमति पर गौर किया जाता है लेकिन धारा 377 में नहीं।</p>
<p>सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा ने कहा था कि आपका सेक्सुअल एंजॉयमेंट या सेक्सुअल ओरिएंटेशन किसी की गरिमा को नुकसान नहीं पहुंचा सकता है। इसलिए मर्द और मर्द या मर्द और औरत के बीच सहमति होनी ही चाहिए। जस्टिस आर एफ नरीमन ने कहा था कि कोर्ट का ये मौलिक कर्तव्य है कि वह असंवैधानिक प्रावधान को खत्म करे क्योंकि बहुमत की सरकार वोट की वजह से ऐसा नहीं करती है।</p>
<p>सुनवाई के दौरान जस्टिस चंद्रचूड़ ने इस बात पर असहमति जताई थी कि धारा 377 खत्म करने से एड्स जैसी बीमारियां बढ़ सकती है। उन्होंने कहा कि अगर ऐसे संबंधों को मान्यता मिलेगी तो स्वास्थ्य के क्षेत्र में काफी जागरुकता आएगी। तब जस्टिस नरीमन ने कहा कि यह बात वेश्यावृत्ति पर भी लागू होती है।</p>
<p>पहले की सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा ने कहा था कि हम बहुमत की नैतिकता का पालन नहीं करते बल्कि संवैधानिक नैतिकता का पालन करते हैं। पहले की सुनवाई के दौरान वकील श्याम दीवान ने कहा था कि अब समय आ गया है कि कोर्ट को संविधान के आर्टिकल 21 के तहत राइट टू इंटिमेसी को जीवन जीने के अधिकार का हिस्सा घोषित कर देना चाहिए।</p>
<p><img decoding="async" class="" src="https://smedia2.intoday.in/aajtak/images/stories/082018/377_1536203837_618x347.jpeg" alt="Image result for à¤¸à¥à¤ªà¥à¤°à¥à¤® à¤à¥à¤°à¥à¤ à¤à¤¾ à¤à¤¤à¤¿à¤¹à¤¾à¤¸à¤¿à¤ à¤«à¥à¤¸à¤²à¤¾, à¤¸à¤®à¤²à¥à¤à¤à¤¿à¤ à¤¸à¤à¤¬à¤à¤§ à¤à¤¬ à¤à¤ªà¤°à¤¾à¤§ à¤¨à¤¹à¥à¤" width="718" height="403" /></p>
<p>श्याम दीवान ने दक्षिण अफ्रीका की संवैधानिक कोर्ट के एक फैसले का उल्लेख करते हुए कहा था कि निजता किसी भी व्यक्ति को अपनी जिंदगी में किसी के साथ भी नजदीकी रिश्ते कायम करने का अधिकार देती है। उन्होंने कहा था कि स्वतंत्रता किसी समलैंगिक को अपना जीवनसाथी चुनने का अधिकार देती है और उन्हें सम्मान के साथ अपने साथी के साथ जीने का अधिकार भी देती है। उन्होंने कहा था कि कुछ ऐसे समलैंगिक लोग जो शर्मीले हैं, वो खुल कर सामने नहीं आ पाते और अपनी बातें नहीं रख पाते थे वो नाज फाउंडेशन मामले में कोर्ट के फैसले से खुद को सशक्त महसूस कर रहे थे| लेकिन जब सुप्रीम कोर्ट ने दोबारा से धारा 377 को अपराध की श्रेणी में शामिल किया तो इसका समलैंगिक समुदाय पर बेहद नकारात्मक असर पड़ा था।</p>
<p>सुनवाई के दौरान संविधान बेंच की एकमात्र महिला जज जस्टिस इंदु मल्होत्रा ने कहा था कि समलैंगिक अपने परिजनों और समाज की वजह से काफी तनाव झेलते हैं। जस्टिस इंदु मल्होत्रा ने कहा था कि समलैंगिक लोगों को स्वास्थ्य के मामले में नुकसान उठाना पड़ता है। चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा ने कहा था एलजीबीटी खुद को भेदभाव का शिकार पाते हैं क्योंकि उनके साथ अलग किस्म का व्यवहार होता है और वो अपराधबोध से ग्रसित होते हैं| याचिकाकर्ता के वकील ने कहा था कि गे कपल मौजूदा कानून के कारण बच्चों को अडॉप्ट नहीं कर सकते, जो भेदभाव वाला है। तब एएसजी तुषार मेहता ने कहा कि दलील धारा 377 के दायरे से बाहर जा रहा है।</p>
<p>श्याम दीवान ने कहा था कि सुप्रीम कोर्ट के लिए ये सही समय है कि वो घोषणा करे कि ये अपराध नहीं है। एलजीबीटी समुदाय के लोग गिरफ्तारी के डर के साए में जी रहे हैं। उन्हें अपराधियों की तरह देखा जाता है। धारा 377 एलजीबीटी और उनकी गरिमा को नुकसान पहुंचाती है।</p>
<p>जस्टिस इंदु मल्होत्रा ने कहा था कि यहां तक कि इलाज कराने में भी इन लोगों को परेशानी होती है। मेडिकल समुदाय से भी इन लोगों को सहयोग नहीं मिलता। छोटे शहरों के डॉक्टर उनकी पहचान को छिपाते नहीं हैं। जस्टिस इंदू मल्होत्रा ने कहा था कि एलजीबीटी समुदाय की यौन प्राथमिकताओं के चलते ग्रामीण और सेमी अर्बन क्षेत्रों में हेल्थ केयर में उनके साथ भेदभाव होता है।</p>
<p>श्याम दीवान के वरिष्ठ वकील अशोक देसाई ने कहा था कि एलजीबीटी समुदाय का अस्तित्व हमारे कल्चर का हिस्सा है। उन्होंने कहा था कि एक सेक्स में प्यार को खुदगर्ज नहीं कहा जा सकता। दुनिया के कई देशों में बदलाव आया है और समलैंगिकता को स्वीकार किया गया है। देसाई ने देवदत्त पटनायक की पुस्तक शिखंडी का जिक्र करते हुए कहा था कि समलैंगिकता बाहरी दुनिया की चीज नहीं है। उन्होंने पूर्व चीफ जस्टिस लीला सेठ के एक आलेख का जिक्र किया था जिसमें उन्होंने लिखा था कि उनका बेटा समलैंगिक है और कानून के मुताबिक वो एक अपराधी है।</p>
<p>&nbsp;</p>
<blockquote class="twitter-tweet" data-width="550" data-dnt="true">
<p lang="en" dir="ltr"><a href="https://twitter.com/hashtag/Section377?src=hash&amp;ref_src=twsrc%5Etfw" target="_blank" rel="noopener">#Section377</a> in Supreme Court: LGBT Community has same rights as of any ordinary citizen. Respect for each others rights, and others are supreme humanity. Criminalising gay sex is irrational and indefensible, observes CJI Dipak Misra. <a href="https://t.co/05ADSuh5cv">https://t.co/05ADSuh5cv</a></p>
<p>&mdash; ANI (@ANI) <a href="https://twitter.com/ANI/status/1037587030576746499?ref_src=twsrc%5Etfw" target="_blank" rel="noopener">September 6, 2018</a></p></blockquote>
<p><script async src="https://platform.twitter.com/widgets.js" charset="utf-8"></script></p>
<p><strong>क्या है धारा 377</strong><br />
भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 377 के मुताबिक कोई किसी पुरुष, स्त्री या पशुओं से प्रकृति की व्यवस्था के विरुद्ध संबंध बनाता है तो यह अपराध होगा। इस अपराध के लिए उसे उम्रकैद या 10 साल तक की कैद के साथ आर्थिक दंड का भागी होना पड़ेगा। सीधे शब्दों में कहें तो धारा-377 के मुताबिक अगर दो अडल्ट आपसी सहमति से भी समलैंगिक संबंध बनाते हैं तो वह अपराध होगा।</p>
<p><strong>सुनवाई के दौरान क्या रहा था सुप्रीम कोर्ट का रुख </strong><br />
&#8211; सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी की थी कि अगर कोई कानून मौलिक अधिकारों के खिलाफ है तो हम इस बात का इंतजार नहीं कर सकते कि बहुमत की सरकार इसे रद्द करे।</p>
<p>&#8211; चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा की अगुवाई वाली संवैधानिक बेंच ने कहा कि वह साफ करना चाहते हैं कि वह धारा-377 को पूरी तरह से खारिज नहीं करने जा रहे हैं बल्कि वह धारा-377 के उस प्रावधान को देख रहे हैं जिसके तहत प्रावधान है कि दो बालिग अगर समलैंगिक संबंध बनाते हैं तो वह अपराध है या नहीं।</p>
<p><strong>समलैंगिकता को अपराध से बाहर रखने के पक्ष में दलील </strong><br />
&#8211; याचिकाकर्ता के वकील मुकुल रोहतगी ने कहा था कि एलजीबीटीक्यू (लेज्बियन, गे, बाय सेक्शुअल्स, ट्रांसजेंडर्स, क्वीर) के मौलिक अधिकार प्रोटेक्टेड होना चाहिए। जीवन और स्वच्छंदता का अधिकार नहीं लिया जा सकता।</p>
<p>&#8211; LGBT समुदाय को मौजूदा धारा-377 की वजह से सामाजिक प्रताड़ना का सामना करना पड़ रहा है। उनका सेक्शुअल रुझान अलग है और ये सवाल किसी की व्यक्तिगत इच्छा का नहीं बल्कि रुझान का है जो पैदा होने के साथ हुआ है।</p>
<p>&#8211; अनुच्छेद-21 के तहत मौलिक अधिकार का सुप्रीम कोर्ट संरक्षित करे। 2013 के फैसले के कारण समाज का एक वर्ग प्रभावित हुआ है और समाज पर इसका व्यापक असर हुआ है। समाज को हम दोषी नहीं मान रहे लेकिन समाज के सिद्धांत को संवैधानिक नैतिकता की कसौटी पर परखना होगा।</p>
<p>&#8211; सेक्शुअल नैतिकता को गलत तरीके से परिभाषित किया जा रहा है। जेंडर को सेक्शुअल ओरिएंटेशन के साथ मिक्स नहीं किया जा सकता। एलजीबीटी समुदाय के लोग समाज के दूसरे तबके की तरह ही हैं। सिर्फ उनका सेक्शुअल रुझान अलग है।</p>
<p>&#8211; ये सब पैदाइशी है। ये मामला जीन से संबंधित है और ये सब प्राकृतिक है, जिसने ऐसा रुझान दिया है। इसका लिंग से कोई लेना देना नहीं है। सुप्रीम कोर्ट को सिर्फ सेक्शुअल ओरिएंटेशन को डील करना चाहिए जो पैदाइशी है। सेक्शुअल ओरिएंटेशन बेडरूम से संबंधित है।</p>
<p><strong>समलैंगिकता को अपराध रहने देने की दलील देने वालों का तर्क </strong><br />
&#8211; सुरेश कुमार कौशल (जिनकी अर्जी पर सुप्रीम कोर्ट ने धारा-377 की वैधता को बहाल किया था) ने मामले में कहा कि अगर धारा-377 के तहत दो बालिगों के बीच समलैंगिक संबंध को अपराध के दायरे से बाहर कर दिया जाएगा तो इससे देश की सुरक्षा को खतरा हो जाएगा।</p>
<p>&#8211; आर्म्ड फोर्स जो परिवार से दूर रहते हैं वह अन्य जवानों के साथ सेक्शुअल ऐक्टिविटी में शामिल हो सकते हैं। इससे भारत में पुरुष वेश्यावृति को बढ़ावा मिलेगा।</p>
<p><strong>केंद्र सरकार का नहीं रहा कोई स्टैंड </strong><br />
&#8211; समलैंगिकता मामले की सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार ने कहा है कि वह सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक बेंच के विवेक पर इस बात को छोड़ते हैं कि वह खुद तय करे कि धारा-377 के तहत दो बालिगों के बीच सहमति से समलैंगिक संबंध अपराध के दायरे में रखा जाए या नहीं।</p>
<p><strong>क्या रहा था हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट का फैसला </strong><br />
11 दिसंबर 2013 को सुप्रीम कोर्ट ने होमो सेक्शुऐलिटी मामले में दिए अपने ऐतिहासिक जजमेंट में समलैंगिकता के मामले में उम्रकैद तक की सजा के प्रावधान वाले कानून को बहाल रखा था। सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली हाई कोर्ट के उस फैसले को खारिज कर दिया था जिसमें दो बालिगों द्वारा आपस में सहमति से समलैंगिक संबंध बनाए जाने को अपराध की श्रेणी से बाहर किया गया था। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद रिव्यू पिटिशन खारिज हुई और फिर क्यूरेटिव पिटिशन दाखिल की गई जिसे संवैधानिक बेंच रेफर कर दिया गया। साथ ही नई अर्जी भी लगी जिस पर संवैधानिक बेंच ने सुनवाई की है।</p>
<p><strong>निजता के अधिकार पर दिए फैसले में होमो सेक्शुऐलिटी पर महत्वपूर्ण टिप्पणी </strong><br />
चीफ जस्टिस की अगुवाई वाली संवैधानिक बेंच ने 24 अगस्त 2017 को दिए अपने जजमेंट में नाज फाउंडेशन से संबंधित जजमेंट का जिक्र किया था। बेंच ने कहा था कि सेक्शुअल ओरिएंटेशन (अनुकूलन) निजता का महत्वपूर्ण अंग है। निजता का अधिकार जीवन के अधिकार का हिस्सा है। इसे इस आधार पर मना नहीं किया जा सकता कि समाज के छोटे हिस्से एलजीबीटी की ये बात है। किसी के साथ भी सेक्शुअल ओरिएंटेशन के आधार पर भेदभाव करना उसके गरिमा के प्रति अपराध है। किसी का भी सेक्शुअल ओरिएंटेशन समाज में संरक्षित होना चाहिए।</p>
<p>बेंच ने कहा था कि अनुच्छेद-14, 15 और 21 के मूल में निजता का अधिकार है और सेक्शुअल ओरिएंटेशन उसमें बसा हुआ है। एलजीबीटी के अधिकार को तथाकथित अधिकार कहा गया था जो नहीं कहा जाना चाहिए था। उनका अधिकार भी असली अधिकार है। जीवन के अधिकार से उनको निजता का अधिकार मिला हुआ है। समाज के हर वर्ग को संरक्षण मिला हुआ है। उसमें भेदभाव नहीं हो सकता। चूंकि धारा-377 का मामला लार्जर बेंच में लंबित है ऐसे में इस मसले पर वही फैसला लेंगे।</p>
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