<?xml version="1.0" encoding="UTF-8"?><rss version="2.0"
	xmlns:content="http://purl.org/rss/1.0/modules/content/"
	xmlns:wfw="http://wellformedweb.org/CommentAPI/"
	xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/"
	xmlns:atom="http://www.w3.org/2005/Atom"
	xmlns:sy="http://purl.org/rss/1.0/modules/syndication/"
	xmlns:slash="http://purl.org/rss/1.0/modules/slash/"
	>

<channel>
	<title>Amar&#8217;s Shahid Kotwal Dhansingh &#8211; Dainik Bhaskar UP/UK</title>
	<atom:link href="https://dainikbhaskarup.com/tag/amars-shahid-kotwal-dhansingh/feed/" rel="self" type="application/rss+xml" />
	<link>https://dainikbhaskarup.com</link>
	<description></description>
	<lastBuildDate>Sat, 11 May 2019 05:03:33 +0000</lastBuildDate>
	<language>en-US</language>
	<sy:updatePeriod>
	hourly	</sy:updatePeriod>
	<sy:updateFrequency>
	1	</sy:updateFrequency>
	<generator>https://wordpress.org/?v=6.9.4</generator>

<image>
	<url>https://dainikbhaskarup.com/wp-content/uploads/2026/01/dainik-bhaskar-icon.png</url>
	<title>Amar&#8217;s Shahid Kotwal Dhansingh &#8211; Dainik Bhaskar UP/UK</title>
	<link>https://dainikbhaskarup.com</link>
	<width>32</width>
	<height>32</height>
</image> 
	<item>
		<title>10 मई 1857 &#8220;क्रांति दिवस&#8221; के महानायक अमर शहीद कोतवाल धनसिंह *</title>
		<link>https://dainikbhaskarup.com/may-10-1857-amars-shahid-kotwal-dhansingh-the-revolution-day-news/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 11 May 2019 05:03:33 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[गाज़ियाबाद]]></category>
		<category><![CDATA[1857]]></category>
		<category><![CDATA[Amar's Shahid Kotwal Dhansingh]]></category>
		<category><![CDATA[May 10]]></category>
		<category><![CDATA[the "Revolution Day"]]></category>
		<guid isPermaLink="false">http://www.dainikbhaskarup.com/?p=29615</guid>

					<description><![CDATA[10 मई 1857 को भारत के कुछ हिस्सों में ब्रिटिश ईस्ट इण्डिया कम्पनी के ख़िलाफ़ ग़दर और विद्रोहों की श्रृंखला की बड़े पैमाने पर शुरुआत हुई थी, जिसे आजादी के इतिहास में प्रथम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के नाम से जाना जाता है। अधिकांश इतिहासकार व इतिहास की पुस्तकें कहती हैं कि 1857 की क्रान्ति की ... <a title="10 मई 1857 &#8220;क्रांति दिवस&#8221; के महानायक अमर शहीद कोतवाल धनसिंह *" class="read-more" href="https://dainikbhaskarup.com/may-10-1857-amars-shahid-kotwal-dhansingh-the-revolution-day-news/" aria-label="Read more about 10 मई 1857 &#8220;क्रांति दिवस&#8221; के महानायक अमर शहीद कोतवाल धनसिंह *">Read more</a>]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<div dir="auto"></div>
<div dir="auto">10 मई 1857 को भारत के कुछ हिस्सों में ब्रिटिश ईस्ट इण्डिया कम्पनी के ख़िलाफ़ ग़दर और विद्रोहों की श्रृंखला की बड़े पैमाने पर शुरुआत हुई थी, जिसे आजादी के इतिहास में प्रथम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के नाम से जाना जाता है। अधिकांश इतिहासकार व इतिहास की पुस्तकें कहती हैं कि 1857 की क्रान्ति की शुरूआत &#8217;10 मई 1857&#8242; की संध्या को उत्तर प्रदेश के मेरठ शहर मे हुई थी।</div>
<div dir="auto"></div>
<div dir="auto">जिस दिन को बाद में समस्त देशवासी क्रांतिकारियों की याद में 10 मई को प्रत्येक वर्ष ”क्रान्ति दिवस“ के रूप में मनाने लगे हैं, इस क्रान्ति की शुरूआत करने का श्रेय अमर शहीद कोतवाल धनसिंह गुर्जर को जाता है। इस स्वाधीनता संग्राम के प्रतीक के रूप में आज भी आप मेरठ के कमिशनरी चौक, में विद्यमान अमर शहीद कोतवल धन सिंह गुर्जर की प्रतिमा को देख सकते है।</div>
<div dir="auto"></div>
<div dir="auto">कोतवाल धन सिंह गुर्जर का जन्म 27 नवंबर 1814 को ग्राम पांचली खुर्द में किसान परिवार में हुआ था। इनके पिता का नाम जोधा सिंह गुर्जर और माता का नाम मनभरी देवी था। उच्च शिक्षा प्राप्त कर पुलिस में भर्ती हो गए। जो कि बाद में ब्रिटिश हुकूमत में मेरठ शहर के कोतवाल बने।</div>
<div dir="auto"></div>
<div dir="auto">10 मई 1857 को मेरठ में विद्रोही सैनिकों और पुलिस फोर्स ने अंग्रेजों के विरूद्ध साझा मोर्चा गठित कर क्रान्तिकारी घटनाओं को अंजाम दिया। सैनिकों के विद्रोह की खबर फैलते ही मेरठ की शहरी जनता और आस-पास के गांव विशेषकर पांचली, घाट, नंगला, गगोल इत्यादि के हजारों ग्रामीण मेरठ की सदर कोतवाली क्षेत्र में जमा हो गए। इसी कोतवाली में धन सिंह कोतवाल (प्रभारी) के पद पर कार्यरत थे।</div>
<div dir="auto"></div>
<div dir="auto">मेरठ की पुलिस बागी हो चुकी थी। धन सिंह कोतवाल क्रान्तिकारी भीड़ (सैनिक, मेरठ के शहरी, पुलिस और किसान) में एक प्राकृतिक नेता के रूप में उभरे। उनका आकर्षक व्यक्तित्व, उनका स्थानीय होना, (वह मेरठ के निकट स्थित गांव पांचली के रहने वाले थे), पुलिस में उच्च पद पर होना और स्थानीय क्रान्तिकारियों का उनको विश्वास प्राप्त होना कुछ ऐसे कारक थे जिन्होंने कोतवाल धन सिंह को 10 मई 1857 के दिन मेरठ की क्रान्तिकारी जनता के क्रांतिकारी नेता के रूप में उभरने में मदद की।</div>
<div dir="auto"></div>
<div dir="auto">उन्होंने क्रान्तिकारी भीड़ का नेतृत्व किया और रात दो बजे मेरठ जेल पर हमला कर दिया। जेल तोड़कर 836 कैदियों को छुड़ा लिया और जेल में आग लगा दी। जेल से छुड़ाए कैदी भी क्रान्ति में शामिल हो गए। उससे पहले पुलिस फोर्स के नेतृत्व में क्रान्तिकारी भीड़ ने पूरे सदर बाजार और कैंट क्षेत्र में क्रान्तिकारी घटनाओं को अंजाम दिया। रात में ही विद्रोही सैनिक दिल्ली कूच कर गए और विद्रोह मेरठ के देहात में फैल गया जिसके चलते ही बाद में हिंडन नदी पुल गाजियाबाद पर अंग्रेजी सेना से आजादी के दिवानों का भीषण युद्ध भी हुआ था ।</div>
<div dir="auto"></div>
<div dir="auto">इस क्रांति के पश्चात ब्रिटिश सरकार ने 10 मई, 1857 को मेरठ मे हुई क्रान्तिकारी घटनाओं में पुलिस की भूमिका की जांच के लिए मेजर विलियम्स की अध्यक्षता में एक कमेटी गठित की गई। मेजर विलियम्स ने उस दिन की घटनाओं का भिन्न-भिन्न गवाहियों के आधार पर गहन विवेचन किया तथा इस सम्बन्ध में एक स्मरण-पत्र तैयार किया, जिसके अनुसार उन्होंने मेरठ में जनता की क्रान्तिकारी गतिविधियों के विस्फोट के लिए महान क्रांतिकारी धन सिंह कोतवाल को मुख्य रूप से दोषी ठहराया, उसका मानना था कि यदि धन सिंह कोतवाल ने क्रांतिकारियों का सहयोग ना करके अंग्रेजी हकुमत के प्रति अपने कर्तव्य का निर्वाह ठीक प्रकार से किया होता तो संभवतः मेरठ में जनता को भड़कने से रोका जा सकता था। अंग्रेजों ने अपनी जाचं में वीर धन सिंह कोतवाल को पुलिस नियंत्रण के छिन्न-भिन्न हो जाने के लिए दोषी पाया गया। क्रान्तिकारी घटनाओं से दमित लोगों ने अपनी गवाहियों में सीधे आरोप लगाते हुए कहा कि धन सिंह कोतवाल पर क्रान्तिकारियों को खुला संरक्षण देने का आरोप भी लगाया। एक गवाही के अनुसार क्रान्तिकरियों ने कहा कि धन सिंह कोतवाल ने उन्हें स्वयं आस-पास के गांव से बुलाया है।</div>
<div dir="auto"></div>
<div dir="auto">यदि मेजर विलियम्स द्वारा ली गई गवाहियों का स्वयं विवेचन किया जाये तो पता चलता है कि 10 मई, 1857 को मेरठ में क्रांति का विस्फोट कोई स्वतः विस्फोट नहीं वरन् एक पूर्व योजना के तहत एक निश्चित कार्यवाही थी, जो परिस्थितिवश समय से पूर्व ही घटित हो गई। नवम्बर 1858 में मेरठ के कमिश्नर एफ0 विलियम द्वारा इसी सिलसिले से एक रिपोर्ट नोर्थ &#8211; वैस्टर्न प्रान्त (आधुनिक उत्तर प्रदेश) सरकार के सचिव को भेजी गई। रिपोर्ट के अनुसार मेरठ की सैनिक छावनी में ”चर्बी वाले कारतूस और हड्डियों के चूर्ण वाले आटे की बात“ बड़ी सावधानी पूर्वक सुनियोजित ढंग से फैलाई गई थी। रिपोर्ट में अयोध्या से आये एक साधु की संदिग्ध भूमिका की ओर भी इशारा किया गया था।  विद्रोही सैनिक, मेरठ शहर की पुलिस, तथा जनता और आस-पास के गांव के ग्रामीण इस साधु के सम्पर्क में थे। मेरठ के आर्य समाजी, इतिहासज्ञ एवं स्वतन्त्रता सेनानी आचार्य दीपांकर के अनुसार यह साधु स्वयं स्वामी दयानन्द जी थे और वही मेरठ में 10 मई, 1857 की घटनाओं के सूत्रधार थे। मेजर विलियम्स को दो गयी गवाही के अनुसार कोतवाल स्वयं इस साधु से उसके सूरजकुण्ड स्थित ठिकाने पर मिले थे।</div>
<div dir="auto"></div>
<div dir="auto">हो सकता है ऊपरी तौर पर यह कोतवाल की सरकारी भेंट हो, परन्तु दोनों के आपस में सम्पर्क होने की बात से इंकार नहीं किया जा सकता। वास्तव में कोतवाल सहित पूरी पुलिस फोर्स इस योजना में साधु (सम्भवतः स्वामी दयानन्द जी) के साथ देशव्यापी क्रान्तिकारी योजना में शामिल हो चुकी थी। 10 मई को जैसा कि इस रिपोर्ट में बताया गया कि सभी सैनिकों ने एक साथ मेरठ में सभी स्थानों पर विद्रोह कर दिया। ठीक उसी समय सदर बाजार की भीड़, जो पहले से ही हथियारों से लैस होकर इस घटना के लिए तैयार थी, ने भी अपनी क्रान्तिकारी गतिविधियां शुरू कर दीं। धन सिंह कोतवाल ने योजना के अनुसार बड़ी चतुराई से ब्रिटिश सरकार के प्रति वफादार पुलिस कर्मियों को कोतवाली के भीतर चले जाने और वहीं रहने का आदेश दिया। आदेश का पालन करते हुए अंग्रेजों के वफादार पिट्ठू पुलिसकर्मी क्रान्ति के दौरान कोतवाली में ही बैठे रहे।</div>
<div dir="auto"></div>
<div dir="auto">इस प्रकार अंग्रेजों के वफादारों की तरफ से क्रान्तिकारियों को रोकने का समय पर कोई प्रयास नहीं हो सका, दूसरी तरफ उसने क्रान्तिकारी योजना से सहमत सिपाहियों को क्रान्ति में अग्रणी भूमिका निभाने का गुप्त आदेश दिया, फलस्वरूप उस दिन कई जगह पुलिस वालों को क्रान्तिकारियों की भीड़ का नेतृत्व करते देखा गया। धन सिंह कोतवाल अपने गांव पांचली और आस-पास के क्रान्तिकारी गूजर बाहुल्य गांव घाट, नंगला, गगोल आदि की जनता के सम्पर्क में थे, धन सिंह कोतवाल का संदेश मिलते ही हजारों की संख्या में क्रान्तिकारी रात में मेरठ पहुंच गये।</div>
<div dir="auto"></div>
<div dir="auto">इस क्रान्तिकारी भीड़ ने धन सिंह कोतवाल के नेतृत्व में देर रात दो बजे जेल तोड़कर 836 कैदियों को छुड़ा लिया  और जेल को आग लगा दी । मेरठ शहर और कैंट में जो कुछ भी अंग्रेजों से सम्बन्धित था उसे यह क्रान्तिकारियों की भीड़ पहले ही नष्ट कर चुकी थी।</div>
<div dir="auto"></div>
<div dir="auto">उपरोक्त वर्णन और विवेचना के आधार पर हम निःसन्देह कह सकते हैं कि वीर धन सिंह कोतवाल ने 10 मई, 1857 के दिन मेरठ में क्रांति में मुख्य भूमिका का निर्वाह करते हुए क्रान्तिकारियों को नेतृत्व प्रदान किया था।</div>
<div dir="auto">राष्ट्रवादी इतिहासकार वी0 डी0 सावरकर और सब-आल्टरन इतिहासकार रंजीत गुहा ने 1857 की क्रान्ति की उन क्रान्तिकारी घटनाओं का वर्णन किया है, जिनमें कि जनता ने क्रान्ति में व्यापक स्तर पर भाग लिया था, इन घटनाओं का वर्णन मेरठ में जनता की सहभागिता से ही शुरू हो जाता है।</div>
<div dir="auto"></div>
<div dir="auto">और समस्त पश्चिम उत्तर प्रदेश के बहुत सारे निवासियों व किसानों ने 1857 की क्रान्ति में व्यापक स्तर पर भाग लिया। पूर्वी उत्तर प्रदेश में भी क्रांति में ताल्लुकदारों ने अग्रणी भूमिका निभाई। किसानों, बुनकरों और कारीगरों ने अनेक स्थानों पर क्रान्ति में भाग लिया। 1857 की क्रान्ति के व्यापक आर्थिक, सामाजिक, धार्मिक और राजनीतिक कारण थे और विद्रोही जनता के हर वर्ग से आये थे, ऐसा अब आधुनिक इतिहासकार सिद्ध कर चुके हैं। अतः 1857 का गदर मात्र एक सैनिक विद्रोह नहीं वरन् जनसहभागिता से पूर्ण एक राष्ट्रीय स्वतन्त्रता संग्राम था। परन्तु 1857 में जनसहभागिता की शुरूआत कहाँ और किसके नेतृत्व में हुई ? इस जनसहभागिता की शुरूआत के स्थान और इसमें सहभागिता प्रदर्शित वाले लोगों को ही 1857 की क्रान्ति का जनक कहा जा सकता है। क्योंकि 1857 की क्रान्ति में जनता की सहभागिता की शुरूआत वीर धन सिंह कोतवाल के नेतृत्व में मेरठ की जनता ने की थी। अतः इतिहासकारों के अनुसार ये ही 1857 की क्रान्ति के जनक कहे जाते हैं।</div>
<div dir="auto"></div>
<div dir="auto">10, मई 1857 को मेरठ में जो महत्वपूर्ण भूमिका धन सिंह और उनके अपने ग्राम पांचली के भाई बन्धुओं ने निभाई उसकी पृष्ठभूमि में अंग्रेजों के जुल्म की दास्तान छुपी हुई है। ब्रिटिश साम्राज्य की औपनिवेशिक अर्थव्यवस्था की कृषि नीति का मुख्य उद्देश्य सिर्फ अधिक से अधिक लगान वसूलना था। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में अंग्रेजों ने महलवाड़ी व्यवस्था लागू की थी, जिसके तहत समस्त ग्राम से इकट्ठा लगान तय किया जाता था और मुखिया अथवा लम्बरदार लगान वसूलकर सरकार को देता था। लगान की दरें बहुत ऊंची थी, और उसे बड़ी कठोरता से वसूला जाता था। कर न दे पाने पर किसानों को तरह-तरह से बेइज्जत करना, कोड़े मारना और उन्हें जमीनों से बेदखल करना एक आम बात थी, किसानों की हालत बद से बदतर हो गई थी। धन सिंह कोतवाल भी एक किसान परिवार से सम्बन्धित थे। किसानों के इन हालातों से वे बहुत दुखी थे। धन सिंह के पिता पांचली ग्राम के मुखिया थे, अतः अंग्रेज पांचली के उन ग्रामीणों को जो किसी कारणवश लगान नहीं दे पाते थे, उन्हें धन सिंह के अहाते में कठोर सजा दिया करते थे, बचपन से ही इन घटनाओं को देखकर धन सिंह के मन में आक्रोष जन्म लेने लगा।</div>
<div dir="auto"></div>
<div dir="auto">ग्रामीणों के दिलो दिमाग में ब्रिटिश विरोध लावे की तरह धधक रहा था। 1857 की क्रान्ति में धन सिंह और उनके ग्राम पांचली की भूमिका का विवेचन करते हुए हम यह नहीं भूल सकते कि आजादी के महा नायक धन सिंह गूजर जाति में जन्में थे, उनका गांव गूजर बहुल था। 1857 के सैनिक विद्रोह में समस्त पश्चिमी उत्तर प्रदेश में देहरादून से लेकिन दिल्ली तक, मुरादाबाद, बिजनौर, आगरा, झांसी तक। पंजाब, राजस्थान से लेकर महाराष्ट्र तक के गूजर व अन्य लोग इस स्वतन्त्रता संग्राम में कूद पड़े। इस क्रांति में हजारों की संख्या में लोग शहीद हुए और लाखों को ब्रिटेन के दूसरे उपनिवेषों में कृषि मजदूर के रूप में निर्वासित कर दिया। जिस में अधिकांश गुजर बिरादरी से थे।</div>
<div dir="auto"></div>
<div dir="auto">1857 की क्रान्ति के कुछ समय पूर्व की एक घटना ने भी वीर धन सिंह और  ग्रामवासियों को अंग्रेजी शासन को उखाड़ फेंकने के लिए प्रेरित किया। पांचली और उसके निकट के ग्रामों में प्रचलित किंवदन्ती के अनुसार घटना इस प्रकार है, ”अप्रैल का महीना था। किसान अपनी फसलों को उठाने में लगे हुए थे। एक दिन करीब 10-11 बजे के आस-पास बजे दो अंग्रेज तथा एक मेम पांचली खुर्द के आमों के बाग में थोड़ा आराम करने के लिए रूके। इसी बाग के समीप पांचली गांव के तीन किसान जिनके नाम मंगत सिंह, नरपत सिंह और झज्जड़ सिंह (अथवा भज्जड़ सिंह) थे, कृषि कार्यो में लगे थे। अंग्रेजों ने इन किसानों से पानी पिलाने का आग्रह किया। अज्ञात कारणों से इन किसानों और अंग्रेजों में संघर्ष हो गया। इन किसानों ने अंग्रेजों का वीरतापूर्वक सामना कर एक अंग्रेज और मेम को पकड़ दिया। एक अंग्रेज भागने में सफल रहा। पकड़े गए अंग्रेज सिपाही को इन्होंने हाथ-पैर बांधकर गर्म रेत में डाल दिया और मेम से बलपूर्वक दायं हंकवाई। दो घंटे बाद भागा हुआ सिपाही एक अंग्रेज अधिकारी और 25-30 सिपाहियों के साथ वापस लौटा। तब तक किसान अंग्रेज सैनिकों से छीने हुए हथियारों, जिनमें एक सोने की मूठ वाली तलवार भी थी, को लेकर भाग चुके थे। अंग्रेजों की भारतीयों के प्रति दण्ड व दमनकारी नीति बहुत कठोर थी, इस घटना की जांच करने और दोषियों को गिरफ्तार कर अंग्रेजों को सौंपने की जिम्मेदारी धन सिंह के पिता, जो कि गांव के मुखिया थे, को सौंपी गई। ऐलान किया गया कि यदि मुखिया ने तीनों बागियों को पकड़कर अंग्रेजों को नहीं सौपा तो सजा गांव वालों और मुखिया को भुगतनी पड़ेगी। बहुत से ग्रामवासी भयवश गाँव से पलायन कर गए। अन्ततः नरपत सिंह और झज्जड़ सिंह ने तो समर्पण कर दिया किन्तु मंगत सिंह फरार ही रहे। दोनों किसानों को 30-30 कोड़े और जमीन से बेदखली की सजा दी गई। फरार मंगत सिंह के परिवार के तीन सदस्यों के गांव के समीप ही फांसी पर लटका दिया गया। धन सिंह के पिता को मंगत सिंह को न ढूंढ पाने के कारण छः माह के कठोर कारावास की सजा दी गई। इस घटना ने धन सिंह सहित पांचली के बच्चे-बच्चे को विद्रोही बना दिया। जैसे ही 10 मई को मेरठ में सैनिक बगावत हुई धन सिंह और सभी क्रांतिकारियों ने क्रान्ति में सहभागिता की शुरूआत कर इतिहास रच दिया था।</div>
<div dir="auto"></div>
<div dir="auto">10 मई 1857 की क्रान्ति मे अग्रणी भूमिका निभाने की सजा के रूप में वीर कोतवाल धन सिंह गुर्जर और पांचली व अन्य ग्रामों के किसानों को मिली। मेरठ गजेटियर के वर्णन के अनुसार 4 जुलाई, 1857 को प्रातः चार बजे पांचली पर एक अंग्रेज रिसाले ने तोपों से हमला किया। रिसाले में 56 घुड़सवार, 38 पैदल सिपाही और 10 तोपची थे। पूरे ग्राम को तोप से उड़ा दिया गया। सैकड़ों किसान मारे गए, जो बच गए उनमें से 46 लोग कैद कर लिए गए और इनमें से 40 को बाद में फांसी की सजा दे दी गई। आचार्य दीपांकर द्वारा रचित पुस्तक स्वाधीनता आन्दोलन और मेरठ के अनुसार पांचली के 80 लोगों को फांसी की सजा दी गई थी। पूरे गांव को लगभग नष्ट ही कर दिया गया। ग्राम गगोल के भी 9 लोगों को दशहरे के दिन फाँसी की सजा दी गई और पूरे ग्राम को नष्ट कर दिया। आज भी इस ग्राम में दश्हरा नहीं मनाया जाता।</div>
<div dir="auto">10 मई 1857 में देश की आजादी के जंग की शुरुआत करने वाले वीर कोतवाल धन सिंह गुर्जर व अन्य सभी महान क्रांतिकारियों को जिन्होंने देश आजादी के लिए अपने प्राणों को माँ भारती के चरणों में न्यौछावर कर दिया था को कोटि-कोटि नमन् करती है ।। जय हिन्द जय भारत ।।</div>
<div dir="auto">मेरा भारत मेरी शान मेरी पहचान ।।</div>
<div dir="auto"></div>
<div dir="auto">*दीपक कुमार त्यागी एडवोकेट,*</div>
<div dir="auto"> स्वतंत्र पत्रकार व अध्यक्ष,</div>
<div dir="auto">श्री सिद्धिविनायक फॉउंडेशन (SSVF)</div>
]]></content:encoded>
					
		
		
			</item>
	</channel>
</rss>

<!--
Performance optimized by W3 Total Cache. Learn more: https://www.boldgrid.com/w3-total-cache/?utm_source=w3tc&utm_medium=footer_comment&utm_campaign=free_plugin

Page Caching using Disk: Enhanced 
Lazy Loading (feed)

Served from: dainikbhaskarup.com @ 2026-04-27 19:39:27 by W3 Total Cache
-->