राधा नाम का जाप दिलाता है मोक्ष: कुमार स्वामी

भास्कर समाचार सेवा

चौमुहां। शिक्षक और गुरु में जमीं-आसमान का अंतर होता है। शिक्षक केवल शिक्षा देता है जो मन, चित्त, बुद्वि द्वारा ग्रहण की जाती है। मन से मन को, चित्त से चित्त को और बुद्वि को बुद्वि से शिक्षा मिलती है। जो कि भौतिक है अर्थात अपरा है। भगवान श्रीकृष्ण ने
कहा है कि मन, चित्त, बुद्धि मेरी निकृष्ट प्रकृति है। गुरु का प्रारूप परा है। गुरु आत्मिक ज्ञान प्रदान करता है। ये उद्गगार ब्रह्मर्षि कुमार स्वामी ने गुरु पूर्णिमा के अवसर पर चौमुहां, वृंदावन के श्री राधा कृष्ण स्वर्ण मन्दिर धाम के प्रांगण में आयोजित प्रभु कृपा दुख निवारण समागम के दूसरे दिन व्यक्त किए।
ब्रह्मर्षि  कुमार स्वामी ने कहा कि राधा को यदि उल्टा लिखें तो धारा बन जाती है जो हमारे जीवन की रफरतार को तय करती है। राधा भवसागर के कष्टों का हरण करने वाली आदिशक्ति मां भगवती है। भगवान श्रीकृष्ण और मां राधा दोनों ही का एक प्रारूप है।
यदि आप राध नाम का जाप करेंगे तो बांके बिहारी दौड़े चले आएंगे। इस सारे ब्रह्मांड की स्वामिनी मां राधा हैं जो भगवती मां दुर्गा का ही रूप हैं। भगवान श्रीकृष्ण के प्रारूप से ही मां राधा प्रकट हुई थी।

मां राधा साक्षात राज राजेश्वरी हैं जो समस्त कामनाओं की पूर्ति करती हैं। इनके नाम का पाठ करने वाले साध्क परमधाम  को प्राप्त करते हैं जो बड़े-बड़े संतों को भी दुर्लभ है। मां राधा की कृपा से साध्क कहीं भी पराजित नहीं होता है। इनकी कृपा से मनुष्य अपने सांसारिक कर्तव्यों का पालन करते हुए अंततः मोक्ष को प्राप्त करता है।
भगवान श्री लक्ष्मी नारायण धाम के महासचिव गुरुदास ने कहा कि जहां यह समागम हो रहा है यहां पर श्री राधा कृष्ण स्वर्ण मंदिर धम का निर्माण प्रारंभ हो चुका है। यहां पर श्री राधा कृष्ण स्वर्ण मंदिर के अतिरिक्त गुरुकुल, अनाथ आश्रम और विश्वविद्यालय भी बनाए जाएंगे। इस बहुआयामी योजना का लाभ देश ही नहीं विदेशी श्रद्धालुओं को भी मिलेगा। इसके लिए तैयारियां की जा रही हैं और अतिशीघ्र ही इस प्रारूप को सार्वजनिक रूप से देखा जा सकेगा। गुरुदास जी ने कहा कि भारतीय सनातन शक्ति और संत परंपरा का पूरे विश्व में सम्मान हो रहा है। पाश्चात्य संस्कृति वाले शक्तिशाली राष्टं अपने देशों में संत के नाम पर दिवस घोषित कर रहे हैं जो हर भारतवासी के लिए अत्यंत गौरव की बात है। अमेरिका जैसे देशों के आम नागरिक ही नहीं बल्कि सांसद, अधिकारी, न्यायधीश भी प्रभु कृपा के इस दुर्लभ आलोक को भक्ति और प्रसन्नता पूर्वक ग्रहण कर रहे हैं। पाश्चात्य देशों के डाक्टर, वैज्ञानिक और बुद्विजीवी इस शास्त्रोक्त तथ्य तथा बीजमंत्रों की शक्ति को स्वीकार करने लगे हैं। 

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