भारेश्वर मन्दिर में उमडा़ श्रद्धा और भक्ति का सैलाव

अति प्राचीन काल में तीर्थ क्षेत्र के नाम से जाना जाता था,पचनद महासंगम

भास्कर समाचार सेवा

चकरनगर/इटावा। उत्तर भारत के सबसे प्राचीन भारेश्वर मंदिर पर श्रावण मास में लगने वाला मेले में श्रद्धा और भक्ति का अनूठा संगम देखने को मिल रहा है। सावन मास के तीसरे सोमवार को हजारों भक्तों ने भगवान शिव का जल,गंगाजल,दूध,धृत एवं शहद से अभिषेक किया। इस दौरान पूरा संगम तट बम-बम भोले के जयघोष से गूंजता रहा।श्रावण मास में अब तक करीब 30 हजार श्रद्धालुओं द्वारा पूजा अर्चना का अनुमान है।
बताते चलें कि कुख्यात डाकुओं की शरणस्थली के तौर पर बदनाम चंबल घाटी में स्थित हजारों साल पुराना मंदिर भारेश्वर महादेव महाभारत के मुख्य पात्र पांडवों की आस्था का केंद्र रहा है। 444 फीट ऊंचाई पर बना भारेश्वर मंदिर तक पहुंचने के लिए 108 सीढ़ियां से गुजरना पड़ता है।यहाँ पर विद्या वारिधि की उपमा से विभूषित बनारस के विद्वान नीलकंठ भट्ट ने कर्मकांड एवं दंड के 12 मयूख (ग्रंथ) एवं आयुर्वेदिक ग्रंथ इसी मंदिर में रहकर लिखा थे। तथा आगरा जाते समय गोस्वामी तुलसीदास भी इस मंदिर में कुछ समय रहे। स्वतंत्रता संग्राम से भी इस मंदिर का ताल्लुक रहा है। बताते हैं कि भरेह के राजा रूपसिंह ने नाना फडणवीस,तात्या टोपे,रानी लक्ष्मीबाई एवं चकरनगर स्टेट के राजकुँवर निरंजन सिंह के साथ मिलकर अंग्रेजी साम्राज्य के खिलाफ इस स्थल पर सेना की एक प्रशिक्षण कार्यशाला बनाई थी। पं.नीलकंठ भट्ट के वंशज दीपचन्द्र भट्ट बताते हैं कि एक बार जब अंग्रेजों ने मंदिर को घेर लिया तो मंदिर से निकले बर्रो ने उन्हें पीछे हटने पर मजबूर कर दिया था।मन्दिर के श्री महंत चम्बल गिरी के अनुसार पूर्व वैदिक,वैदिक एवं उत्तर वैदिक काल में पचनद महासंगम की पाँच योजन(60 किलोमीटर)की परिधि को तीर्थ क्षेत्र के नाम से जाना जाता था।महाभारत काल में जब कौरवों एवं पाण्डवों के मध्य युद्ध चल रहा था,तो उस समय भगवान श्रीकृष्ण के अग्रज बलदाऊ जी इसी क्षेत्र में तपस्या कर रहे थे।

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