14 वी शताब्दी से भर्र राजा छत्रशाल का इतिहास छिपा है एतिहासिक जरवल मे फिर भी पर्यटन केन्द्र के लाले

कांश सीएम की नजरे यहाँ भी इनायत हो जाती ?

कुतुब अंसारी/अशोक सोनी

जरवल/बहराइच। परम्पराओ और प्राचीन धरोहर को अपने मे सँजोये चौदहवीं शताब्दी का ऐतिहासिक रानीताल व सती चौरा के अलावा त्रिलोकी ताल जनप्रतिनिधियों की उपेक्षा का शिकार हैं । पिछले चार दशकों से लगातार इसे पर्यटन केन्द्र घोषित किए जाने की मांग की जा रही हैं ।

किन्तु सफलता नही मिल सकी है । यहाँ की स्थिति यह है कि रानीताल के साथ ही सती चौरा का देवी मंदिर भी कम उपेक्षा का शिकार नही हैं ।चारो ओर से गन्दगी के कारण उधर से निकलना दूभर हैं । पेयजल सहित वहाँ की सफ़ाई की भी कोई व्यवस्था नही है । जल कुम्भी व गन्दगी से एक हेक्टेयर क्षेत्रफल में फैला रानी तालाब धीरे धीरे अपना अस्तित्व खो रहा है काफी कुछ लोगो ने इस पर अवैध कब्जा तक कर रखे हैं।ज्ञातब्य हैं कि नगर पंचायत के पूर्व में स्थित इस तालाब को चौदहवी शताब्दी के पूर्वाद्ध में भर्र राजा छत्रसाल की पत्नी ने खोदवाया था जहाँ पूजा अर्चना के लिए पूर्व दिशा में देवी मंदिर की भी स्थापना कराई गई थी ।

नाग पंचमी पर्व पर यहाँ एक बड़ा यज्ञ होता था , जो एक मेले के रूप में धारण करता था । दूर दराज से भर्र सम्प्रदाय के लोग इसमे सम्मिलित होते थे । देवी मंदिर तथा सती चौरा का जीणो उद्धार नगर के छेदी लाल निषाद द्वारा दो दशक पूर्व 1993 में कराया । इसका उद्घाटन 12 दिसम्बर 1993 को क्षेत्रीय सांसद लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी ने किया था । रानी ताल के उत्तर में ईटो का एक टीला था जो सती चौरा के नाम जाना जाता था । कहां जाता हैं कि 1304 ईसवीं में ईरान देश के सय्यद अब तालिब के वंशज सय्यद जिक्रिया एव भर्र राजा छत्रसाल के मध्य हुए युद्ध में उनके पुत्र त्रिलोकीनाथ वीरगति को प्राप्त हुए थे । त्रिलोकीनाथ की पत्नी अपने पति के शव के साथ चिता में भस्म हो गई थी । बाद में यही स्थान सती चौरा के नाम से प्रसिद्ध हुआ था ।

महिलाएं आज भी नाग पंचमी , विवाह के अतिरिक्त मुंडन तथा विभिन्न पर्वो पर यहाँ पूजा अर्चना करती थी लेकिन दुर्व्यवस्था के कारण कोई वह धार्मिक अनुष्ठान की कौन कहे कोई एक दीप तक जलाने नही जाता। बताते चले जरवल धनसरी मार्ग के उत्तर छत्रसाल के पुत्र त्रिलोकीनाथ का खोदवाया हुआ त्रिलोकी ताल भी मौजूद है । कहा जाता हैं कि भर्रो के यहाँ कन्या का विवाह होता था तो इसी ताल की मिट्टी से चौका दिया जाता था । महिलाएं आज भी इसी ताल पर पूजा अर्चना करती हैं । कटी नाले के उत्तर विरीडीह स्थिति है जहाँ छत्रसाल का प्रधान सेनापति वीर सिंह रहता था । जानकारों की माने तो
दिसम्बर 1978 में पूर्व प्रदेश सरकार मंत्री बाबूलाल वर्मा ने केंद्रीय पर्यटन मंत्री से मिलकर ऐतिहासिक रानीताल को पर्यटन केंद्र बनाने की माँग की । सन 1984 में नगर पंचायत सचिव ने रानीताल , देवी मंदिर , सती चौरा , आदि ऐतिहासिक स्थलों के पुनरूद्धार एव सुंदरी करण के लिए चार लाख रुपए का बजट बनाकर शासन को भेजा था । पूर्व जिलाधिकारी पंकज कुमार ने दो बार यहाँ आकर पत्रकरो के साथ रानीताल का स्थालीय निरीक्षण कर पर्यट्न केंद्र बनाने की संस्तुति की थी । उनके स्थानांतरित के बाद योजना खटाई पड़ गईं । स्थिति यह है की वर्तमान में रानीताल के पूर्व एव दक्षिण में खडंजा पूरी तरह से ध्वस्त हो चुका है ।

सती चोरा से देवी मंदिर तथा रानीताल जाने वाला मार्ग पूरी तरह से अतिक्रमण का शिकार हैं । उक्त मार्ग को 1993 में तहसीलदार कैसरगंज द्वारा कानूनगो एव लेखपाल के साथ पैमाइस कराकर आवागमन के लिए खोल दिया गया था । बाद दबंग लोगो द्वारा उस पर कब्जा कर लिया गया । अब सती चौरा के चारो ओर झाड़ियो के मध्य घिरा है । देवी मंदिर का फाटक चोर तोड़कर उठा ले गये । पूरे मन्दिर के प्रांगण में घास सहित जबरदस्त गन्दगी हैं । छत्रसाल स्मारक समिति ने केंद्रीय मंत्री एव प्रदेशीय पर्यट्न मंत्री को पत्र भेज कर जांच के पश्चात ऐतिहासिक स्थलों का उद्धार कराकर उसे पर्यट्न केंद्र घोषित किये जाने माँग की है ।अब देखना है कि उत्तर प्रदेश सरकार के मुखिया योगी आदित्य नाथ जी जरवल के ऐतिहासिक धरोहर अपने नजरे कब इनायत करते हैं ?

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