नम्बरो का डर है ARITHMOPHOBIA, इसके बारे में ये महत्वपूर्ण बाते नहीं जानते होंगे आप …..

एक फोबिया है Arithmophobia। संख्याओं के डर को एरिथमोफोबिया कहा जाता है। चूंकि यह फोबिया नंबरों से जुड़ा है, इसलिए इसे न्यूमेरोफोबिया के रूप में भी जाना जाता है। यह फोबिया व्यक्ति के दैनिक जीवन को प्रभावित करता है, क्योंकि इससे उसे रोजमर्रा के जीवन में किसी सवाल को हल करना या नंबरों का जोड़-तोड़ करना काफी कठिन लगता है। यहां तक कि किसी तरह की कैलकुलेशन करने का ख्याल भी उसे परेशान कर देता है। इसे एक एंग्जाइटी डिसआर्डर माना गया है। तो चलिए जानते हैं विस्तार से इसके बारे में-

ध्यान देने वाली बात ये है की एरिथमोफोबिया होने पर व्यक्ति बेहद आसानी से इससे बाहर आ सकता है। आज ऐसी कई थेरेपी हैं, जो आपके मन के संख्याओं के भय को दूर कर सकती है। इसमें दवाओं के साथ-साथ साइकोथेरेपी को भी शामिल किया जाता है। वैसे ड्रग्स का इस्तेमाल तब किया जाता है, जब पीड़ित व्यक्ति में कोई खास अंतर न दिखाई दे रहा हो क्योंकि दवाइ्रयों से न उन्हें सिर्फ इसकी आदत पड़ जाती है, बल्कि इसके कई तरह के साइड इफेक्ट्स भी होते हैं।  हालांकि कुछ मामलों में एंटी-डिप्रेसेंट दवाईयों का इस्तेमाल किया जा सकता है। इलाज के अन्य तरीकों में विशेष रूप से न्यूरो लिंग्विस्टिक प्रोग्रामिंग थेरेपी का उपयोग इस फोबिया पर काबू पाने के लिए किया जा सकता है। इस थेरेपी में ब्रेन को कुछ इस तरह से रिप्रोग्राम किया जाता है कि आपके मन-मस्तिष्क में नंबरों के प्रति बैठा डर आसानी से दूर हो जाता है। इसके अलावा एक्सपोज़र थेरेपी और हिप्नोथेरेपी भी एरिथमोफोबिया को दूर करने में सहायक है।

ये ध्यान दे की न्यूमेरोफोबिया होने पर व्यक्ति में कई लक्षण नजर आते हैं। ऐसे व्यक्ति को अत्यधिक चिंता, भय और घबराहट से जुड़ी कोई भी चीज जैसे सांस की तकलीफ, तेजी से सांस लेना, अनियमित धड़कन, अत्यधिक पसीना आना, मितली, मुंह सूखना, शब्दों या वाक्यों को व्यक्त करने में असमर्थता आदि। यह फोबिया किसी भी व्यक्ति के लिए विशेष रूप से नुकसानदायक है क्योंकि हम सभी किसी न किसी रूप में रोजमर्रा की जिंदगी में कैलकुलेशन करते हैं या नंबरों से हमारा सामना होता हे। लेकिन न्यूमेरोफोबिया पीड़ित अक्सर सामाजिक रूप से अयोग्य होते हैं और मैथ्स में अच्छे लोग उन्हें छोटा समझते हैं। यही कारण है कि, यह फोबिया व्यक्ति के सामाजिक विकास को प्रभावित कर सकता है और एक निरंतर हीन भावना को जन्म दे सकता है।

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