बिहार से ही यूपी-बंगाल को साधने की कोशिश में बीजेपी

पटना। बिहार में नए मंत्रिमंडल के गठन के बाद से बवाल मचा हुआ है। मेवालाल चौधरी प्रकरण को लेकर सरकार और एनडीए की भारी फजीहत हुई। इस बीच पिछले कैबिनेट के कई मंत्रियों को भी इस बार करीने से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया है।

पूर्व उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी को बिहार विधान परिषद की आचार समिति का अध्यक्ष बना दिया गया है, वहीं एक और पूर्व मंत्री संजय झा को भी विधान परिषद की एक समिति में भेज दिया गया है। जाहिर है कि दोनों का मंत्री पद पर आने का रास्ता अब बंद हो चुका है।

बीजेपी के एक और बड़े चेहरे नन्दकिशोर यादव को भी इस बार के पहले मंत्रिमंडल गठन में जगह नहीं मिली है। कहा जा रहा है कि बीजेपी उन्हें विधानसभा के अध्यक्ष पद पर बिठाना चाहती है।

मंत्रिमंडल विस्तार को लेकर कई तरह की चर्चाएं चल रही हैं। कई बड़े चेहरे लामबंदी में जुटे हुए हैं। बीजेपी की ओर से विधान पार्षद संजय मयूख के नाम की चर्चा पहले कैबिनेट गठन में ही हो रही थी, पर अब कहा जा रहा है कि अंतिम समय में उनका पत्ता कट गया था। सवर्ण कायस्थ वर्ग से आने वाले संजय मयूख पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता और राष्ट्रीय मीडिया सह प्रभारी हैं। वे उस सारण जिला से आते हैं, जिस सारण जिला के किसी चेहरे को नीतीश कुमार के पिछले कैबिनेट में भी जगह नहीं मिल सकी थी।

पिछले कैबिनेट में कृषि मंत्री रहे प्रेम कुमार को भी इस बार जगह नहीं मिली है। प्रेम कुमार पार्टी के बड़े नेता हैं और इसे लेकर उनके समर्थकों में रोष बताया जा रहा है। यह देखना भी दिलचस्प होगा कि कैबिनेट विस्तार में उन्हें जगह मिल पाती है या नहीं।

बताया जा रहा है कि बीजेपी इस बार फूंक-फूंक कर कदम रख रही है और उसकी निगाह अभी से साल 2025 में होने वाले अगले बिहार विधानसभा चुनावों तथा अगले साल बंगाल और साल 2022 में यूपी के विधानसभा चुनावों पर बनी हुई है। इन सबका ध्यान रखते हुए ही मंत्रिमंडल के चेहरे तय किए जाएंगे। लिहाजा पूरी कमान एक तरह से केंद्रीय नेतृत्व ने थाम रखी है।

नीतीश सरकार के शपथ ग्रहण के दिन 16 नवंबर को बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा और गृहमंत्री अमित शाह बिहार आए थे। हालांकि कहा गया था कि दोनों शपथ ग्रहण समारोह में शामिल होने आए थे, पर खबर है कि शपथ ग्रहण समारोह के बाद मंत्रियों के बीच विभागों के बंटवारे और कैबिनेट के गठन और विस्तार को लेकर भी देर रात तक दोनों ने स्थानीय बड़े नेताओं के साथ गहन मंत्रणा की।

इस बार बीजेपी बड़े भाई की भूमिका में है, चूंकि चुनाव में उसे 74, जबकि जेडीयू को महज 43 सीटें मिली हैं। लिहाजा बीजेपी की नजर विधानसभा अध्यक्ष की महत्वपूर्ण कुर्सी पर है। इस बार एनडीए को मामूली अंतर से बहुमत मिलने के कारण विधानसभा अध्यक्ष की भूमिका अगले 5 सालों तक महत्वपूर्ण रहने वाली है।

बिहार कैबिनेट का अभी विस्तार होना है, चूंकि प्रावधानों के अनुसार 36 मंत्री बनाए जा सकते हैं और अभी मंत्रिमंडल में मुख्यमंत्री समेत कुल 15 सदस्य हैं। 21 और को अभी मंत्रिमंडल में जगह मिलने वाली है। ऐसे में कैबिनेट विस्तार पर सबकी निगाहें टिकी हुई हैं कि यह कब होता है और किस-किस को इसमें जगह मिलती है।

यह भी चर्चा है कि बीजेपी इस बार विधायकों की संख्या के आधार पर मंत्रिमंडल में हिस्सेदारी चाहती है, चूंकि इससे पहले भी एनडीए की पिछली सरकारों में जेडीयू इसी फार्मूले पर चलती रही है, हालांकि उस समय बीजेपी के विधायकों की संख्या कम और जेडीयू के विधायकों की संख्या ज्यादा हुआ करती थी। इस बार यह फार्मूला चला तो बीजेपी की ओर से 20-22 और जेडीयू की ओर से 12 मंत्री हो सकते हैं।

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