यूपी में कोरोना के बीच दिमागी बुखार का कहर, अस्पताल में भर्ती 38 में 5 बच्चों ने तोडा दम !

लखीमपुर/खीरी। यूपी के लखीमपुर खीरी में कोविड-19 सहित संक्रामक बीमारियों ने भी पांव पसार लिया है, जिसके चलते जिला और निजी अस्पतालों में पीड़ितों की भीड़ उमड़ पड़ी है। इनमें सबसे ज्यादा संख्या संक्रमित बुखार पीड़ितों की हैं। पिछले 15 दिनों में जिला अस्पताल में ही बुखार से 38 पीड़ित बच्चे भर्ती हुए हैं, जिनमें से अब तक 5 की इलाज के दौरान मौत हो गई।

पीड़ितों से बातचीत के बाद पता चला कि सभी भर्ती होने वाले बच्चों में 13 बच्चे एक्यूट इंसेफेलाइटिस सिंड्रोम तथा 2 बच्चे जापानी इंसेफेलाइटिस नामक बीमारी से संक्रमित मिले हैं। परिजन कहते हैं, संक्रामक बीमारियों का मुख्य कारण गंदगी और जलभराव है। शहर हो या फिर गांव, साफ सफाई और पानी जमा होने की समस्या हर जगह एक ही जैसी बनी हुई है। न तो इस ओर नगर पालिका के जिम्मेदार ध्यान देते हैं और न ही गांव के प्रधान। जिसका परिणाम है कि कोरोनाकाल में संक्रामक बीमारियों ने भी अपने पांव तेजी से पसारने शुरू कर दिए हैं। 

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जलभराव होने से मच्छर पनपते हैं, जो गम्भीर बीमारियों का कारण बन रहा हैं। इसी का परिणाम है कि इतनी संख्या में बच्चों कि मौत हो गई। जिम्मेदारों की उदासीनता के चलते एक से 15 सितंबर तक बुखार से पीड़ित भर्ती होने वाले 38 बच्चों में से पांच बच्चे असमय मौत के मुंह में समा चुके हैं। 

बुखार आने पर चिल्ड्रन वार्ड में हरगावं निवासी खगेश्वर अपनी तीन माह की बेटी बेबी और बरखेरवा निवासी रामगोपाल 12 साल की पुत्री अंशिका को लेकर जिला अस्पताल पहुँचे। हालत गंभीर होने पर दोनों को भर्ती कर इलाज शुरू कर दिया गया। जिला अस्पताल में 15 दिन के भीतर चिल्ड्रन वार्ड में 38 बच्चे भर्ती हुए हैं। जिनमें से बुखार पीड़ित 5 की मौत हो गई है। 

गांव में गंदगी का अंबार

पड़रिया तुला में बुखार पीड़ित किशोरी की मौत होने के बावजूद न तो स्थानीय जिम्मेदार चेते और न ही जिला प्रशासन। जिम्मेदारों की उदासीनता का आलम यह है कि गांव के गलियारों में पानी भरा है और जगह-जगह पर कूड़े के ढेर लगे हैं।

ये हालात तब है जब जिले में पिछले माह संक्रामक रोग नियंत्रण पखवाड़ा मनाया जा चुका है और कोरोनाकाल भी चल रहा है। गांव निवासी 12 साल की नंदिनी को बुुखार आने पर घरवालों ने कस्बे से लेकर जिला मुख्यालय तक दिखाया, लेकिन फायदा न होने पर मेडिकल कॉलेज लखनऊ लेकर गए। कुछ दिन इलाज चलने के बाद उसकी मौत हो गई। परिजनों का कहना है कि डॉक्टरों ने दिमागी बुखार बताया था।

जिम्मेदारों को सूचना का इंतजार 

बिजुआ के सीएचसी प्रभारी डॉ. अमित सिंह का कहना है कि यदि नंदिनी की मौत दिमागी बुखार से हुई होती तो मेडिकल कॉलेज से सूचना मिलती। मगर अब तक तो सूचना मिली नहीं। कई बार मिलते-जुलते लक्षणों से भी मौत हो जाती है। जानकारी मिली है, जल्द ही गांव टीम भेजकर क्लोरीन गोली का वितरण कराने के साथ ब्लीचिंग पाउडर का छिड़काव कराया जाएगा, जिससे संक्रामक रोग के फैलाव को रोका जा सके।

सफाईकर्मी आता नहीं तो कैसे हो सफाई

इस मामले में ग्राम प्रधान पति विजय सिंह का कहना है कि सफाई कर्मचारी प्रमोद कुमार बेहजम का रहने वाला है और कभी कभार ही आता है। खुद सफाई न करके कुछ लोगों से सफाई करवाता है। आज तक उसे किसी ने सफाई करते नहीं देखा। जबकि इसके बारे में अधिकारियों को अवगत करा चुके हैं। फिलहाल फॉगिंग मशीन खरीदी है, जिससे छिड़काव कराया जाता है। जल्द ही पड़रिया तुला में भी फॉगिंग होगी।

महिला अस्पताल के वरिष्ठ बाल रोग विशेषज्ञ डॉक्टर आईबी त्रिपाठी ने जनज्वार को बताया कि संक्रामक बीमारियों का मुख्य कारण गंदगी और जलभराव है, इसलिए सफाई पर विशेष ध्यान देना चाहिए, खासकर बच्चों के मामलों में। घर और इसके आस पास पानी न जमा होने दें। बुखार आने पर गांव में इधर उधर इलाज न कराकर सरकारी अस्पताल ही आकर दिखाएं। हालांकि 5 बच्चों की मौत पर वह चुप्पी साध गए।

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