गोरखपुर : साईं महोत्सव पर उमड़ रही श्रद्धालुओं की भीड़


गोपाल त्रिपाठी
गोरखपुर। साईं बाबा को यूं तो शिरडी का साईं कहा जाता है क्योंकि उनकी जिंदगी का ज्यादातर समय शिरडी में ही बीता। मान्यता भी यही है कि साईं शिरडी में आज भी निवास करते हैं, लेकिन उनके मंदिर अब शिरडी में ही नहीं बल्कि देश के हर कोने और हर गली में मिल जाएंगे। इन्हीं मे से एक बडहलगंज क्षेत्र के खडेसरी में स्थित साईं बाबा मंदिर। जहां पूजा पाठ के लिए श्रद्धालुओं की भीड निरंतर बढती जा रही है।


16 जनवरी 2013 को उपनगर से तीन किलोमीटर दूर खडेसरी में साईं बाबा मंदिर की आधारशिला रखी गई। बताया जाता है कि वर्ष 2012 में मिश्रौली निवासी श्रीनाथ तिवारी ने कस्बा के बाबा जलेश्वरनाथ व दिनेश्वरी माता मंदिर परिसर के समीप साईं बाबा मंदिर का निर्माण कराने की घोषणा की मगर कुछ लोगों के विरोध के चलते उनकी हसरत अधूरी रह गई। जिसके बाद मानव सेवा संस्थान के प्रबंधक आलोक गुप्ता ने मंदिर के लिए अपनी जमीन देने का प्रस्ताव दिया। 16 जनवरी 2013 को धूमधाम से मंदिर की आधारशिला रखी गई। अपेक्षित जनसहयोग न मिलने के बावजूद श्री गुप्त ने स्वयं के खर्च से दो साल के भीतर मंदिर को भव्य रूप प्रदान किया। साथ ही दुर्गा के नौ रूपों की प्रतिमा भी स्थापित हैं। नवरात्र हो या खिचडी, हर समय यहां पर श्रद्धालुओं का रेला लगा रहता है।

मंदिर में अमीर-गरीब हर तरह के भक्तों की भीड़ रहती है। मंदिर संस्थापक गुप्त कहते हैं कि साईं ने कभी खुद को किसी एक धर्म से नहीं बांधा। साईं के भक्तों में कितने भक्त किस मजहब के हैं ये कोई नहीं जानता है, लेकिन साईं ऐसे संत हैं जिन्हें हर धर्म के लोग मानते हैं। ये भक्त अपनी-अपनी श्रद्धा के मुताबिक साईं की भक्ति करते हैं। श्रद्धा और समर्पण की शक्ति ये है कि तमाम सकारात्मक ऊर्जाएं साईं भक्तों के लिए काम भी कर रही हैं। ये साईं बाबा की महिमा ही है, जो अपने दर तक आम और खास सभी को खींच लाती है। साईं खुद कहते थे कि सबका मालिक एक है। मंदिर के पुजारी राजेश पांडेय कहते हैं कि साईं को आज किस मजहब के लोग मानते हैं या नहीं मानते हैं, इससे भी कोई विशेष फर्क नहीं पड़ता। असली धर्म है स्वाधीनता, चिरशांति और शरणागति। साईं अपने धर्म को जान गए थे और बहुत सहज और सरल शब्दों में सभी को समझाने का प्रयास भी किया। श्रद्धा और सबुरी, शरणागति योग के सबसे सुंदर साधन हैं। ईश्वर साकार हो या निराकार समझ में सिर्फ शरणागति से ही आता है।

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