कृषि के नये कानूनो का विरोध करते हुए आन्दोलनरत किसान



किसान आंदोलनः किसान समझने को तैयार नहीं है या सरकार नहीं समझा पा रही है
-डाक्टर राहुल चतुर्वेदी-

-आंदोलन,आंदोलन ,आंदोलन-आज पूरे देश मे नए खेती कानूनो को वापिस लेने की मांग को लेकर चल रहा किसानांे का आंदोलन छाया हुआ है। हर किसी की जुबान पर सिर्फ और सिर्फ किसान आंदोलन का ही नाम चर्चा में है। कृषि के नये  कानूनों को लेकर आंदोलनरत किसानों के अपने तर्क हैं और सरकार के अपने तर्क। किसान इसे अपने लिए डेथ वारंट बता रहे हैं तो सरकार किसानों के लिए मुफीद बता रही है लेकिन आंदोलन है कि समाप्त होने के बजाय बढ़ता ही जा रहा है। जिससे स्पष्ट है कि या तो किसान इस मुददे पर कुछ समझने को तैयार नहीं है या फिर सरकार उन्हें समझा नहीं पा रही है या फिर राजनीति हो रही है।

मेरा मानना है कि जितनी शक्ति आंदोलन को चलाने और उसे समाप्त कराने में लग रही है यदि उससे आधी शक्ति कृषि के नये कानूनों को समझने में लगे तो मुझे नहीं लगता कि किसी को कोई सशंय रहेगा और आंदोलन की जरूरत पडेगी। मैं खुद एक किसान परिवार से हूं और ठीकठाक पढ़ा लिखा हूं। किसान के विकास के बारे में भी जानकारी रखता हूं। देशवर्ष मे फसल कटाई और उसके बाद ढुलाईए शीतगृह और भंडारण की उचित व्यवस्था न होने से प्रतिदिन 215 करोड़ के कृषि उत्पाद बर्बाद होते हैं। सप्लाई चेनएभंडारण और ट्रांसपोर्ट की बेहतर व्यवस्था कर फसल बर्बादी को काफी हदतक रोका जा सकता है।

फसल की कटाई से लेकर रखरखाव के लिए तकनीकी पर काम करने वाली संस्था सेट्रल इंस्टीटयूट आफ पोस्ट हार्वेस्ट इंजीनियरिंग एंड टेक्नालाॅजी के अनुसार कृषि इंफ्रास्ट्रक्चर न होने कारण एक लाख करोड के कृषि उत्पाद बर्बाद हो जाते हैं। इसमें अनाज 35 हजार करोड़एफल और सब्जी 33 हजार करोड़एमछलीए अंडा मीट व दूध 20 हजार करोड़ व मसाले दस हजार करोड़ के हैं। सिफेट के 2012..2015 के आंकड़ों पर नजर डाले तो कुल 16 प्रतिशत कृषि उत्पाद खराब हो जाते थे। जिसकी कीमत 92 हजार 651 करोड़ रूपये होती है। पिछले वर्षों के दौरान जहां तकनीक बेहतर हुई है वहीं कीमतों में भी बढ़ोतरी हुई है।

यह आंकड़ो एक लाख करोड़ पर कर चुका है। एसोचेम 2012.13 की रिपोर्ट के अनुसार कटाई के बाद सबसे ज्यादा नुकसान पश्चिमी बंगाल में होता है। पश्चिमी बंगाल में 13657 करोड़एगुजरात मे 11398 करोड़एबिहार में 10744 तथा उप्र में 10352 करोड़ का नुकसान होता है। कुरूक्षेत्र में एमबीए करने के बाद कृषि उत्पाद को व्यवसाय के रूप में कर रहे विपिन सिंघला बताते हैं कि पुराने कानूनों से नये कृषि कानून के बिना कृषि इंफ्रास्ट्राक्चर पैदा करना संभव ही नहीं है। अब किसानों को केवल मंडी पर निर्भर  नहीं रहना पडेगा औने.पौने दामों में फसल बेचने को मजबूर नहीं होगा। बहराइच के आकूतपुर निवासी किसान चंद्रशेखर चतुर्वेदी कहते हैं कि अभी तक किसान से आढती और आढती से कंपनी तक माल पहुंचता था जिससे रास्ते में काफी नुकसान होता था लेकिन कंपनी सीधे किसानों से खरीददारी करेगी और कोल्ड चेन बनाईगइ जिससे किसान व कंपनी दोनों को फायदा पहुंचेगा।
-लेखक दैनिक भास्कर के सम्पादकीय सलाहकार है-

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