सददाम हुसैनः जो अंतिम समय तक रहे शहशांह



-डा0 राहुल चतुर्वेदी-
सददाम हुसैन एक ऐसा नाम है जिसने विश्व के सबसे ताकतवर देश अमेरिका तक को चुनौती दे डाली थी ।अमेरिका ने उन्हें कैद करने और कोर्ट में लम्बी सुनवाई के बाद फांसी पर चढ़ा दिया । लेकिन सददाम के व्यक्त्तिव की  खास बात यह रही कि जेल मे ंरहते हुए मरने से पहले तक सददाम शहंशाह की तरह जिये। यह हम नहीं बल्कि उनकी सुरक्षा मे तैनात रहे अमेरिकी सैनिक इसकी तस्दीक करते हैं। अमेरिकी सैनिक बार्डन वर्पर द्वारा लिखी गयी किताब में इसका उल्लेख किया है।  किताब का नाम है प्रिजनर इन हिज पैलेस हिज अमेरिकन गाइज एंड व्हाट हिस्ट्री लेफट अनसेड।किताब में  उन्होंने सददाम की रक्षा करते हुए अंतिम दिनोंका वर्णन किया है। वार्डन लिखते हैं कि सददाम पर अपने 148 विरोधियों की हत्या का आदेश देने के लिए मुकदमा चलाया गया था परंतु हमने सददाम को कभी एक विकृत हत्यारे के रूप मे नहीं देखा। हमें तो उनमें अपने  बड़े दादा की तस्वीर  दिखायी देती थी। उददाम नेे इराकी जेल में अपने अंतिम दिन अमेरिकी गायिका जे ब्लाइजा के गानों को सुनते हुए बिताए। अपने भोजन को लेकर वह काफी संवेदनशील  रहते थे। उन्हे मिठाइयां बहुत पसंद थी और मफीन खाने के लिए हमेशा उत्सुक रहते थे। 69 वर्षीय सददाम की सुरक्षा मे 551 मिलिट्री पुलिस यानि अमेरिकी सैनिकों की गारद तैनात थी । यह गारद  सुपर टेवेल्व के नाम से जाना जाता था।

बार्डन इसी गारद के एक सदस्य  थे। इस दौरान उनके व सैनिकों के बीच नजदीकी बनती चली गई हालांकि सैनिकों के लिए यह आदेश था कि सददाम के नजदीक आने की कोशिश बिल्कुल न की जाए। बर्डन आगे  लिखते हैं कि सददाम को मुकदमा चलने के दौरान दो जेलों मे रखा गया था जिसमें एक बगदाद में अंतर्राष्ट्रीय ट्रिब्यूनल का तहखाना था और उत्तरी बगदाद में उनका एक महल था। सैनिको ने महल के स्टोर रूम को सददाम के दफतर का रूप देने की कोशिश की थी सददाम को जेल में भी शासनाध्यक्ष के दफतर का माहौल देने की कोशिश कर रहे थे। जैसे ही सददाम इस कमरे में पहली बार घुसे तो एक सैनिक ने मेज पर लगी धूल को हटाया तो सददाम कुर्सी पर बैठकर मुस्कराए और इसके बाद तो रोज सददाम इसी कुर्सी पर बैठ जाते और सैनिक भी उनके नजदीक ही बैठ जाते। सैनिकों की कोशिश यह थी कि माहौल को थोड़ा खुशनुमा रखा जाए और सददमा को खुश रखा जाए।

इस किताब में सबसे आश्चर्यजनक इस पहलू  का उल्लेख किया गया है कि जब सददाम को फांसी दे दी गई तो उनकी सुरक्षा में लगे अमेरिकी सैनिकों नेजश्न के बजाय शोक मनाया था। जबकि सददाम अमेरिका का कटटर दुश्मन था। अपने जीवन के अंतिम समय तक सददाम यह उम्मीद लगाए बैठे थी कि उन्हें फांसी नही होगी लेकिन 30 सितंबर 2006 को उन्हें फांसी पर चढ़ा दिया गया। सददाम को जब यह बताया गया कि उन्हें फांसी होने वाली है तो वह टूट से गए और फिर नहाकर फांसी के लिए वह खुद तैयार  हो गये थे।  ं

फांसी के चंद मिनट पहले सददाम ने स्टीव हाल्सिन को जेल कोठरी के बाहर बुलाया और अपनी रेमंड वील की घड़ी कलाई से उतारकर उन्हें सौंप दी। यह घड़ी अब भी जार्जिया घर की एक सेल्फ में टिकटिक कर रही है। बार्डन लिखते हैं कि हमने सददाम को उससे ज्यादा कुछ नहीं दिया जिसकेलिए वह हकदार थे गोया  अंतिम समय तक उनके सम्मान को ठेस भी  नहीं पहुंचाई।
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-लेखक दैनिक भास्कर के संपादकीय सलाहकार है-

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