‘वोकल फॉर लोकल’ रेलवे में हुआ फेल

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लोकल फॉर वोकल अभियान में रेलवे के मानक संस्थान आर डी एस ओ, लखनऊ ने पूरी तरह आखे मूँद रखी है। सूत्रों से पता चला है कि रेलवे का मानक संस्थान इस बारे में विदेशी कंपनियों को वरीयता दे रहा है । हाल ही में आर डी एस ओ के सिग्नल विभाग ने विदेशी कंपनी के दबाव में उत्तर प्रदेश के साहिबाबाद स्थित सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी के उत्पाद पर ही प्रतिबन्ध लगा दिया। जिससे इसका लाभ विदेशी उपकरण निर्माताओं को मिल सके। पता चला है की आर डी एस ओ के सिग्नल विभाग में कुछ अधिकारी सालो से महत्वपूर्ण पद पर जमे हुए हैं और स्थानांतरण आदेश को भी निरस्त करने में सफल रहे है। इस प्रयास में बाहरी कंपनियों का हस्तक्षेप भी चल रहा है। जिससे सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों के मानक मंजूरी मिले उत्पादों की मंजूरी पर अनर्गल आरोप लगाकर प्रतिबंधित कर दिया गया है। जिससे इसका सीधा लाभ निजी और विदेशी कंपनियों और उनकी सहयोगी निजी कंपनियों को मिल सके । कोरोना के कारण इस वर्ष रेलवे में उपकरणों की आपूर्ति प्रभावित हुई है और समय पर भुगतान भी नहीं हो पा रहा है। हालांकि वित्तीय वर्ष के अंत में हर वर्ष आमतौर पर कंपनियों को भुगतान कर दिया जाता है। ऐसे में जब आपूर्ति का समय आता है तब कंपनी के उत्पाद पर प्रतिबन्ध लगाना गड़बड़ की तरफ साफ़ इशारा करता है।

रेलवे के ही अंदरूनी सूत्रों के अनुसार आर डी एस ओ पर हमेशा से ही विदेशी कंपनियों के इशारे पर काम करने के आरोप लगते रहे हैं । कई बार रेलवे के विजिलेंस विभाग ने जांच के नाम पर खानापूर्ति की है। तकनीक के ज्यादातर मामले में घपला सिग्नल और टेलीकॉम विभाग में ही होते रहे है। आर डी एस ओ के सिग्नल और टेलीकॉम विभाग के अधिकारी सालो तक घरेलु कंपनियों के उपकरणों को मानक मंजूरी नहीं देते है ताकि विदेशी कंपनियों पर निर्भरता बनी रहे और ऐसे अधिकारियों की पूजा होती रहे । अब जब प्रधानमंत्री तक ने घरेलु उद्योग को बढ़ावा देने की मुहीम चलाई है तब भी ऐसे अधिकारियों ने घरेलु और सरकारी कंपनियों तक को काम करने से रोकने के तमाम उपाय खोज रखे हैं। ऐसे में वोकल फॉर लोकल की मुहीम का सार्थक होना मुश्किल लग रहा है।

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