क्या पॉर्न और इरॉटिक के बीच का अंतर राज कुंद्रा को पहुंचा सकती है राहत ?

हैदराबाद: ‘मेरे पति पॉर्न नहीं इरॉटिक फिल्में बनाते हैं, इरॉटिक और पॉर्न फिल्में अलग-अलग होती हैं’. पॉर्नोग्राफी मामले में पति राज कुंद्रा की गिरफ्तारी के बाद ये शिल्पा शेट्टी का बयान था. शमिता शेट्टी से लेकर गहना वशिष्ठ समेत राज कुंद्रा के समर्थन में आए लोग इसी बात को दोहरा रहे हैं. जिसके बाद इरॉटिक फिल्मों को लेकर कई लोगों की जिज्ञासा बढ़ गई है. इंटरनेट पर इरॉटिक (erotic) शब्द के बारे में ढूंढा जा रहा है. क्या पॉर्न और इरॉटिक के बीच का अंतर राज कुंद्रा को राहत पहुंचा सकती है ?क्या होती हैं ये इरॉटिक फिल्में ?
Erotic का हिंदी अर्थ है कामुक या कामोत्तेजक, यानि ऐसा कंटेट जिसे देखकर कामोत्तेजना (sexual excitement) बढ़ जाए. इस तरह की फिल्मों को भी इरॉटिक कहते हैं. कुल मिलाकर कोई फिल्म, पेंटिंग, तस्वीर, साहित्य आदि जिसे देखकर या पढ़कर दर्शक या पाठक में कामुकता का भाव उत्पन्न हो उसे इरॉटिक कहते हैं.

इस तरह की फिल्मों या कला में नग्नता (nudity) तो होती है लेकिन यहां सेक्स या संभोग नहीं है. सिर्फ अपने हाव-भाव और कला के जरिये ही कामुकता का भाव पैदा किया जाता है.

पॉर्न फिल्मों में क्या होता है ?

पॉर्नोग्राफी पूरी तरह से सेक्स पर निर्भर है. पॉर्नोग्राफी में नग्नता ही नहीं, बल्कि संभोग या सेक्स भी दिखाया जाता है. इस तरह का कंटेट सीधा-सीधा सेक्स को ध्यान में रखते हुए ही बनाया जाता है. आज दुनियाभर में हजारों पॉर्न साइट्स हैं जो इस तरह का कंटेट परोसती हैं.

पॉर्न साइट्स पर मौजूद कंटेट में साफ-साफ दिखाया जाता है कि दो लोगों के बीच सेक्स कैसे होता है. आज के दौर में पॉर्न का बाजार अरबों का है, हर तरह के आयु वर्ग, लिंग, देश तक पहुंच बनाने के लिए पॉर्न साइट्स पर पॉर्न वीडियो कई कैटेगरी में बांटे गए होते हैं. जिसमें अप्राकृतिक सेक्स से लेकर दो से ज्यादा लोगों के बीच सेक्स और आयु जैसे कई वर्गों में बांटा होता है.

अभी भी नहीं समझे तो बॉलीवुड, हॉलीवुड की फिल्में देखिये

बड़े पर्दे पर रिलीज होने वाली कई फिल्में अपने बोल्ड फिल्मों के लिए जानी जाती हैं. हॉलीवुड फिल्में या आजकल ओटीटी पर वेब सीरीज में कई न्यूड सीन होते हैं. ऐसी फिल्मों को एक आयु वर्ग के दर्शकों या एडल्ट टैग के साथ रिलीज किया जाता है. बॉलीवुड से लेकर हॉलीवुड और वेब सीरीज तक सेंसर के A या U/A सर्टिफिकेट के साथ रिलीज होती हैं जबकि पॉर्न बनाना भारत में पूरी तरह से बैन हैं

फिल्मी पर्दे या वेब सीरीज पर दिखने वाली फिल्मों में न्यूडिटी तो होती है लेकिन उसे पॉर्न नहीं कहा जाता. क्योंकि इनमें नग्नता, बोल्डनेस तो होती है लेकिन पॉर्न की तरह सेक्स नहीं परोसा जाता है.राज कुंद्रा के वकील ने भी यही बात दोहराई

राज कुंद्रा को पॉर्न फिल्म बनाने के आरोप में गिरफ्तार किया गया है लेकिन कोर्ट में कुंद्रा के वकील इसी इरॉटिक और पॉर्न के बीच का हवाला दे रहे हैं. कुंद्रा के वकीलों क मुताबिक जिन फिल्मों को पॉर्न बताकर मुंबई पुलिस ने कार्रवाई की है वह असल में इरॉटिक फिल्में हैं, ना कि पॉर्न.

राज कुंद्रा के वकील की दलील है कि इस कंटेट को पॉर्नोग्राफी बताना सही नहीं है, क्योंकि इसमें दो लोगों के बीच इंटरकोर्स यानि सेक्स या संभोग नहीं दिखाया जाता. ऐसे में इसे पॉर्न कहना गलता है. कुंद्रा के वकीलों ने ओटीटी पर परोसे जा रहे कॉन्टेट का भी हवाला दिया और कहा कि ये कॉन्टेट अश्लील है लेकिन पॉर्न नहीं और राज कुंद्रा का मामला इरॉटिक फिल्मों का है ना कि पॉर्नोग्राफी का.इरोटिक फिल्मों का भी है दर्शक वर्ग

इस क्षेत्र से जुड़े लोग मानते हैं कि जिस तरह पॉर्न देखने वालों की एक बड़ा तबका दुनियाभर के देशों में मौजूद है. उसी तरह इरॉटिक फिल्मों को देखने वाला भी एक बड़ा दर्शक वर्ग है. जिनकी डिमांड पर ऐसी फिल्मों का कंटेट तैयार किया जाता है, लेकिन इस दौरान ये ध्यान रखा जाता है कि ये कंटेट इरॉटिक कैटेगरी में हो ना कि पॉर्न.

ऐसी फिल्मों का दर्शक एक तरह से समर्पित है, जिनकी डिमांड को निर्माता भी ध्यान में रखते हैं. दर्शकों की डिमांड पर किसी विशेष एक्ट्रेस को अगली फिल्म में कास्ट करने से लेकर किसी दृश्य विशेष को ऑन डिमांड फिल्म में दिखाया जाता है.

इरॉटिक और पॉर्न के बीच है कुंद्रा की राहत का रास्ता ?

पुलिस ने राज कुंद्रा को पॉर्न फिल्में बनाने के आरोप में गिरफ्तार किया है लेकिन वकील कोर्ट में इन्हें इरॉटिक फिल्में बता रहे हैं. मकसद राज कुंद्रा को राहत दिलाने का है. पॉर्न बनाना भारत में बैन है लेकिन देखने पर कोई पाबंदी नहीं है. कुंद्रा पर पॉर्न बनाने और ऐप के जरिये परोसने का भी आरोप है. ऐसे में कुंद्रा के वकील इरॉटिक और पॉर्न के बीच के अंतर में राज कुंद्रा के लिए राहत का रास्ता देख रहे हैं.इरॉटिक और पॉर्न पर क्या कहते हैं एक्सपर्ट ?

अमेरिकी क्‍ल‍िनिकल साइकोलॉजिस्‍ट एफ. सेल्‍टजर ने साल 2011 में इरॉटिक और पॉर्नोग्राफी के बीच अंतर बताते हुए एक लेख लिखा था. उनके मुताबिक ‘इरॉटिक कंटेट हमें यह समझने में मदद करता है कि हमें क्‍या उत्तेजित करता है और क्या नहीं. ये एक कला की तरह है जिसे सही ढंग से किया जाए तो दर्शक भी आनंदित होने से लेकर कलाकार की तारीफ भी करते हैं.

एफ. सेल्‍टजर के मुताबिक इरॉटिक कंटेट के उलट पॉर्न फिल्‍में या फोटो ऐसा कोई प्रभाव नहीं छोड़ते. वह सिर्फ तत्‍काल प्रभाव से सेक्‍स के लिए एक्‍साइटमेंट को बढ़ाते हैं. कोई भी किसी पॉर्न वीडियो या फोटो को बार-बार नहीं देखता, क्‍योंकि वह कला नहीं है. पॉर्नोग्राफी सीधे तौर पर पैसा कमाने का जरिया है. इसमें कोई कला नहीं है. इसके साथ ही पॉर्न में औरत या मर्द की शारीरिक खूबसूरती को भी नहीं दिखाया जाता, उसका फोकस उन्‍हें एक वस्‍तु की तरह दिखाने पर होता है, जिसका मकसद सिर्फ तत्‍काल के लिए वासना यानी डिजायर को पूरा करना है’

पॉर्न पर शोर लेकिन ओटीटी पर सॉफ्ट पोर्न का जोर

राज कुंद्रा की गिरफ्तारी के बाद पॉर्नोग्राफी को लेकर फिर से चर्चा होने लगी है. राज कुंद्रा के मामले का फैसला तो कोर्ट करेगी लेकिन कुंद्रा के वकील की एक बात है जिसे कई लोग उठाते हैं और वो है ओटीटी पर बढ़ता सॉफ्ट पॉर्न. ओटीटी प्लेटफॉर्म पर जो कंटेट दिखाया जा रहा है उसे कई लोग सॉफ्ट पॉर्न की संज्ञा देते हैं. कई जानकार मानते हैं कि रचनात्मक स्वतंत्रता (creative liberty) के नाम पर दर्शकों को सॉफ्ट पॉर्न, वीभत्स दृश्य और खून-खराबे की पराकाष्ठा परोसी जा रही है.

वहीं ओटीटी पर परोसे जा रहे कंटेट का समर्थन वाला तबका भी बहुत बड़ा है. वो इसे टीवी या बॉलीवुड फिल्मों से ज्यादा रचनात्मक बताता है. उनकी ये भी दलील होती है कि ओटीटी प्लेटफॉर्म टीवी या सिनेमा की तरह सार्वजनिक मंच नहीं है बल्कि आप सबस्क्राइब करके उसे खुद चुनते हैं और ज्यादातर एकांत में देखते हैं. क्योंकि ओटीटी का ज्यादातर कंटेट फोन या फिर लैपटॉप पर देखा जा रहा है.

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