गायिका नेहा सिंह राठौर का एक और एक पॉलिटिकल सॉन्ग-देखे VIDEO

नेहा सिंह राठौर का एक पॉलिटिकल सॉन्ग अभी सोशल मीडिया पर काफी ट्रेंड कर रहा है। खबर लिखे जाने तक फेसबुक पर 8 लाख 23 हजार और यूट्यूब पर 27 हजार लोगों ने देखा-सुना है। गीत खुद नेहा सिंह राठौर ने लिखा है और गाया भी है। राजा बरहौ मास घूमेले बिदेसवा, बिकसवा ना जनमले हो…मुखरा के जरिए गीत को जिस अंदाज में शुरू किया गया है, उससे वह जहां निशाना साधना चाह रही हैं, तीर सीधा वहीं जाता लग रहा है

यहां पर क्लिक कर खुद देख लीजिए।

गीत के बोल कुछ और मायने कुछ और
गीत के बोल एक विवाहिता के संतान न हो पाने के दर्द के इर्दगिर्द ही घूमते लग रहे हैं, लेकिन इसके मायने विशुद्ध राजनीतिक हैं। जन्म से पहले बच्चे का नाम ‘बिकसवा’ यानी विकास लेकर संबोधित किया गया है। विकास के जन्म न ले पाने का पूरा ठीकरा पति पर फोड़ा गया है। विवाहिता दर्दभरे अंदाज में अपना दुखरा सुनाती हुई कह रही है कि 2014 में ही शादी हुई। 2019 में गवना हुआ। 6 साल विवाह के हो गए, लेकिन उसकी गोद नहीं भरी। गीत जैसे-जैसे आगे बढ़ता है, पूरा कारण खुद ही बताती जाती है। कहती हैं कि पति जनवरी में जापान घूमते हैं तो फरवरी में जर्मनी। बारहो मास पति घूमते ही रहते हैं तो विकास कैसे पैदा लेगा। बंगाल, बिहार, केरल, असाम के डॉक्टर से दिखा लिया, उत्तरप्रदेश में जाकर ओझैती भी करा लिया, लेकिन बिकसबा जनम नहीं लिया।

कभी धूनी रमाते हैं तो कभी जोगी बन जाते हैं पति
नेहा सिंह राठौर के गीत में विवाहिता अपना दर्द बयां करते हुए कहती हैं कि पति कभी धूनी रमा लेते हैं, कभी जोगी बन जाते हैं तो कभी फकीर। अपना पूरा देह-दासा (शरीर) फिक्र करने में ही गला लिए हैं। इसीलिए विकास जन्म नहीं ले रहा है। ’16 बरिस के मोर उमिरिया, बलम मोरा 70 के हो…’ गीत के इस बोल के भी ठोस राजनीतिक मायने हैं।

कहीं पे निगाहें, कहीं पे निशाना
गीत में कहीं पे निगाहें, कहीं पे निशाना शैली का बेहतरीन इस्तेमाल किया गया है। गीत के ये बोल तुरंत नजर के सामने उस छवि को उभार देते हैं, जिसे बिना नाम लिए कवि कहना चाह रहा है। ‘ राजा जी के कंधिया पे मोर खेले, गोदिया में सूगा-मैना, चिरई-चुरुंग खेले हो, राजा मन भावे न मनुसबा हो….।’

Back to top button
E-Paper