पश्चिमी UP में कोरोना बेकाबू : पंचायत चुनावों के बाद तेजी से संक्रमण फैला, हर घर में संक्रमित

उत्तर प्रदेश के तीन सीमावर्ती जिलों वाले सहारनपुर मंडल में कोरोना महामारी तांडव कर रही है। न इलाज की सुविधा है और न दवा की उपलब्धता। बेबसी और लाचारी ऐसी कि मरने वालों में कई को कंधा भी नसीब नहीं और सिस्टम आंकड़े नियंत्रित कर बेजान कागजों में सकारात्मकता भरने में लगा है।

गंगा और यमुना के दोआब में बसे हरित क्रांति वाले इस इलाके के खेत-खलिहान अब शव जलाने और दफनाने के काम आ रहे हैं। हर जिले में सामान्य दिनों से 10 गुना ज्यादा मौतों की खबरें हैं। यहां के गांवों में बीमारी का घर-घर बसेरा है। ऐसे में इलाज के लिए लोग पड़ोसी राज्यों हरियाणा, उत्तराखंड और हिमाचल के शहरों में भर्ती हो रहे हैं।

करीब 35 लाख की आबादी वाले सहारनपुर जिले की 5 तहसीलों और 11 ब्लॉकों में स्वास्थ्य सुविधाएं नाकाफी हैं। अव्यवस्था का आलम यह कि एकमात्र मेडिकल कॉलेज में बीमारों के लिए जगह नहीं है। बिना इलाज के दम तोड़ने वालों के अलावा सरकारी और निजी अस्पतालों में मरने वालों के शव परिजनों को सौंपे जा रहे हैं, जिससे संक्रमण का दायरा बढ़ रहा है।

पंचायत चुनावों के बाद तेजी से संक्रमण फैला
पंचायत चुनाव के बाद गांवों में संक्रमण तेजी से फैला है। 11 बड़े कस्बों में से प्रत्येक में रोजाना औसतन 15 लोग मर रहे हैं। अधिकांश निजी चिकित्सकों के क्लीनिक भी बंद हैं और मेडिकल स्टोर्स पर जरूरी दवाइयों का टोटा है। चार सरकारी और 5 प्राइवेट कोविड अस्पताल हैं, जिनमें सिर्फ 140 आइसोलेशन बेड और 36 वेंटिलेटर की सुविधा है।

कोरोना सक्रिय संक्रमितों का ताजा सरकारी आंकड़ा 7500 से ज्यादा है और इसमें एक हफ्ते से हर दिन औसतन 800 से ज्यादा की वृद्धि हो रही है। दूसरी ओर, पंचायत चुनाव के बाद गांवों में संक्रमण की रोकथाम के लिए कमिश्नर ए.वी राजमौलि ने तीनों जिलों के DM, SSP के साथ रोजाना समीक्षा बैठकें शुरू की हैं।

दिल दहलाने वाली है शामली की तस्वीर
देश की राजधानी से महज 100 किमी दूर स्थित शामली जिला महज 9 साल पुराना है। यहां सरकारी रिकॉर्ड में भले ही कोरोना के सक्रिय केसों की संख्या 2400 से ज्यादा हो, लेकिन उसमें भी हर रोज 350 से अधिक जुड़ जाते हैं। करीब 14 लाख की आबादी वाले इस कृषि प्रधान इलाके में सियासत की फसल जितनी तेजी से बढ़ी, उतनी तेजी से सुविधाएं विकसित नहीं हुईं। कस्बों के 5 श्मशान घाटों में 8 से 10 शव रोजाना लाए जा रहे हैं। आम दिनों में यह संख्या औसतन एक ही होती थी।

रोजाना गांवों के खेत खलिहानों में जल रही चिताएं और कब्रिस्तानों में दफनाए जाने वाले करीब 50 मुर्दों का औसत अलग से है, लेकिन सरकारी फाइलों में कोरोना से मरने वालों के सिर्फ 36 लोग ही दर्ज हैं। IMA से जुड़े एक सीनियर डॉक्टर कहते हैं, ‘यहां शहर में 10 में से एक और गांवों में हर घर में एक व्यक्ति संक्रमण का शिकार है। घरों में आइसोलेट बीमारों के लिए ऑक्सीजन बड़ी समस्या है।’

खतरे में मुजफ्फरनगर की 70% ग्रामीण आबादी
2013 दंगों के बाद महामारी में शायद पहली बार मुजफ्फरनगर एक साथ इतनी मौतों का गवाह बन रहा है। चुनाव से पहले कोरोना संक्रमितों की जो तादाद प्रतिदिन 100 के आसपास थी, वह अब 400 पार कर चुकी है। कागजों में मौतों का आंकड़ा हर रोज 2-3 ही दर्ज है, लेकिन श्मशानों और कब्रिस्तानों के हालात चुगली करने के लिए काफी हैं।

मीरापुर, जानसठ, खतौली, मंसूरपुर, रामराज, रोहाना जैसे समृद्ध इलाकों में लोग अपनों को बीमार होने और फिर मरने से नहीं बचा पा रहे हैं। किसान देशपाल सिंह पंवार बताते हैं कि लोग एंबुलेंस में लाए 5-7 शव रोजाना गंगा में बहा देते हैं।

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