पूरा गांव एक दिन के लिए रहता है खाली, वजह आपका भी दिमाग हिला देगी !

यूँ तो देश के कई शहरों और कई इलाको में बहुत सी अजीब परम्पराएं देखने को सुनने को मिलती है. मगर आज जिस परम्परा के बारे में हम आपको बताने जा रहे है, उसके बारे में जान कर आप यक़ीनन चौंक जाएंगे. आपकी जानकारी के लिए बता दे कि यह अनोखी परम्परा एक गांव में निभाई जाती है. जी हां इस अजीबोगरीब परम्परा के बारे में आपने शायद पहले कभी नहीं सुना होगा. मगर ये सच है. गौरतलब है कि यह परम्परा उत्तर प्रदेश के एक गांव में निभाई जाती है. जहाँ दिन निकलने से पहले ही पूरा गांव खाली कर दिया जाता है. बता दे कि दिन ढलने के बाद और नियमो के अनुसार पूजा पाठ करने के बाद ही लोग अपने घरो में वापिस जाते है.

आपको जान कर ताज्जुब होगा कि यह परम्परा इस गांव में कई सालो से चली आ रही है और आज भी भले ही कोई हिन्दू हो या मुस्लिम, लेकिन हर धर्म का व्यक्ति इस परम्परा का पालन करता है. गौरतलब है कि इस अनोखी परम्परा को परावन के नाम से जाना जाता है. वैसे आपकी जानकारी के लिए बता दे कि उत्तर प्रदेश के सिसवा बाजार से पश्चिम की तरफ दो किलोमीटर दूर ग्रामसभा बेलवा चौधरी नामक गांव में यह परम्परा निभाई जाती है. गौरतलब है कि यह परम्परा हर तीसरे साल बुद्ध पूर्णिमा के दिन मनाई जाती है. जी हां इस दिन सूर्य निकलने से पहले ही लोगो अपने घरो में ताले लगा कर चले जाते है.

दरअसल सब लोग गांव से बाहर निकल जाते है और खेतो तथा बगीचों में अपना डेरा डाल कर पूरा दिन वही रहते है. यहाँ तक कि गांव में अगर किसी के घर में कोई नयी नवेली दुल्हन भी आई हो, तब भी गांव के लोगो को ये परम्परा निभानी पड़ती है. यानि उस नयी नवेली दुल्हन को भी गांव से बाहर जाना पड़ता है. आपको जान कर ताज्जुब होगा कि इस दौरान पशुओ को भी गांव के लोग अपने साथ ही रखते है. जी हां इस दौरान गांव की हर गली सूनी हो जाती है. दरअसल इस परम्परा को निभाने के पीछे भी एक बहुत ही दिलचस्प कथा है. जिसके बारे में आज हम आपको बताएंगे. इस कथा के अनुसार कुछ साधु गांव में आये थे.

ऐसे में उन्होंने खाना पकाने के लिए लोगो से लकडिया मांगी थी, लेकिन किसी ने उनकी मदद नहीं की. जिसके चलते वे लोग फसलों की मड़ाई करने वाली मेह को जला कर खाना बनाने लगे. फिर जब गांव वालो ने उन साधुओ का विरोध किया, तो उन्होंने कहा कि आज के बाद इस गांव में खेतो की मड़ाई करने के लिए मेह की जरूरत नहीं पड़ेगी. बस तभी से इस गांव में खेतो की मड़ाई करने के लिए मेह की जरूरत नहीं पड़ती और बैल खुद ही गोल गोल घूमते रहते है. बरहलाल इसके साथ ही साधुओ ने ये भी कहा था कि हर तीसरे साल बुद्ध पूर्णिमा के दिन इस गांव को खाली कर दीजियेगा, वरना कुछ अनहोनी भी हो सकती है.

बस तभी से इस गांव में ये परम्परा निभाई जा रही है. हालांकि कुछ लोग इस परम्परा को केवल अंध विश्वास ही मानते है.

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