मासिक धर्म में उपवास रखने पर क्या कहते हैं हिन्दू पुराण ?

दोस्तों, क्या कभी आपने सोचा है कि मासिक धर्म के समय उपवास रखना सही है नहीं… आखिर इस बारे में हमारे धर्म शास्त्र और पुराण क्या कहते हैं….बता दें, वैदिक रीति रिवाजों की मानें तो मासिक धर्म के दिनों में महिलाओं को धार्मिक कार्यों से दूर रहना चाहिए… आपने देखा होगा की मासिक धर्म के दौरान महिलाओं को मंदिर जाने या फिर घर के पूजा घर में भी जाने की इजाजत नहीं होती। मान लीजिये कि नवरात्रि में कुछ व्रत करने के बाद अगर आपका मासिक धर्म आ जाता है और आपने करवाचौथ का व्रत रखा है और शाम को मासिक धर्म आ जाए तो क्या करेंगी आप ? आपको इस व्रत को पूरा करना ही पड़ेगा. लेकिन इसके बाद पूजा पाठ नहीं करें. आपको माहवारी के दौरान किये जाने वाले व्रत से भी उतना ही फल मिलेगा जितना आम दिनों में मिलता है और भगवान प्रसन्न होंगे क्योंकि इसमें आपकी गलती नहीं है. ये प्रकृति का चक्र है, जो कभी भी किसी भी दिन हो सकता है. इसीलिए बिना किसी संकोच के चिंता नहीं करें.वहीं शास्त्रों में कहा गया है कि मासिक धर्म आने पर किसी भी महिला को चार दिन के लिए किसी भी प्रकार की पूजा-अर्चना और गृहस्थी के कार्यों से दूरी बना लेनी चाहिए।

मनुस्मृति और भविष्यपुराण में यह भी कहा गया है कि इन चार दिनों में पति-पत्नी को ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए साथ शयन नहीं करना चाहिए. इसके अलावा आप 3 दिन के बाद देवी की पूजा कर सकती हैं. मासिक धर्म के तीसरे – चौथे दिन भगवान की मूर्ति को नहीं छूना चाहिए जब तक स्त्री पूरी तरह से ठीक न हो गई हों.वहीं दोस्तों एकसवाल हमेशा लोगों के जहन में रहता है कि मासिक धर्म के दौरान महिलाओं को मंदिर जानें में पाबंदी क्यों होती है…इस सवाल ने आपके मन में कई बार दस्तक दी होगी… कई बार इसको आपने सच माना तो कभी आपको यह सिर्फ एक मिथ्या लगा… लेकिन सोचने वाली बात है कि आखिर ऐसा क्यो होता है… इसके पीछे का सच क्या है…

पुराने समय में जो भी मान्यताएं बनाई गईं, उनके पीछे कोई न कोई वैज्ञानिक एंगल जरूर था… लेकिन आज के समय की बात करें तो उस तथ्य को न तो किसी ने भी समझने की कोशिश की और न ही किसी और को समझाया….इसलिए अब वो मान्यता अंधविश्वास और कुप्रथा में बदल गई। पुराने समय की बात करें तो तब पूजा बिना मंत्रोच्चार के पूरी नहीं होती थी। इसके अलावा बड़े बड़े अनुष्ठान किए जाते थे, जिसमें काफी समय और शक्ति लगती थी। और यह सभी काम पूरी शुद्धता के साथ किया जाता था। मासिक धर्म के समय महिलाओं के शरीर में कई तरह के बदलाव होते है जिसकी वजह से उनको दर्द और थकान का सामना करना पड़ता है।

ऐसे में महिला के लिए लंबे समय तक बैठकर मंत्रोच्चारण या अनुष्ठान करना संभव नहीं होता था।इसके अलावा पूजा में हमेशा शुद्धता का खयाल रखा जाता है…. लेकिन पुराने समय में मासिक धर्म के दिनों में स्वच्छता को बनाए रखने के बहुत साधन नहीं हुआ करते थे। इस कारण महिला के कपड़े कई बार खराब हो जाते थे। ऐसे में महिला को आराम देने के लिए उसे मासिक माह के दिनों में पूजा न करने की छूट दे दी गई थी और वो अपना पूरी तरह खयाल रख सके, इस कारण उसे रहने के लिए एक अलग कमरा या जगह दी जाती थी।

इस कारण महिला जमीन पर अपना अलग बिस्तर बिछाकर सोती थी। लेकिन मानसिक पूजा और जाप की कभी मनाही नहीं थी। समय बीतता गया लेकिन लोगों ने इन वजहों को जानने का प्रयास नहीं किया इसलिए ये एक रुढ़िवादी सोच बन गई।देखा जाए तो आज के समय में मासिक धर्म के दौरान सफाई और ताकत दोनों को बनाए रखने के कई प्रकार के साधन हैं। ऐसे में वजह को समझकर नियमों में बदलाव करने की जरूरत है। आज की मान्ताओं के अनुसार जब किसी लड़की के मासिक धर्म शुरू होते हैं तब उसे अपवित्र माना जाता है। लोगों का यह मानना है कि ऐसी अवस्था में अगर महिला मंदिर जाएगी तो मंदिर भी अपवित्र हो जाएगा। इसलिए ऋतु स्नान के बाद ही उन्हें परिवार के लोगों और घर में खाने-पीने की वस्तुओं को छूने की इजाजत दी जाती है।

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