सिर्फ 500 रुपये से मछली पालन कर लखपति बन गया ये किसान, जानें कैसे?

करनाल: अगर इंसान मेहनत और लगन से कोई भी काम करें तो वो जरूर सफल होता है. हरियाणा में ऐसे ही एक मछली पालक है जिन्होंने 35 वर्ष पहले 500 रुपये में ठेके पर मछली का तालाब लिया था और आज वो भारत के नंबर वन मछली पालकों में शुमार है. हम बात कर रहे हैं करनाल जिले के गांव बुटाना के सुल्तान सिंह की. जो मछली पालन के व्यवसाय में लाखों रुपये कमा रहे हैं और हजारों लोग इनसे मछली पालन करने के गुर सीख चुके हैं. मछली पालन के क्षेत्र में देश और विदेशों में नाम कमा चुके सुल्तान ने बताया कि आज से 36 वर्ष पहले उन्होंने ठेके पर मछली पालन के लिए तालाब लिया था. जिसके बाद उन्होंने कभी पीछे मुडकर नहीं देखा. अब उन्होंने 25 एकड़ जमीन पर हरियाणा का सबसे पहला आरएएस यानी रीसर्क्युलेटिंग एक्वाकल्चर सिस्टम (recirculating aquaculture system)बनाया हुआ है.

मिल चुके हैं कई अवॉर्ड

किसान सुल्तान सिंह ने बताया कि जब उन्होंने शुरूआत में पुश्तैनी जमीन पर तालाब बनाना चाहा तो उनके पिताजी ने मना कर दिया था. लेकिन अब उनकी इस कामयाबी से उनका परिवार खुश है और उनके पिता को उन पर नाज है. आपको बता दें कि किसान सुल्तान सिंह ने बेहद कम समय में मछली का बीज तैयार करके पूरे देश के वैज्ञानिकों को चौंका दिया था. जिसके बाद उन्हें कई बड़े अवॉर्डो से नवाजा जा चुके हैं. उन्हें 2006 में कृषि क्षेत्र का सबसे बड़ा अवॉर्ड बाबू जगजीवन राम पुरस्कार मिल चुका है, 2009 में राष्ट्रपति कामनाथ कोविंद द्वारा पद्मश्री अवॉर्ड से सम्मानित किया जा चुका है, इसके अलावा अमेरिका द्ववारा क्वालिटी समिट अवॉर्ड समेत कई पुरस्कारों से सम्मानित किया जा चुका है.

रिसर्कुलर एक्वाकल्चर सिस्टम क्या है?

चलिए सबसे पहले जानते हैं कि रिसर्कुलर एक्वाकल्चर सिस्टम (what is recirculating aquaculture system) होता क्या है. दरअसल, मछली पालन शुरू करने के लिए अब बड़े तालाब और ज्यादा पानी की जरूरत नहीं है. रिसर्कुलर एक्वाकल्चर सिस्टम (आरएएस) तकनीक की मदद से सीमेंट के टैंक बनाकर मछली पालन किया जा रहा है. इस तकनीक के लिए केंद्र सरकार मदद भी करती है. आरएएस वो तकनीक है, जिसमें पानी का बहाव निरंतर बनाए रखने लिए पानी के आने-जाने की व्यवस्था की जाती है. इसमें कम पानी और कम जगह की जरूरत होती है.

सामान्य तौर पर एक एकड़ तालाब में 20 हजार मछली डाली हैं तो एक मछली को 300 लीटर पानी में रखा जाता है, जबकि इस सिस्टम टैंक के जरिए 1 हजार लीटर पानी में 110-120 मछली डालते हैं. इस हिसाब से एक मछली को सिर्फ नौ लीटर पानी में रखा जाता है.

इस तकनीक के फायदे

आरएएस तकनीक का ये फायदा है कि इस तकनीक से 90 फीसदी पानी को दोबारा से किया जा सकता है. वहीं इस तकनीक के जरिए 1 एकड़ में उतना मुनाफा कमाया जा सकता है. जितना 10 एकड़ की पारंपरिक में किसान कमाता है.

वहीं पुरानी तकनीक, जिनसे तालाब में मछली पालन किया जाता था अब इस तकनीक के जरिए उससे 10 गुना उत्पादन लिया जा सकता है. आने वाले समय में मछली की खपत लगातार बढ़ रही है, जिससे कृषि क्षेत्र में भविष्य में मछली पालन का एक अहम योगदान होगा.

वहीं सुल्तान के बेटे नीरज ने कहा कि करीब 20 वर्षों के इस व्यवसाय में लगे हुए उनके पिता देश के हर कोने से विभिन्न कॉलेजों के छात्रों के अलावा कृषि विज्ञानिक उनके फार्म का दौरा कर मछली पालन की तकनीक के बारे में जानकारी प्राप्त कर चुके हैं. वहीं अब तक करीब 20,000 से ज्यादा लोगों को निशुल्क प्रशिक्षण भी उनके पिता मछली पालन करने वाले लोगों को दे चुके हैं.

दूसरे राज्यों में भी मछली पालन का व्यवसाय

किसान सुल्तान सिंह ने उत्तर भारत की पहली मछली बीज हैचरी का निर्माण किया था. जिसके बाद उन्होंने बीज बेचने का काम शुरू कर दिया. इसके अलावा इन्होंने राजस्थान और महाराष्ट्र में भी डैम को लीज पर लेकर काम शुरू किया हुआ है. किसान सुल्तान सिंह का कहना है कि वो निरंतर मत्सय पालन के क्षेत्र में मछली पालकों के लिए नए-नए अविष्कार करते रहते हैं, ताकि मछली पालन में अच्छा मुनाफा कमाया जा सके.

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