117 साल बाद बन रहा महाशिवरात्रि दुर्लभ योग, शुभ मुहूर्त में करें भोलेबाबा को प्रसन्न

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21 फरवरी, 2020 फाल्गुन माह की त्रयोदशी को महाशिवरात्रि का पर्व मनाया जाएगा। तो कुछ मान्यताओं के अनुसार ये उतस्व फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी मनाया जाता है। न केवल भारत में बल्कि दुनियाभर में इस दिन बाबा भोलेनाथ के भक्त झूमते दिखाई देते हैं। हिंदू धर्म के समस्त ग्रंथों आदि में महाशिवरात्रि का अधिक महत्व बताया गया है। वैसे तो प्रत्येक महीने की त्रयोदशी तिथि को मासिक शिवरात्रि का त्यौहार मनाया जाता है परंतु फाल्गुन माह में आने वाली शिवरात्रि को बेहद खास माने जाने का मुख्य कारण है इससे जुड़ी पौराणिक किंवदंती है। शास्त्रों में वर्णित इससे जुड़ी धार्मिक मान्यता के मुताबिक इस दिन शिव शिवलिंग रूप में अवतरित हुए थे व अन्य कथाओं के अनुसार इसी ही दिन शिव-पार्वती का विवाह संपन्न हुआ था।

ज्योतिष शास्त्र के अनुसार इस दिन शिवलिंग के रुद्राभिषेक का खास महत्व होता है। लोग इस पर्व पर भगवान शिव का विधि-वत पूजन करते हैं तथा व्रत रखते हैं। कहा जाता है इस व्रत के प्रभाव से सभी रोग और शारीरिक दोष समाप्त हो जाते हैं। ज्योतिष विशेषज्ञों का मानना है कि इस बार की शिवरात्रि बेहद खास है तो आइए जानते हैं क्यों खास है इस साल की महाशिवरात्रि-

इसलिए खास है इस साल की महाशिवरात्रि-
ज्योतिष शास्त्र के अनुसार इस बार शिवरात्रि पर 117 साल बाद शनि और शुक्र का दुर्लभ योग बन रहा है। यानि शिवरात्रि पर शनि अपनी स्वयं की राशि मकर में और शुक्र ग्रह अपनी उच्च की राशि मीन में रहेगा। जिससे एक दुर्लभ योग बन रहा है। बताया जा रहा है इससे पहले ऐसी स्थिति साल 1903 में बनी थी। ज्योतिषियों का कहना है कि इस योग में भगवान शिव की आराधना करने पर शनि, गुरू तथा शुक्र के दोषों से मुक्ति मिलती है। साथ ही साथ ये समय किसी भी प्रकार के नए काम को करने की शुरुआत के लिए बहुत शुभ माना जा रहा है।

बता दे धार्मिक मान्यताओं के अनुसार महाशिवरात्रि के दिन भगवान शिव पर एक लोटा जल चढ़ाने से ही भगवान शिव अपने भक्तों पर प्रसन्न होकर उनकी सभी मनोकामनाएं पूरी करते हैं। भगवान शिव अपने भक्तों पर जितनी जल्दी प्रसन्न होते हैं उतनी ही जल्दी उनसे रुष्ट भी हो सकते हैं। ऐसे में आइए जानते वो 7 चीजें जिसे भूलकर भी भगवान शिव की पूजा के दौरान नहीं करना चाहिए।

1-शंख जल- भगवान शिव ने शंखचूड़ नाम के असुर का वध किया था। शंख को उसी असुर का प्रतीक माना जाता है जो भगवान विष्णु का भक्त था। इसलिए विष्णु भगवान की पूजा शंख से होती है शिव की नहीं।

2- पुष्प- भगवान शिव जी की पूजा में केसर, दुपहरिका, मालती, चम्पा, चमेली, कुन्द, जूही आदि के पुष्प नहीं चढ़ाने चाहिए।

3-करताल- भगवान शिव के पूजन के समय करताल नहीं बजाना चाहिए।

4-तुलसी पत्ता- जलंधर नामक असुर की पत्नी वृंदा के अंश से तुलसी का जन्म हुआ था जिसे भगवान विष्णु ने पत्नी रूप में स्वीकार किया है। इसलिए तुलसी से शिव जी की पूजा नहीं होती।

5-तिल- यह भगवान विष्णु के मैल से उत्पन्न हुआ मान जाता है इसलिए इसे भगवान शिव को नहीं अर्पित किया जाना चाहिए।

6-टूटे हुए चावल- भगवान शिव को अक्षत यानी साबूत चावल अर्पित किए जाने के बारे में शास्त्रों में लिखा है। टूटा हुआ चावल अपूर्ण और अशुद्ध होता है इसलिए यह शिव जी को नही चढ़ता।

7-कुमकुम- यह सौभाग्य का प्रतीक है जबकि भगवान शिव वैरागी हैं इसलिए शिव जी को कुमकुम नहीं चढ़ता।

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