
मेघना वर्मा, डायरेक्टर सेल्स, आईपीएम इंडिया
भारत के गाँवों में, जहाँ दूर-दूर तक फैले सोने जैसे खेत और चहल-पहल वाले बाजार हैं, बदलाव की कहानी छिपी हुई है। 2022-23 के आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार, भारत की 65% से ज़्यादा आबादी यहीं रहती है, और यहाँ पुरानी परंपराएँ और नई उम्मीदें एक साथ चलती हैं। यहाँ किसान नई तकनीक से अपनी फसलें बेहतर बना रहे हैं, छोटे-छोटे कारोबारी सफलतापूर्वक अपने करोबार चला रहे हैं, और लोगों की आमदनी और नए-नए मौके मिलने से उनके परिवारों को एक अच्छी जिंदगी मिल रही है।
रिपोर्ट्स के अनुसार पिछले पाँच सालों में, गाँवों में इंटरनेट और लोगों की आमदनी बढ़ने से यहाँ का बाजार हर साल 10% की रफ़्तार से बढ़ रहा है। 2023-24 के हाउसहोल्ड कंजम्प्शन एक्सपेंडिचर सर्वे के हिसाब से, गाँवों में एक आदमी हर महीने औसतन 4,122 रुपये खर्च करता है, जो दस साल पहले से लगभग दोगुना है। जैसे-जैसे लोगों की आमदनी बढ़ रही है और उनका जीवन बेहतर हो रहा है, वे ज़्यादा सामान भी खरीद रहे हैं।
पिछले दो सालों में, गाँवों में रोज़मर्रा के सामान की बिक्री 60% बढ़ गई है। इससे पता चलता है कि कंपनियों को सिर्फ़ सामान बेचने पर ध्यान नहीं देना चाहिए, बल्कि गाँव के लोगों की ज़रूरतें समझकर उनके हिसाब से काम करना चाहिए। 2025 में, कंपनियों को गाँवों के अलग-अलग इलाकों को ध्यान में रखकर रणनीति बनानी होगी, वहाँ की भाषा और संस्कृति का इस्तेमाल करना होगा, और गाँवों में ऑनलाइन खरीदारी को बढ़ावा देना होगा। आइए, अब समझते हैं कि कंपनियां कैसे गाँवों में अपनी अच्छी छाप छोड़ सकती हैं और उन्हें तरक्की का जरिया बना सकती हैं।
ग्रामीण उपभोक्ता को समझना: रणनीति का मूल
गाँवों में व्यापार करने का सबसे पहला नियम है कि वहाँ के लोगों को समझा जाए। भारत के गाँव अलग-अलग संस्कृति और आर्थिक स्तर वाले लोगों से भरे हुए हैं। यहाँ के लोग रिश्तों, अपनी पुरानी परंपराओं और भरोसे को ज़्यादा महत्व देते हैं। उन्हें ऐसी चीज़ें चाहिए जो टिकाऊ हों, अच्छी हों और उनकी जेब पर भारी भी न पड़ें। जो कंपनियाँ कम दाम में अच्छी चीज़ें बेचती हैं, वे गाँवों में आसानी से अपना व्यापार बढ़ा सकती हैं और लोगों का भरोसा जीत सकती हैं।
उदाहरण के लिए, एक प्रमुख बिस्किट ब्रांड, जिसे सभी उम्र के लोग पसंद करते हैं, विशेष रूप से अपने बाल शुभंकर के साथ, ने गाँवों में मजबूत पहुंच बनाई। इसके व्यापक वितरण नेटवर्क ने दूरदराज के गांवों में भी उपलब्धता सुनिश्चित की, जबकि 1 रुपये से शुरू होने वाले कम कीमत वाले पैक ने इसे बजट के प्रति जागरूक परिवारों तक पहुंचाया। बच्चों को ध्यान में रखकर और खुद को एक भरोसेमंद और सेहतमंद नाश्ते के तौर पर पेश करके, यह ब्रांड गाँवों में बहुत मशहूर हो गया। इस ब्रांड ने दिखाया कि अगर आप कम कीमत में अच्छी चीजें बनाते हैं, तो आप लोगों का दिल जीत सकते हैं। छोटे और सस्ते पैकेट बनाकर, इन्होंने गाँवों के लोगों के लिए जरूरी चीजें खरीदना आसान कर दिया।
भाषा बोलें, संस्कृति जिएं: स्थानीय और मोबाइल-फर्स्ट रणनीतियाँ
भारत के गाँवों में कई तरह की भाषाएँ बोली जाती हैं। अगर आपको गाँवों में अपना सामान बेचना है, तो आपको वहाँ के लोगों की भाषा में बात करनी होगी और मोबाइल फ़ोन का इस्तेमाल करना होगा। वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम की एक रिपोर्ट के अनुसार, जनवरी 2023 में भारत के गाँवों में 42 करोड़ से ज़्यादा लोग स्मार्टफोन इस्तेमाल कर रहे थे। गाँवों में टीवी से ज़्यादा मोबाइल देखे जाते हैं, इसलिए कंपनियों को मोबाइल पर विज्ञापन देने चाहिए और गाँवों के हिसाब से जानकारी देनी चाहिए। ट्रांसयूनियन सिबिल की एक रिपोर्ट के अनुसार, 2025 तक भारत में नए इंटरनेट इस्तेमाल करने वालों में से 56% गाँवों के होंगे। इसलिए, कंपनियों को डिजिटल तरीके अपनाने चाहिए और गाँवों के मशहूर लोगों के साथ मिलकर काम करना चाहिए, ताकि वे गाँव के लोगों तक पहुँच सकें।
दूरी को कम करना: नए-नए समाधानों को हर कोने तक पहुंचाना
गाँवों में चीज़ें पहुँचाना बहुत मुश्किल होता है, क्योंकि वहाँ सड़कें अच्छी नहीं होतीं और दूरियाँ भी बहुत ज़्यादा होती हैं। इसलिए, कंपनियों को नए तरीके अपनाने होंगे, जैसे कि छोटे-छोटे गोदाम बनाना, गाँवों के दुकानदारों के साथ मिलकर काम करना, और बाइक से सामान पहुँचाना। ‘हब एंड स्पोक’ मॉडल भी अच्छा है, जिसमें एक बड़े गोदाम से छोटे-छोटे गाँवों तक सामान पहुँचाया जाता है। इसके अलावा, कंपनियां सीधे ग्राहकों को सामान बेच सकती हैं और गाँवों में छोटे कारोबारियों को काम दे सकती हैं। इससे गाँवों में नौकरियाँ भी मिलेंगी और लोगों की मदद भी होगी। पिछले कुछ सालों में, भारत की बड़ी-बड़ी कंपनियों ने गाँवों में अपना सामान पहुँचाने का अच्छा नेटवर्क बना लिया है, जिससे ब्रैंड्स आसानी से लोगों तक पहुंचाया जा सकता है।
स्थानीय प्रभाव और सतत् विकास पर जोर देना
गाँवों में लोगों के बीच मजबूत रिश्ते और आपसी भरोसा बहुत मायने रखता है। अगर कंपनियाँ गाँवों के लिए अच्छे काम करती हैं, तो लोगों का उन पर और उनके ब्रैंड्स पर भरोसा बढ़ेगा। बिजनेस स्थानीय अर्थव्यवस्था में योगदान कर सकते हैं और शैक्षणिक कार्यक्रमों एवं कृषि संबंधी पहलों के जरिये ज्वलंत मुद्दों से निपट सकते हैं। वे गाँवों के विकस में अहम भूमिका निभा सकते हैं।
मीडिया रिपोर्टों की मानें तो एक बड़ी एफएमसीजी कंपनी ने गाँवों में ऐसा ही किया। उन्होंने 1 लाख 20 हज़ार से ज़्यादा महिलाओं को छोटा-मोटा कारोबार शुरू करने में मदद की, जिससे वे हर महीने 2-3 हज़ार रुपये कमाने लगीं। इससे कंपनी 30 लाख से ज़्यादा घरों तक सीधी पहुँच बना पाई।
गाँवों में अच्छी चीज़ों की माँग बढ़ रही है, जिससे यहाँ का बाज़ार तेज़ी से बदल रहा है। जो कंपनियाँ गाँवों के लोगों को समझकर और उनकी इज्ज़त करके काम करेंगी, उनके लिए यहाँ बहुत मौके हैं। यह सही समय है कि हम गाँवों और शहरों को साथ लेकर चलें, ताकि दोनों जगहें अपनी-अपनी रफ़्तार से तरक्की करें और साथ मिलकर विकास के इस सफर में एक-दूसरे की मदद करें।