पहले जमीन रिश्तेदारों को दिलाई, फिर शासन के नाम कराई

  • पूर्व के तहसीलदार सर्वरीश मिश्रा के कार्यकाल में जमीन खरीद में जमकर की गई हेराफरी
  • लखनऊ के रहने वालों के नाम कराई गई जमीन फिर मालियत बढ़ाकर कराया गया डेढ़ करोड़ में बैनामा

सीतापुर। पूर्व में बाढ़ पीडि़तों के लिए खरीदी गई जमीन में भी जमकर हेराफेरी की गई है। किसान से ली गई जमीन पहले रिश्तेदार तथा खास दोस्त के नाम कराई गई उसके बाद मालियत बढ़ाकर शासन के नाम खरीददारी कराई गई। इस मामले में लाख दो लाख का खेल नहीं बल्कि डेढ करोड़ का खेल हुआ है। यह खरीद-फरोख्त तत्कालीन बिसवां तहसीलदार रह चुके सर्वरीष मिश्रा के कार्यकाल के दौरान हुआ है जो कि वर्तमान समय में महोली के तहसीलदार बनाए गए है और तत्कालीन डीएम सारिका मोहन ने इनके कार्यकाल की जांच के लिए शासन को पत्र लिखा था।

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बताते चलें कि बाढ़ पीडि़तों को बसाने के लिए जनप्रतिनिधियों की आवाज पर शासन ने वर्ष 2016 में ग्राम बजहा में 4.3750 हेक्टेयर जमीन खरीदी थी। शासन ने इसका भुगतान डेढ़ लाख रूप्या किया था जबकि यह जमीन पहले से ही बेहद सस्ते दामों पर खरीदी गई थी। विश्वस्त सूत्रों द्वारा जो जानकारी दी गई उसके तहत ब जमीन की खरीदारी के लिए शासन ने निर्देश दिए तो बिसवां तहसील के तहसीलदार सर्वरीष मिश्र थे।

सूत्र बताते हैं कि इन्होंने नवतेज सिंह की 4.3750 हेक्टैयर जमीन अपने लखनऊ के रहने वाले अपने रिश्तेदार सुमन नाम महिला तथा एक खास दोस्त अनिल कुमार श्रीवास्तव के नाम आधी-आधी जमीन कराई। बताया तो यह जाता है कि इन्होंने जमीन महज एक लाख रूप्या प्रति बीधा खरीदी थी मगर उसकी मालियत बढ़ाने के लिए इन्होंने उसमें खेत के दोनों तरफ रोड दिखाई, जबकि वहां एक तरफ रोड़ थी।

सौ मीटर पर आबादी दिखाइ जबकि पांच सौ मीटर तक आज भी कोई आबादी नहीं है तथा स्टांप शुल्क बढ़ाकर लगवाया और खेती की बिक्री 2.56 लाख प्रति बीधा दिखाकर खरीदवा दिया। इसके बाद इसी खेती को शासन के हाथों 5.55 लाख प्रति बीघा दिखाकर बिकवा दिया। जिसका भुगतान सुमन व अनिल को 75-75 लाख लाख यानि डेढ लाख दिलाया।

इस बात की भनक तत्कालीन डीएम डा. सारिका मोहन को लगी तो उन्होंने तत्काल तहसीलदार सर्वरीष मिश्रा को हटाते हुए सिधौली भेज दिया और उनके खिलाफ शासन को कार्रवाई के लिए पत्र लिखा। मगर पावर और पैसा के दम पर सब टांय-टांय फिस्स हो गया।

लेखपाल की भी है गहरी मिलीभगत
सूत्र बताते है कि इस जमीन खरीद मामले में जो तथ्य सामने निकल कर आए हैं उनके तहत हटाया गया लेखपाल अविनाश रस्तोगी की भूमिका बेहद अहम है। बताया जाता है कि ग्राम बजहा तथा गोलोक कोडर की जमीन खरीद फरोख्त में उक्त लेखपाल गवाह बना हुआ है। यही नहीं बताया यहां तक जाता है कि तहसील में दो दलाल रईस तथा मिश्रीलाल नाम के है जो यही काम करते है। उनका भी इस खरीद फरोख्त में अहम रोल है।

क्या कहते हैं आरोपी तहसीलदार
बिसवां के तत्कालीन तहसीलदार सर्वरीष मिश्रा जिनकी वर्तमान तैनाती महोली की गई है से जब उन पर लगे आरोपों के बारे में पूछा गया तो उन्होंने बताया कि ऐसा कभी नहीं है। जो जमीन ग्राम बजहा में खरीदी गई है उसे खरीदने वाले तथा बेचने वाले मेंरे कोई रिश्तेदार नहीं है। इसके अलावा जो जमीन शासन को खरिदवाई गई है वह तत्कालीन डीएम डा. सारिका मोहन तथा एडीएम व एसडीएम के अप्रूवल के बाद ही खरीदी गई है। उन पर लगाए गए सभी आरोप झेठे व बेबुनियाद है।

बख्शूंगा नहीं बाढ़ पीडि़तों का पैसा खाने वालों को-ज्ञान
सेउता विधायक ज्ञान तिवारी जिन्होंने इस जमीन घोटाला का भंाडा फोडा है ने कहा कि जो भी जमीन खरीदी गई है वह पैसा सरकार का और बाढ़ पीडि़तों का है। बाढ पीडि़तों का पैसा खाने वालों को ईश्वर कभी माफ नहीं करेगा और मै उसे बख्शूंगा नही। जितने लोग भ्ज्ञी इस खरीद फरोख्त की धांधलीबाजी में शामिल है सभी को सजा दिलाकर रहूंगा। पत्रावलियां तैयार हो रही है। मामला सीएम की दहलीज तक हर हाल में ले जाऊंगा। अगर मामले को दबाया गया तो उच्चस्तरीय जांच कराऊंगा।

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