
भास्कर समाचार सेवा
नई दिल्ली। फिरोज एच. नक़वी महानिदेशक फेडरेशन ऑफ स्वीट्स एंड नमकीन मैन्युफैक्चरर्स -FSNM ने कहा कि भारत की मिठाई और नमकीन उद्योग एक विशाल, सांस्कृतिक रूप से समृद्ध और रोजमर्रा की खपत से जुड़ी हुई व्यवस्था है। त्योहारों पर बांटी जाने वाली मिठाइयों से लेकर चाय के साथ खाए जाने वाले नमकीन तक, ये चीज़ें किसी विलासिता की वस्तु नहीं, बल्कि भारतीय जीवनशैली का अहम हिस्सा हैं और करोड़ों लोगों की रोज़ी-रोटी का माध्यम भी। इसके बावजूद, इस क्षेत्र पर ऐसा जीएसटी ढांचा लागू है जो असंगत, महंगाई बढ़ाने वाला और छोटे व्यवसायों के लिए हतोत्साहित करने वाला है। सरकार द्वारा कर स्लैब्स के व्यापक पुनर्गठन के संकेत दिए जाने के साथ, अब समय है इस दिशा में ठोस कदम उठाने का। जीएसटी व्यवस्था: अव्यवस्था और असंगति से जूझता क्षेत्र वर्तमान जीएसटी व्यवस्था में पाँच कर स्लैब हैं- 0 प्रतिशत, 5 प्रतिशत, 12 प्रतिशत, 18 प्रतिशत और 28 प्रतिशत। लेकिन खाद्य वस्तुओं को इनमें बिना किसी स्पष्ट तर्क के विभाजित किया गया है। जैसे कि चावल और गेहूं जैसी मूलभूत आवश्यकताएं या तो कर मुक्त हैं या 5 प्रतिशत टैक्स के दायरे में आती हैं, लेकिन स्नैक्स और नमकीन पर अधिक दरें लगाई जाती हैं। इससे अनेक असंगतियां पैदा हो गई हैं उदाहरण के लिए, मालाबारी पराठा पर 18 प्रतिशत जीएसटी लगता है, जबकि रोटी या चपाती पर केवल 5 प्रतिशत और ब्रेड पूरी तरह से कर-मुक्त है। गैर-ब्रांडेड नमकीन पर 5 प्रतिशत जीएसटी है, जबकि ब्रांडेड नमकीन पर 12 प्रतिशत लगाया जाता है। मिठाई जैसे रसगुल्ला या जलेबी यदि दुकान में खाई जाए तो उस पर 5 प्रतिशत टैक्स लगता है लेकिन उसमें इनपुट टैक्स क्रेडिट (ITC) नहीं मिलता; वहीं, जब वही मिठाई पैक कराकर ले जाई जाती है, तो उस पर अलग टैक्स दर लागू होती है। ऐसी विसंगतियों ने विवादों, अनुपालन की जटिलताओं और कानूनी झंझटों को जन्म दिया है और इनका सबसे अधिक बोझ छोटे और मझोले उद्यमों पर पड़ता है। यह समस्या और गंभीर तब हो जाती है जब आधुनिक आउटलेट्स — जो रेस्तरां और मिठाई, बेकरी, केक, आइसक्रीम और पेय पदार्थों की खुदरा बिक्री को एक साथ जोड़ते हैं — संचालन करते हैं। रेस्तरां सेवाओं पर 5 प्रतिशत जीएसटी लगता है लेकिन उस पर ITC नहीं मिलता, जबकि शोरूम में बिकने वाले उत्पाद अलग-अलग टैक्स स्लैब में आते हैं, जिन पर ITC मिलता है। हालांकि दोनों सेवाएं एक ही किचन, स्टाफ और यूटिलिटी संसाधनों का इस्तेमाल करती हैं, जिससे इनपुट लागत को अलग-अलग करना लगभग असंभव हो जाता है। नतीजतन, व्यवसायियों को दोहरी बहीखाता पद्धति अपनानी पड़ती है, लागत बढ़ती है और कानूनी जोखिम भी बढ़ जाते हैं। यह हाइब्रिड मॉडल — जो कि भविष्य में खाद्य रिटेल का मुख्य स्वरूप बनने जा रहा है — जटिल नियमों के कारण प्रगति करने के बजाय दबाव में आ गया है। इनपुट टैक्स क्रेडिट से वंचित करना विशेष रूप से नुकसानदायक है। रेस्तरां कच्चे माल, किराया, पैकेजिंग और यूटिलिटीज जैसी लागतों को समायोजित नहीं कर पाते, जिससे उपभोक्ताओं के लिए कीमतें और बढ़ जाती हैं। यह जीएसटी की मूल भावना – निर्बाध क्रेडिट चेन – को भी तोड़ देता है। इसका सीधा असर ग्राहकों पर पड़ता है, खासकर निम्न आय वर्ग पर, जिनके लिए भोजन पहले से ही खर्च का बड़ा हिस्सा है। यदि इनपुट टैक्स क्रेडिट की अनुमति दी जाए, तो टैक्स पर टैक्स लगने की समस्या (कैस्केडिंग इफेक्ट) कम होगी, कारोबारियों की कार्यशील पूंजी को राहत मिलेगी और व्यवस्था अधिक पारदर्शी बन सकेगी।
व्यवसायों और उपभोक्ताओं पर असर
यह क्षेत्र केवल दुकानों तक सीमित नहीं है, इसका प्रभाव इससे कहीं अधिक व्यापक है। नमकीन निर्माण एक कृषि-आधारित उद्योग है, जो बेसन, चावल, खाद्य तेलों और मसालों पर निर्भर करता है। खाद्य प्रसंस्करण उद्योग भारत की पंजीकृत फैक्ट्रियों का लगभग 16 प्रतिशत है, जो 21 लाख से अधिक श्रमिकों को रोजगार देता है और फैक्ट्री क्षेत्र की 11 प्रतिशत नौकरियों का प्रतिनिधित्व करता है। यदि जीएसटी दरों को तर्कसंगत बनाया जाए, तो इससे पूरी सप्लाई चेन मजबूत होगी, किसानों की आय में वृद्धि होगी और आत्मनिर्भर भारत जैसी योजनाओं के अनुरूप नए रोजगार भी सृजित होंगे। नमकीन बनाने वाली अधिकांश इकाइयाँ एमएसएमई (सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम) हैं, जो इस असंतुलित कर व्यवस्था से सबसे अधिक प्रभावित हो रही हैं। 12 प्रतिशत जीएसटी स्लैब उन्हें औपचारिक व्यवसाय के रूप में पंजीकरण से हतोत्साहित करता है, खासकर तब जब उन्हें 5 प्रतिशत कर दर वाले खुले नमकीन बेचने वालों से प्रतिस्पर्धा करनी पड़ती है, जो अक्सर अपंजीकृत भी होते हैं। यह असमानता उनके मुनाफे की मार्जिन को सीमित कर देती है और अनुपालन को अलाभकारी बना देती है, विशेष रूप से छोटे शहरों और कस्बों में। अगर जीएसटी को 5 प्रतिशत किया जाए, तो यह एमएसएमई को मजबूती देगा, औपचारिककरण को बढ़ावा देगा और टैक्स बेस को व्यापक बनाएगा। उपभोक्ता भी इस कर व्यवस्था से प्रभावित हो रहे हैं। नमकीन कोई विलासिता की वस्तु नहीं, बल्कि आम उपभोग की चीज़ है। घरेलू सर्वेक्षण दर्शाते हैं कि पैक्ड फूड ग्रामीण क्षेत्रों में खाद्य खर्च का 10 प्रतिशत और शहरी क्षेत्रों में 11 प्रतिशत हिस्सा बनाते हैं। ऐसे उत्पादों पर 12 प्रतिशत जीएसटी लगाना एक प्रतिगामी कदम है, जो गरीब वर्ग पर अतिरिक्त बोझ डालता है और उन्हें सुरक्षित व सुलभ खाद्य विकल्पों से वंचित करता है। इस स्थिति को और कठिन बना दिया है बढ़ती इनपुट लागतों ने। खाद्य तेलों और दालों की कीमतें तेजी से बढ़ी हैं, जीएसटी लागू होने के बाद से परिवहन लागत लगभग दो-तिहाई बढ़ चुकी है, और पैकेजिंग व लॉजिस्टिक्स खर्च भी वैश्विक आपूर्ति में व्यवधान के चलते बढ़े हैं। व्यवसाय इन लागतों को उपभोक्ताओं पर आसानी से नहीं डाल सकते, और ऊपर से 12 प्रतिशत जीएसटी का अतिरिक्त बोझ उन्हें गुणवत्ता और सुरक्षा में पुनर्निवेश करने की गुंजाइश नहीं देता। आगामी कदम वैश्विक स्तर पर देखें तो भारत की जीएसटी नीति खाद्य पदार्थों के संदर्भ में कुछ असंगत सी प्रतीत होती है। दुनिया के अधिकांश देश या तो खाद्य वस्तुओं को जीएसटी/वैट से पूरी तरह छूट देते हैं या फिर उन पर बहुत ही न्यून कर लगाते हैं। जर्मनी, फ्रांस, इटली और जापान जैसे देश खाद्य उत्पादों पर 10 प्रतिशत से कम कर लगाते हैं, जबकि 74 प्रतिशत देशों में भोजन पर कोई जीएसटी या वैट नहीं लगाया जाता। एक विकासशील देश होने के नाते, जहां बड़ी संख्या में रोजगार और निर्यात खाद्य क्षेत्र से जुड़ा है, भारत को भी इस दिशा में कदम बढ़ाने की आवश्यकता है ताकि खाद्य उत्पाद सुलभ और प्रतिस्पर्धी बने रहें। जीएसटी दरों को घटाने से भारत के खाद्य निर्यात में भी मजबूती आएगी। भारतीय मिठाई और नमकीन को पहले से ही अंतरराष्ट्रीय बाजार में अच्छी मांग मिल रही है, और खाद्य उत्पाद कुल निर्यात का लगभग 13 प्रतिशत हिस्सा हैं। जीएसटी में कटौती से भारतीय उत्पादों की कीमतें वैश्विक स्तर पर और अधिक प्रतिस्पर्धी बनेंगी, विदेशी मुद्रा की आमद बढ़ेगी, और भारत की फूड डिप्लोमेसी को बल मिलेगा। मिठाई और नमकीन का उद्योग न केवल भारत की सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा है, बल्कि इसका आर्थिक ढांचा भी है। अगर सरकार नमकीन को 5 प्रतिशत जीएसटी स्लैब में लाए और मिठाई की दुकानों को- जो चाट या रेस्तरां जैसे उत्पाद भी बेचती हैं- 5 प्रतिशत टैक्स के साथ इनपुट टैक्स क्रेडिट लेने की अनुमति दे, तो इससे अनुपालन की प्रक्रिया सरल होगी, विवाद और कानूनी झंझट कम होंगे, और एमएसएमई के साथ-साथ उपभोक्ताओं को भी राहत मिलेगी। यह केवल कर प्रणाली में सुधार भर नहीं है यह एक आर्थिक, सांस्कृतिक और सामाजिक ज़रूरत है। इस क्षेत्र में जीएसटी का युक्तिकरण रोज़गार, किसानों, निर्यात और सबसे महत्वपूर्ण, भारत के प्रिय स्नैक्स और मिठाइयों को सभी के लिए सुलभ बनाए रखने की दिशा में एक सशक्त कदम होगा।