शर्मनाक : नाम और इनाम के लिए पहले भी बहा निर्दोष लोगो का खून 

योगेश श्रीवास्तव 
लखनऊ।  प्रदेश में योगी आदित्यनाथ सरकार के सत्तारूढ़ होने के बाद से कानून व्यवस्था सुधारने के नाम पर जहां पुलिस को अपराधियों पर कहर बनकर टूटने की खुली छूट है वहीं इस छूट के नाम पर खंूखार अपराधियों से ज्यादा निरीह निर्दोष और निहत्थे लोगों को अपनी गोलियों का निशाना बना रही है। मुख्यमंत्री द्वारा सदन से सडक़ तक अपराधियों को ठोंक देने के  आदेश ने पुलिस को किसी को भी मार गिरानें की खुली छूट दे दी है। मुठभेड़ की आड़ में प्रमोशन और विभाग में अपना नंबर बढ़ाने की चाहत में पुलिस किसी का भी खून बहाने से गुरेज नहीं कर रही है। योगी सरकार के कार्यकाल में अब तक हुई कई मुठभेड़ों पर सवाल सडक़ से सदन तक उठ चुके है।
हाल में लखनऊ में गोमतीनगर में एप्पल कंपनी के एरिया मैनेजर विवेक तिवारी को पुलिस ने गोलीमार कर मौत के घाट उतार दिया। इसी तरह नोएडा में पुलिस ने जिम ट्रेनर सुमित गुर्जर का मुठभेड़ में मार दिया था। पुलिस द्वारा गुडवर्क के नाम किए जा रहे अंधाधुंध मुठभेड़ों पर सर्वोच्च न्यायालय और मानवाधिकार आयोग ने सवाल उठाए है। प्रदेश में ऐसी फर्जी मुठभेड़े पहले भी हुई और सीबीआई जांच होने के बाद पुलिस कर्मियों को फांसी से लेकर उम्र कैद की सजायें हुयी।
एक दर्जन उतार दिए थे मौत के घाट 
वर्ष १९८२ में १२ मार्च को गोंडा के कटराबाजार में गोंडा के कटराबाजार में दो पक्षों की मारपीट में बीचबचाव करने पहुंचे तत्कालीन पुलिस उपाधीक्षक केपी सिंह की हत्या कर दी गयी। इस घटना के बाद गोंडा के कौडिय़ा थानें की पुलिस ने माधवपुर पहुंचकर एक दर्जन लोगों को मौत के घाट उतार किया। पुलिस ने इस मुठभेड़ का नाम दिया। मामलें की गंभीरता को देखते हुए कोर्ट ने इस मुठभेड़ की सीबीआई जांच कराने के आदेश दिए। १९ पुलिसकर्मियों के खिलाफ चार्जशीट दायर हुयी। सुनवाई के दौरान दस पुलिसकर्मियों की मौत हो गयी। बाकी बचे लोगों में तीन को फांसी और पांच को उम्र कैद की सजा सुनाई गई।
चार मजदूरों को नहीं बक्शा
इसी तरह वर्ष १९९६ में ८ नवंबर को गाजियाबाद के की भोजपुर पुलिस ने चार लोगों का इनकांउटर कर दिया। बाद में पता चला मारे गये चारों लोग मोदीनगर के विजय नगर के रहने वाले थे और एक कंपनी में मजूदरी करते थे। ७अप्रैल १९९७ में इस मामले की जांच सीबीआई को सौंप दी गई। वर्ष २००१ में न्यायालय ने पांच को साक्ष्य छिपानें का आरोपी बनाया और सभी दोषियों का उम्रकैद की सजा सुनाई।
तीर्थयात्रियों को आतंकी बनाकर मार डाला
वर्ष १९९१ में प्रदेश में पहली बार यूपी में भाजपा की सरकार बनी और उसके मुखिया बने कल्याण सिंह। सरकार गठन का एक महीना भी नहीं बीता था कि १२ जुलाई को पीलीभीत में पुलिसकर्मियों ने तीर्थयात्रियों से भरी बस में १० यात्रियों को आतंकवादी बताकर उन्हे जंगल में ले जाकर गोली मार दी। इनाम पाने की गरज से हुई इस हत्या में सर्वोच्च न्यायालय ने सीबीआई जांच करायी। ५७ पुलिसकर्मियों को दोषी पाया गया। सुनवाई के दौरान १० पुलिसकर्मियों की मौत हो गयी। ४७ लोगों को उम्र कैद की सुजा सुनायी गयी।
कम्प्यूटर आपरेटर को गोली मार दी
१९९७ में ३०जून को बरेली में बदायूं के मुकुल गुप्ता को ढेर कर दिया। एक साधारण से कम्प्यूटर आपरेटर मुकुल की हत्या पर न्यायालय ने संज्ञान लिया और मामले की सीबीआई जांच करायी। मुठभेड़ मेें शामिल सभी पुलिसकर्मियों के खिलाफ चार्जशीट हुई। मामला अभी न्यायालय में लंबित है। इस मामलें में सीबीआई ने तत्कालीन एसएसपी जे. रविन्द्र गौड़ को भी आरोपी बनाया है।
आईपीएस ने ले ली थी जान 
१९९३ में १४/१५ अप्रैल की रात राजधानी लखनऊ में न्यू हैदराबाद क्षेत्र में सहायक पुलिस अधीक्षक चन्द्र प्रकाश ने पीछा करते हुए व्यवसायी सरवर को राइफल से गोलीमार दी थी जिसमें सरवर की मौके पर ही मौत हुयी थी। इस मामलें को लेकर पुलिस की बड़ी फजीहत भी हुयी और जांच भी हुयी लेेकिन नतीजा सिफर रहा।
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