पितृपक्ष आज से शुरु, पूर्वजों का ऋण उतारने के लिए करें श्राद्ध कर्म

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वाराणसी,। मोक्ष नगरी काशी में पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता जताने के लिए लोग पितृ पक्ष की तैयारी में जुट गये हैं। गंगा तट सहित विमल तीर्थ पिशाचमोचन कुण्ड पर श्राद्ध कर्म के लिए साफ-सफाई का कार्य युद्ध स्तर पर चल रहा है। पितरों को समर्पित पितृ पक्ष 25 सितम्बर से शुरू हो रहा है।

सोमवार को विमल तीर्थ पिशाचमोचन कुंड शेर वाली कोठी के कर्मकांडी प्रदीप पाण्डेय ने बताया अश्विन मास कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा तिथि से पखवारे भर पितृपक्ष की छाया पृथ्वी पर बनी रहेगी। पितृ पक्ष में नदी तट और कुंड पर विधिवत तर्पण तथा मृत्यु तिथि पर अपने पूर्वजों के श्राद्ध में ब्राह्मणों को भोजन श्रद्धा के साथ करा कर अपने पितरों को तृप्त व प्रसन्न किया जाता है।

उन्होंने बताया इस बार आश्विन कृष्ण पक्ष में षष्ठी तिथि की हानि से पितृ पक्ष 14 ही दिनों का होगा। ऐसे में द्वादशी और त्रयोदशी का श्राद्ध तर्पण छह अक्टूबर को किया जाएगा। अमावस्या व पितृ विसर्जन आठ अक्टूबर को मनाया जाएगा।
प्रदीप पांडेय ने बताया कि प्रमुख श्राद्धों में मातृ नवमी तीन अक्टूबर को होगी। इसमें माता की मृत्यु तिथि ज्ञात न होने पर श्राद्ध किया जाता है। उन्होंने बताया आश्विन कृष्ण द्वादशी छह अक्टूबर को संन्यासी व वनवासी के निमित्त श्राद्ध का विधान है। आश्विन चतुर्दशी सात अक्टूबर को दुर्घटना में मृत व्यक्तियों का श्राद्ध किया जाता है। उन्होंने बताया माता-पिता ने हमारी आयु, आरोग्य और सुख, सौभाग्य के लिए अपना पूरा जीवन बीता दिया।

पितृपक्ष के दूसरे दिन श्राद्ध करने का सही समय

कुतुप मुहूर्त : 11:48 से 12:36 तक
रोहिण मुहूर्त : 12:36 से 13:24 तक
अपराह्न काल : 13:24 से 15:47 तक

उनका ऋण उतारने के लिए वर्ष भर में केवल उनकी मृत्यु तिथि को सर्व सुलभ जल, तिल, कुश और पुष्प आदि से उनका श्राद्ध किया जाता है। इसके बाद गो ग्रास देकर एक, तीन या पांच ब्राह्मणों को भोजन करा दान देने मात्र से ऋण उतर जाता हैं। उन्होंने बताया श्राद्ध कर्म से प्रसन्न हो कर पितर मनुष्यों के लिए आयु पुत्र धन विद्या स्वर्ग मोक्ष सुख और राज्य दे देते हैं।

विमलकुण्ड पिशाचमोचन कुण्ड पर प्रेतबाधा से मुक्ति के लिए श्राद्ध कर्म

पितृपक्ष में गंगा तट के अलावा काशी के पौराणिक पिशाचमोचन विमल कुण्ड का सनातन धर्म में अहम स्थान है। यहां त्रिपिंडी श्राद्ध,गया श्राद्ध,प्रेत पिशाच श्राद्ध के बाद ही बिहार गया में श्राद्ध कर्म का फल पितरों और उनके वंशजों को मिला है। जिनके परिजन भाई बन्धु की अकाल मृत्यु हो जाती है,वे प्रेत बाधा से ग्रसित हैं। भटकती आत्मा को प्रेतयोनि से मुक्ति देने के लिए त्रिपिण्डी श्राद्ध नारायणी बलि कर्मकांडी ब्राम्हणों की देखरेख में की जाती है।

कर्मकांडी प्रदीप पांडेय ने बताया कि पिशाच मोचन कुण्ड पर भटकती आत्मा की शान्ति के लिए त्रिपिंडी श्राद्ध किया जाता है। इससे पितरों की प्रेत बाधा और अकाल मृत्यु से मरने के बाद व्याधियों से मुक्ति मिल जाती है। उन्होंने बताया कि इस श्राद्ध कार्य में तीन मिट्टी के कलश की स्थापना की जाती है। जो काले, लाल और सफेद झंडों का प्रतीक होता है। प्रेत बाधाएं तीन तरह की मानी जाती है। सात्विक, राजस, और तामस। इन तीनों बाधाओं से पितरों को मुक्ति दिलाने के लिए काले, लाल और सफेद झंडे लगाये जाते हैं। जिसको कि भगवन शंकर, ब्रह्मा, और कृष्ण के प्रतीक के रूप में मानकर तर्पण और श्राद्ध का कार्य किया जाता है।

पाण्डेय ने बताया कि पिशाच मोचन तीर्थ स्थली का वर्णन गरुण पुराण में भी वर्णित है। उन्होंने बताया पिशाच मोचन के साथ ये मान्यता जुड़ी हुई है कि यहां का तर्पण का कर्मकांड करने के बाद ही गया में पिंड दान किया जाता है, ताकि पितरों के लिये स्वर्ग का द्वार खुल सके।

उन्होंने बताया कि अपने जजमानों का बाकायदा बहिखाता यहां रखा जाता है। प्रेतों को कीलो में बांध पीपल के पेड़ में ठोंका जाता है। श्राद्ध के बाद गुनी प्रेतों को कील में बांध कुण्ड पर मौजूद पीपल के पेड़ में ठोंक देते हैं। माना जाता है कि फिर प्रेत बाधा से उन्हें मुक्ति मिल जाती है और प्रेत को मुक्ति भी।

श्राद्ध करने की तिथि- 
जिस तिथि में आपके पूर्वज का देहावसान हुआ है उसी तिथि पर श्राद्ध कर्म करते हैं। यदि तिथि भूल गयी हो तो अमावस्या का दिन सबसे उपयुक्त माना गया है। इस दिन सर्व पितृ श्राद्ध योग होता है।

वर्ष 2018 की श्राद्ध की तिथियां

  • 24 को पूर्णिमा का श्राद्ध
  • 25 सितम्बर को प्रतिपदा: प्रतिपदा के दिन नाना नानी का श्राद्ध करते हैं। यदि नाना नानी की मृतयु तिथि ज्ञात न हो तो भी इसी तिथि को श्राद्ध करते हैं। ऐसा करने से उनकी आत्मा को शांति मिलती है।
  • 26 सितम्बर द्वितीया श्राद्ध
  • 27 को तृतीया
  • 28 सितम्बर को चतुर्थी: आत्महत्या से दिवंगत लोगों का श्राद्ध चतुर्दशी तिथि में करते हैं। हथियार से मौत या दुर्घटना से मरे लोगों का श्राद्ध चतुर्दशी तिथि में करते हैं।
  • 29 पंचमी: जो लोग अविवाहित सामान्य मृत्यु पाते हैं उनका श्राद्ध पंचमी को करते है। अविवाहित जन जो एक्सीडेंट में मरते हैं उनका भी पंचमी को ही श्राद्ध करेंगे।
  • 30 को खष्ठी
  • 1 अक्टूबर को सप्तमी श्राद्ध
  • 2 अक्टूबरअष्टमी: पिता का श्राद्ध अष्टमी को करते हैं।
  • 3 अक्टूबर नवमी: माता का श्राद्ध नवमी को करते हैं। महिलाओं के श्राद्ध की सर्वोत्तम तिथि है। किसी भी महिला का श्राद्ध इस दिन करते हैं।
  • 4. अक्टूबर दशमी
  • 5.अक्टूबर एकादशी: परिवार में कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो सन्यास ले लिये होते हैं और उनकी मृत्यु हो जाती है। ऐसे लोगों का श्राद्ध एकादशी और द्वादशी तिथियों में करते हैं।
  • 6. अक्टूबर द्वादशी: इस दिन भी परिवार के लोग जो सन्यास लेके मरे हैं उनका श्राद्ध करते हैं।
    विशेष-

दिनांक 7 अक्टूबर को त्रयोदशी और चतुर्दशी दोनों श्राद्ध रहेगा। परिवार में जिनकी अकाल मृत्यु हो जाती है उनका श्राद्ध इस दिन होता है। गोली या धारदार हथियार से मौत पाने वालों का भी श्राद्ध इसी दिन होता है। आत्महत्या से मरने वालों का भी श्राद्ध चतुर्दशी को ही होगा।

दिनांक 8 अक्टूबर को सर्वपितृ अमावस्या अर्थात सबका श्राद्ध रहेगा। इसे पितृ विसर्जन भी कहते हैं। जिनको अपने पितरों की तिथि याद न हो या किसी कारण वश उस तिथि को श्राद्ध न कर पाए हों तो वो पितृ अमावस्या के दिन श्राद्ध करेंगे।

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