…तो सियाचिन तक हो जाएगी चीन की पहुंच

\नई दिल्ली
पूर्वी लद्दाख में भारत और चीन के बीच टकराव जारी है। झील के किनारे चीन ने भारी सैन्य तैनाती की है। सैटलाइट तस्वीरों से पता चलता है कि चीन बड़ी तादाद में भारी सैन्य वाहनों को पैंगोंग सो झील के पास जमा कर दिया और तेजी से बंकरों का निर्माण कर रहा है। भारत ने भी जवाब में एक्स्ट्रा फोर्स तैनात की है लेकिन पेइचिंग के इरादे खतरनाक लग रहे हैं। पैंगोंग सो रणनीतिक तौर पर बहुत महत्वपूर्ण है और चीन पूरी झील पर कब्जे का नापाक इरादा पाला लगता है।

पैंगोंग सो झील के एक तिहाई हिस्से पर भारत का कब्जा
झील की भौगौलिक स्थिति इसे रणनीतिक रूप से बेहद अहम बनाती है। यह चुशुल अप्रोच के रास्ते में पड़ता है। एक्सपर्ट्स के मुताबिक चीन अगर भविष्य में कभी भारतीय क्षेत्र पर हमले की हिमाकत करता है तो चुशुल अप्रोच का इस्तेमाल करेगा क्योंकि इसका रणनीतिक महत्व है। 134 किलोमीटर लंबी यह झील 604 वर्ग किलोमीटर के दायर में फैली हुई है। इसके 89 किलोमीटर यानी करीब 2 तिहाई हिस्से पर चीन का नियंत्रण है। झील के 45 किलोमीटर पश्चिमी हिस्से यानी करीब एक तिहाई हिस्से पर भारत का नियंत्रण है।

चीन पूरी झील पर तो नहीं चाहता कब्जा?
चीन की चालबाजियां संकेत देती है कि वह पूरी झील को छीनना चाहता है। इसकी एक बड़ी रणनीतिक वजह है। अगर चीन ने यह नापाक इरादा पाला है तो उसे पूरी शिद्दत से ताकत से रोकना बहुत जरूरी है। क्योंकि झील पर कब्जे के बाद चीन चिप चैप मैदान के साथ-साथ पूरब में अक्साई चिन और उत्तर में शयोक घाटी तक भारत की पहुंच को खत्म कर देगा। इसका मतलब यह होगा कि भारत का नियंत्रण पश्चिम में श्योक नदी और दक्षिण में सिंधु नदी तक ही रह पाएगा।

…तो सियाचिन तक हो जाएगी चीन की पहुंच
अगर चीन अपने नापाक मंसूबों में कामयाब हुआ तो भारत को श्योक और सिंधु नदियों को प्राकृतिक सीमाओं के तौर पर स्वीकार करने के लिए मजबूर होना पड़ेगा। और एक बार अगर चीन काराकोरम के दक्षिणी हिस्से पर नियंत्रण कर लेता है तो वह देप्सांग कॉरिडोर के जरिए सियाचिन ग्लेसियर तक भी आसानी से पहुंच जाएगा। ऐसे में भारत को न सिर्फ विवाद को जल्द से जल्द सुलझाने की जरूरत है बल्कि चीन की ऐसी किसी साजिश को पूरी ताकत से नाकाम करने की जरूरत है।

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