विदेशी निवेश और कॉर्पोरेट तय करेगे बजट की सफलता !

प्रत्येक वर्ष की भांति इस वर्ष भी वित्त मंत्री जी ने वित्तीय वर्ष 2021-2022 के लिए बजट प्रस्तुत किया है | अपेक्षाकृत सरकार के पक्ष के लोग/संस्थान बजट की सराहना करने में लगें है जबकि विपक्ष इस बजट में व्यापक कमियां गिना रहा है | पर एक वास्तविकता यह भी है की बजट में की गयी घोषणा का भी यदि शत-प्रतिशत व्यावहारिक रूपसे क्रियान्यवन किया जाता रहा होता तो आर्थिक विकास की गति आज कुछ और होती | बजट के पक्ष में कई लोग/संस्थान तर्क यह भी दे रहें है की बजट देश हित में है, जबकि किसी भी बजट के केंद्र बिंदु में वहां के नागरिकों के विकास की बात होनी चाहियें, क्योंकि नागरिकों के विकास से ही देश का विकास संभव है | ऐसे में व्यक्तियों के समूह की बात न करके सिर्फ देश हित की बात करना बजट की सार्थकता पर प्रश्न चिन्ह जरुर लगाता है |

कोरोना की इस वैश्विक महामारी ने गहराई से अनेकों क्षेत्रों को प्रभावित किया है जिनमे सेवा, पर्यटन, छोटे औद्योगिक इकाई, स्टार्टअप प्रमुख रूप से है | इसका जितना प्रभाव संगठित क्षेत्र पर पड़ा है उससे कही अधिक प्रभाव असंगठित क्षेत्र पर भी पड़ा है | यह बात और है कि विभिन्न सरकारों ने कर संग्रह के आकड़ों से कई बड़ी समस्याएं छिपाई है | गयी नौकरियों, वेतन में कमी, बेरोजगारी, विभिन्न तरह के लोन के भुगतान, आयकर में छुट पर यह बजट शांत ही रहता है | रेलवे और रक्षा कभी बजट में आकर्षण का केंद्र होते थे पर आज……! यानि की जिस रास्ते पर सरकार चल निकली है उसे देश और देश के लोगों के विकास के लिए सिर्फ दो ही तारनहार दिखते है एक कॉर्पोरेट घराने दुसरें विदेशी निवेशक | विदेशी निवेशकों ने तो शेयर बाजार में जोरदार वापसी करके सरकार पर भरोसा जता दिया है रही बात कॉर्पोरेट घरानों की तो वो सरकार से कभी दूर रहें ही नहीं |

जन से जनादेश, जनादेश से ही सरकार और फिर जन के विकास से ही राष्ट्र की मजबूती का निर्माण होता है, परन्तु बजट में एक नहीं बल्कि कई बड़े वर्गों की उपेक्षा की गयी है | डर यह भी दिखाया जा रहा है की सरकार ने नए कोविड कर ना लगाने का निर्णय लेकर जनता के हितों के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दर्शाया है | सरकार अपनी पीठ इस बात के लिए भी थपथपा रही है की उसने कोरोना काल में मजबूत और सशक्त कार्य किया है, जबकि अभी तक 19.70 करोड़ लोगों का ही कोरोना टेस्ट हो पाया है और आबादी 137 करोड़ से अधिक है यानि की हर्ड इम्युनिटी ने ही बेहतर रोल निभाया है | आन्तरिक अव्यवस्था और मानव अंगो की तस्करी कोरोना की आड़ में आज भी रहस्य बनी हुई है | हालाँकि सरकार 35000 करोड़ फण्ड कोविड से निपटने के लिए घोषणा करके लोगो को आकर्षित करने में दांव खेल रही है |

एक बात आम जन के जेहन में अक्सर आती है की सरकार ने पिछले बजट में 2 लाख करोड़ से अधिक के विनिवेश का लक्ष्य रखा था और लक्ष्य के 40% तक भी नहीं पहुँच पायी और अबकी बार 1.75 लाख करोड़ के विनिवेश का लक्ष्य निर्धारित किया है | यह बात भी आम जन को सरकार में विश्वास नहीं दिला पा रही है, कि यदि कोई संस्थान सरकार नहीं चला पा रही है, तो ऐसे में कॉर्पोरेट घराने कैसे चलाने में सक्षम है | लोगो को आश्चर्य तब होता है जबकि सामाजिक सुरक्षा से जुड़ी सेवाओं का निजीकरण आधुनिकता के नाम पर किया जाता है, जहाँ कई सेवाएँ आम जनता की पहुँच के बाहर रातों-रात हो जाती है फिर अच्छी शिक्षा हो, स्वास्थ्य हो रहन सहन हो या फिर रोजगार |

सरकार जनता द्वारा चुनी जाती है और पूर्ण बहुमत होने पर कोई भी निर्णय लेने के लिए स्वतंत्र है, परन्तु सरकारी किसी भी बीमारू इकाई में सुधार करने या पहले से सशक्त इकाई को आगे बढ़ाने की नीति नियमों का निर्धारण करने के बजाय उसे निजी हाथो में सौपने का सरल रास्ता सरकार किन उद्देश्यों के लिए अपनाती है यह समझ से आज भी परे है | एयरपोर्ट, सड़के, रेलवे, बिजली ट्रांसमिशन लाइन, रेलवे का डेडीकेटेड फ्रेट कॉरीडोर के हिस्से, वेयरहाउस, पवनहंस, भारत पेट्रोलियम और बीमा कम्पनी को जब सरकार देश के विकास के लिए निजी हाथों में सौपने का बजट प्रस्तुत करती है तो सरकार को इस बात को भी समझना चाहिए की आम जन को सरकार पर भरोसा कैसे होगा ? आबादी के बड़े हिस्सों के लोगो की दयनीय स्थिति आज भी बनी हुई है | गरीब और गरीब हुआ है, जबकि अमीर और अधिक अमीर | आम जन के जीवन में अवसर के नाम पर अंतहीन संघर्ष ही संघर्ष है |

जिस सरकार ने कालेधन को वापस लाने का वायदा किया था भ्रष्टाचार को समाप्त करने का ख्वाब आम लोगों को दिखाती रही है वही सरकार आयकर में 3 वर्ष पुरानी फाइल न खोलने का निर्णय लेकर कई नए प्रश्नों को जन्म देती है | ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल की 2020 की रिपोर्ट के अनुसार भ्रष्टाचार में भारत 80 स्थान से निचे गिरकर 86 स्थान पर आ गया है यानि की भ्रष्टचार में कमी के बजाय वृद्धि हुई है | सरकार ने सोची समझी रणनीति के तहत बजट प्रस्तुत किया है | जिसका उद्देश्य राजनैतिक समीकरण विदेशी निवेश और कॉर्पोरेट के भरोसे पूरा करना है

यदि राजनीति के सकारात्मक चश्में से आप देखेगे तो इस बजट में कई अच्छी बातें भी दिखेगी जिनमे शामिल है, अगर बैंक डूबे तो 5 लाख रुपये तक के सुरक्षा की ग्यारंटी है | 15 वर्ष पुरानी कमर्शियल और 20 वर्ष पुरानी निजी गाड़ी अब स्क्रैप होगी | बंगाल असम और केरल के लिए बड़ी सौगात इस बजट ने दी है | सरकार का यह बजट आम जन के विकास से न केवल दूर दिखाई पड़ रहा है, बल्कि चुनावी राजनीति का बजट के रूप में अपने आप को प्रस्तुत कर रहा है | आगामी चुनाव वाले राज्यों को प्राथमिकता देना सरकार की कई सच्चाई को बयाँ कर रहें है | सरकार शायद अभी तक यह समझने में सफल नहीं रही है की “आप जो वादे करते है, वो हर दिन नहीं बदल सकते” | इसका अब आभास आम जन को भी होने लगा है | अब ऐसा प्रतीत होता है की प्रस्तुत बजट की सफलता अब विदेशी निवेश और कोर्पोरेट घराने तय करेगे और इस बजट का केंद्र बिंदु चुनावी रणनीति तैयार करना भी है |

डॉ. अजय कुमार मिश्रा

Back to top button
E-Paper