दिल्ली चुनावों में भाजपा की हार के ये हैं पांच बड़े कारण….

नई दिल्ली। दिल्ली विधानसभा चुनाव में मिले हार के बाद भाजपा में आत्ममंथन शुरू हो गया है। पार्टी के आक्रामक कैंपेनिंग के बावजूद करारी हार के पीछे की वजहें तलाशने के लिए पांच वरिष्ठ नेता जुट गए हैं। दिल्ली विधानसभा चुनाव में पूरा दारोमदार अपने कंधे पर उठाने वाले ये पांच प्रमुख नेता राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा को रिपोर्ट देंगे। इसके बाद राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा एक रिपोर्ट तैयार कर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सामने रखेंगे। ऐसा भाजपा सूत्रों का कहना है।

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दिल्ली में पार्टी की हार के कारणों की समीक्षा के लिए जिन नेताओं को रिपोर्ट देनी है, उनमें केंद्रीय मंत्री प्रकाश जावड़ेकर, राष्ट्रीय उपाध्यक्ष श्याम जाजू, गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय, दिल्ली प्रदेश अध्यक्ष मनोज तिवारी और संगठन मंत्री सिद्धार्थन का नाम बताया जाता है।

प्रकाश जावड़ेकर जहां दिल्ली विधानसभा चुनाव के प्रभारी रहे वहीं श्याम जाजू राज्य के प्रभारी के तौर पर संगठन की गतिविधियां देखते रहे हैं। चुनाव के दौरान गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय जावड़ेकर के सहयोगी की भूमिका में रहे। जबकि प्रदेश संगठन में अध्यक्ष के तौर पर मनोज तिवारी और महामंत्री(संगठन) के तौर पर सिद्धार्थन की सबसे अहम भूमिका रही।

ऐसे में पार्टी का मानना है कि पूरे चुनाव में सबसे अहम भूमिका निभाने वाले ये पांच नेता ही हार के असली कारणों तक पहुंच सकते हैं। शीर्ष नेतृत्व ने एक रणनीति के तहत सभी से अलग-अलग रिपोर्ट पेश करने को कहा है। ताकि पार्टी यह देख सके कि क्या हर नेता के हिसाब से हार के अलग-अलग कारण सामने आते हैं या फिर कुछ कॉमन कारण मिलते हैं। पांचों नेताओं की रिपोर्ट के आधार पर राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा का कार्यालय एक समग्र रिपोर्ट तैयार करेगा। यह रिपोर्ट प्रधानमंत्री मोदी के पास जाएगी।

भाजपा के दिल्ली प्रभारी श्याम जाजू ने मंगलवार को नतीजों के दिन आईएएनएस से कहा था कि पार्टी हार के कारणों की समीक्षा करेगी। सभी जिम्मेदार नेता साथ बैठेंगे और कमियों पर चर्चा करेंगे। समीक्षा के दौरान जो चीजें सामने आएंगी, उसी आधार पर आगे का कदम पार्टी उठाएगी। हालांकि श्याम जाजू का यह भी मानना है कि पार्टी ने 2015 के मुकाबले बेहतर प्रदर्शन किया है। पार्टी ने सीटों के साथ वोट शेयर में खासी बढ़ोतरी की है।

जानिए किन वजहों से हारी भाजपा:

​जमीनी मुद्दों से दूरी

दिल्ली में भारतीय जनता पार्टी ने ऐसे मुद्दों से दूरी बनाए रखी, जिनका वास्ता सीधा जनता से है. बिजली, पानी, सड़क, रोजगार, शिक्षा जैसे मुद्दों के बजाय मोदी-शाह ने शाहीन बाग को तवज्जो दी. राष्ट्रीय मसलों पर जोर देने की वजह से पार्टी लगातार पिछड़ती रही.

भाजपा के पास नगर निगम है. इसकी बदहाली की मिसाल दिल्ली की जनता कई इलाकों में दे रही है. कूड़ा, सड़का और नगर विकास के कई काम नगर निगम के पास है, मगर काम के नाम पर ठप्प रहने की वजह से पार्टी को जमकर किरकिरी हुई.

पुराने नेताओं का अभाव

दिल्ली चुनावों में भारतीय जनता पार्टी के पुराने नेताओं ने कमान नहीं संभाली. दिल्ली में पार्टी की अगुवाई गृह मंत्री अमित शाह ने की. सूबे के कद्दावर माने जाने वाले नेता हाशिए पर चले गए. हर्षवर्धन और विजय गोयल जैसे नामी नेताओं को ज्यादा वरीयता नहीं दी गई.

पार्ट के प्रदेश अध्यक्ष मनोज तिवारी भी दिल्ली से ताल्लुक नहीं रखते. यूपी और बिहार के वोटरों को रिझाने के लिए पार्टी ने योगी आदित्यनाथ और नितीश कुमार को प्रचार के लिए बुलाया. इसके अलावा पार्टी को सुषमा स्वराज और अरुण जेटली सरीखे उच्च स्तरीय और प्रखर वक्ताओं की कमी भी खली.

​दिल्ली के मतदाता का बदलता रुख

बीते दो दशक में दिल्ली के मतदाताओं में काफी बदलाव आया है. शीला दीक्षित के दौर में स्कूल में पढ़ने वाले छात्र अब मतदाता हो गए हैं. उन्होंने दिल्ली के बदलते स्वरूप और जरूरतों को देखा है. दिल्ली का मतदाता विवेकशील और परिपक्व हुआ है.

ऐसे में दिल्ली के बदलते हुए स्वरूप को ध्यान में रखते हुए भारतीय जनता पार्टी युवा मतदातओं को रिझाने में विफल रही. दिल्ली का मतदाता अब सीधा खुद को राजधानी से जोड़ता है. दिल्ली चुनावों में कोई भी बड़ा नेता गंभीर मसलों पर बात करते हुए नजर नही आया.

पार्टी के पक्ष में माहौल नहीं बना पाए सातों सांसद

2019 के लोकसभा चुनावों में दिल्ली की जनता ने सातों सीट भाजपा की दी थी. इसमें चादंनी चौक से डॉ. हर्षवर्धन, उत्तर-पूर्वी दिल्ली से मनोज तिवारी, पूर्वी दिल्ली से गौतम गंभीर, नई दिल्ली से मीनाक्षी लेखी, उत्तर पश्चिम दिल्ली से हंसराज हंस, पश्चिम दिल्ली से परवेश वर्मा और दक्षिण दिल्ली से रमेश बिधूड़ी को जीत मिली.

मगर विधानसभा चुनावों में ज्यादातर सांसद पार्टी के पक्ष में माहौल नहीं नहीं बना सके. परवेश वर्मा जैसे सांसद मैदान में कूदे. उन्होंने विवाद खड़ा करने से परहेज नहीं किया. हर्षवर्धन सरीखे दिग्गज नेता पीछे रहे, जबकि गौतम गंभीर, हंसराज हंस जैसे सांसद दूर-दूर तक नजर नहीं आए.

केजरीवाल के खिलाफ कौन?

दिल्ली में भारतीय जनता पार्टी मौजूदा मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के खिलाफ कोई चेहरा उतार पाने में विफल रही. साल 2015 में पार्टी ने आनन-फानन में किरण बेदी को मुख्यमंत्री कैंडिडेट घोषित किया था.

विजय गोयल, विदेंद्र गुप्ता और हर्षवर्धन को पीछे कर दिया गया, जबकि मनोज तिवारी को पार्टी ने मुख्यमंत्री के रूप में पेश नहीं किया. अमित शाह ने चुनावों की अगुवाई की, मगर केजरीवाल से किसी की सीधा मुकाबला नहीं होना पार्टी के खिलाफ गया.

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