भरोसा रखिए… नहीं चूकेंगे ये चौहान

देखिए, यह बात तो आपको माननी ही पड़ेगी… अपने प्रधानमंत्री जी एक मोर्चे पर तो चूक ही गए। हर मौके पर दुनियाभर में सबसे आगे रहने के लिए पीठ ठोकने वाले प्रधानमंत्री जी… इस बार पिछड़ गए। यूं लगा मानो… वो हम हिंदुस्तानियों की काबिलियत का सही से अंदाजा ही नहीं लगा सके। यकीन न हो तो खुद ही देख लीजिए… प्रधानमंत्री जी राष्ट्र के नाम कोरोना काल के अपने पांचवें संबोधन में जाकर बोले- “आपदा को अवसर में बदलो।“ शायद उन्हें एहसास ही नहीं… हम हिन्दुस्तानी तो इस मार्ग पर कभी का आगे बढ़ चुके हैं। हमारा तो ध्येय वाक्य ही यही है- “ चूको मत चौहान “। ये कैसे संभव था… कोरोना जैसी आपदा आए… और हम चूक जाएं। हम तो बाढ़-अकाल जैसी आपदा तक को अवसर समझने में नहीं चूकते… फिर कोरोना तो बड़ी और अंतरराष्ट्रीय स्तर की आपदा है… इसमें तो चूकने का सवाल ही नहीं था।

तरकश – मनोज माथुर


हकीकत तो यह है… कोरोना के कदमों की आहट आते ही हमारे अवसरवादी योध्दाओं ने तलवार निकाल ली थी। जिन मास्क और सेनेटाइजर पर धूल जमी रहती थी… जिन्हें कोई आम आदमी कौड़ी के भाव नहीं पूछता था… उन्हें सोने के मोल बेच डाला। हमारी सक्रियता की ये अकेली मिसाल थोड़े ही ना है… आपदा के बढ़ते कदमों के साथ… हमारे योद्धा कदमताल मिलाकर बढ़ते रहे। गरीबों को मुफ्त सरकारी राशन देने की बारी आई… तो उसमें भी हाथ की सफाई दिखाई। भूखों को भोजन कराया… तो उसमें भी अपने नाम का स्टिकर चिपकाया और फ़ोटो खिंचाई। सरकार ने ट्रक-टैंकर की आवाजाही की अनुमति दी… तो उनमें भी दो से पांच हजार रुपए तक वसूलकर गरीब-मजदूरों को मंजिल मुहैया कराई। महज एक-दो हजार रुपये में निजी वाहनों को सरकारी पास उपलब्ध कराने की सुविधा दी। राजनीतिक क्षेत्र के योद्धाओं ने भी सड़कों पर बिखरी गरीब- मजदूरों की भीड़ को वोट बैंक के रूप में देखने में कोई चूक नहीं की…सो, उनकी खूब आवाज उठाई।
ये तो आपदा को अवसर में बदलने के चंद उदाहरण हैं…

जो सामने आये हैं। पता नहीं कहां-कहां अभी हमारे अवसरवादी योद्धा काम को अंजाम देने में जुटे होंगे। उनकी उपलब्धियां तो समय के साथ ही सामने आएंगी। यूँ भी अभी दवाई-उपकरणों से लेकर तमाम सरकारी खरीद चल रही हैं। भारत सरकार ने भी 20 लाख करोड़ रुपये का आर्थिक पैकेज घोषित किया है। अब ये कैसे संभव है… आपदा में आए इतने बड़े अवसरों को हमारे कर्मयोद्धा यूं ही गवां दें। हम तो प्रधानमंत्री जी से यही कहना चाहेंगे… ये केदारनाथ जैसी आपदा में भी पीड़ितों को 20 रुपये की पानी की बोतल 200 रुपये में बेचने वाले कर्मयोगियों का देश है। भरोसा रखिए… हमारे लोग किसी भी अवसर को भुनाने से नहीं चूकेंगे। बड़े अवसर हैं तो बड़े कारनामे ही सामने आएंगे।


अब रही बात लोकल को वोकल कर उसे दुनिया भर में मुकाम दिलाने की… तो इसकी गारण्टी हम दे नहीं सकते। कारण भी साफ है। हम हर अवसर को छोटे लालच… छोटे स्वार्थ के तराजू पर तोलते हैं। नैतिकता और सिद्धांतों को चूल्हे में झोंक कर… उसी पर रोटी सेंकते हैं। खुद खाने की फिक्र करते हैं… दूसरे की ढुलने की चिंता नहीं। बुरा मत मानिएगा… यही हमारा राष्ट्रीय चरित्र बन चुका है। हम आपदा में भी इसी नजरिये से अवसर को देखते हैं। हमें नहीं लगता… यह नजरिया हमें अंतरराष्ट्रीय बाजार में टिकने लायक उत्पाद दे सकता है। हमारी तो गुजारिश है… आपदा की इस घड़ी में… छोटे स्वार्थ और लालच से भरे जीवन चरित्र को अपने देश से बाहर निकालें। तभी हम हर आपदा में वो अवसर दिखेंगे… जिसकी बात प्रधानमंत्री मोदी कर रहे हैं। वरना, हम वही अवसर देखते रहेंगे… जो अब तक देखते आ रहे हैं।

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