फर्जीवाड़े पर प्रहार : UP के सभी शिक्षकों की होगी जांच, गलत पाए जाने पर बर्खास्तगी और सैलरी की होगी वसूली !

प्रयागराज। उत्तर प्रदेश के सरकारी स्कूलों में शिक्षक भर्ती को लेकर एक ऐसे ‘महाघोटाले’ का पर्दाफाश हुआ है, जिसने पूरे शिक्षा विभाग में भूचाल ला दिया है। 15 साल से सरकारी खजाने से वेतन ले रही एक महिला टीचर के फर्जीवाड़े का भंडाफोड़ होने के बाद इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। कोर्ट ने न केवल फर्जी टीचर को बर्खास्त कर पूरी सैलरी वसूलने का आदेश दिया है, बल्कि पूरे उत्तर प्रदेश के सहायक अध्यापकों की नियुक्ति की व्यापक जांच के भी निर्देश दिए हैं। इस फैसले के बाद प्रदेश के हजारों शिक्षकों और संबंधित अधिकारियों में हड़कंप मच गया है।

एक शिकायत ने खोल दी 15 साल पुरानी पोल

यह पूरा मामला देवरिया जिले के सलेमपुर ब्लॉक के एक उच्च प्राथमिक विद्यालय से शुरू हुआ। यहां जुलाई 2010 में गरिमा सिंह नाम की एक महिला को सहायक अध्यापक के पद पर नियुक्ति मिली थी। पिछले 15 सालों से वह बिना किसी रोक-टोक के नौकरी कर रही थी। लेकिन 2025 में मिली एक शिकायत ने इस पूरे फर्जीवाड़े की नींव हिला दी। शिकायत के बाद जब मामले की जांच स्पेशल टास्क फोर्स (STF) को सौंपी गई, तो परत-दर-परत चौंकाने वाले खुलासे हुए। जांच में यह साफ हो गया कि गरिमा सिंह ने जिन डिग्रियों और प्रमाण पत्रों के आधार पर यह प्रतिष्ठित सरकारी नौकरी हासिल की थी, वे सभी फर्जी थे।

कोर्ट में खारिज हुईं सारी दलीलें, मिला कड़ा सबक

मामले का खुलासा होते ही मार्च 2025 में देवरिया के बेसिक शिक्षा अधिकारी (BSA) ने गरिमा सिंह की नियुक्ति रद्द करते हुए उसे बर्खास्त कर दिया। इस कार्रवाई के खिलाफ गरिमा ने इलाहाबाद हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। उसके वकील ने दलील दी कि 15 साल की लंबी सेवा और नियुक्ति के समय हुए वेरिफिकेशन के बाद अब यह कार्रवाई गलत है। लेकिन, न्यायमूर्ति मनु श्रीवास्तव की बेंच ने इन दलीलों को सिरे से खारिज कर दिया। कोर्ट ने बेहद तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा, “धोखाधड़ी से हासिल किए गए किसी भी लाभ को पाने वाला व्यक्ति किसी भी तरह की रियायत या सुरक्षा का हकदार नहीं है।” कोर्ट ने न सिर्फ बर्खास्तगी को सही ठहराया, बल्कि अब तक दिए गए पूरे वेतन की वसूली का भी आदेश सुना दिया।

अब पूरे प्रदेश में जांच की आंच, नपेंगे अधिकारी भी

हाईकोर्ट ने इस मामले को सिर्फ एक व्यक्ति का फ्रॉड न मानते हुए इसे व्यवस्था पर एक बड़ा हमला माना। कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार को आदेश दिया है कि राज्य के सभी सहायक अध्यापकों की नियुक्तियों की गहन और समयबद्ध जांच की जाए। यह जांच अगले छह महीने के भीतर पूरी करनी होगी। इसके साथ ही, अदालत ने उन अधिकारियों पर भी शिकंजा कसने का निर्देश दिया है, जिनकी लापरवाही या मिलीभगत से ऐसे फर्जी शिक्षक इतने सालों तक सिस्टम का हिस्सा बने रहे। जांच में दोषी पाए जाने वाले अधिकारियों के खिलाफ सख्त विभागीय और कानूनी कार्रवाई की जाएगी।

यह फैसला शिक्षा की गुणवत्ता और छात्रों के भविष्य को लेकर हाईकोर्ट की गहरी चिंता को दर्शाता है। कोर्ट ने साफ कहा कि अयोग्य शिक्षकों द्वारा दी जाने वाली शिक्षा को कतई बर्दाश्त नहीं किया जा सकता, क्योंकि यह हमारे देश की नींव को कमजोर करती है। इस फैसले के बाद अब यह तय है कि फर्जी दस्तावेजों के सहारे नौकरी पाने वालों के लिए आगे की राह आसान नहीं होगी।



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