मप्र हाई कोर्ट का बड़ा फैसला – जैन समाज पर लागू होगा हिंदू विवाह अधिनियम, जानें पूरा मामला

इंदौर । मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय की इंदौर खंडपीठ ने जैन समाज के वैवाहिक विवादों को लेकर बड़ा फैसला सुनाया है। उच्च न्यायालय की युगलपीठ ने सोमवार को अपने आदेश में कहा है कि जैन समाज के वैवाहिक विवादों का निराकरण हिन्दू विवाह अधिनियम के तहत ही होगा। इसके साथ ही कोर्ट ने यह भी टिप्पणी की है कि कुटुंब न्यायालय के न्यायाधीश को लगता था कि जैन समाज के वैवाहिक विवादों को हिंदू विवाह अधिनियम के तहत निराकृत नहीं किया जा सकता है तो उन्हें इस संबंध में हाई कोर्ट से सलाह लेना थी, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया।

एडवोकेट पंकज खंडेलवाल ने बताया कि उच्च न्यायालय की युगल पीठ ने कुटुम्ब न्यायालय के उस आदेश को निरस्त कर दिया है, जिसमें हिंदू मैरिज एक्ट में अल्पसंख्यक वर्ग के पक्षकारों को सुनवाई का हक नहीं होने के मुद्दे पर एक नहीं, बल्कि 28 परिवाद एक साथ खारिज कर दिए थे। इनमें ऐसे भी मामले थे, जिनमें दंपत्ति ने आपसी सहमति से अलग होने के लिए अर्जी दायर की थी। अब उच्च न्यायालय के आदेश के बाद जैन समाज के वैवाहिक विवादों से जुड़े ये 28 केस हिन्दू विधि के तहत फिर से कुटुम्ब न्यायालय रेफर होंगे।

उन्होंने बताया कि पिछले दिनों जैन समाज की दंपत्ति ने आपसी सहमति के आधार पर फैमिली कोर्ट में तलाक की अर्जी लगाई थी। इसमें तर्क दिया था कि दोनों पक्ष जैन हैं, वे तलाक देना चाहते हैं। कुटुंब न्यायालय ने जैन दंपत्ति के आपसी सहमति से तलाक के इस मामले को यह कहते हुए निरस्त कर दिया था कि केंद्र सरकार ने वर्ष 2014 में जैन धर्मावलंबियों को अल्पसंख्यक घोषित कर दिया है, इसलिए उनके मामले हिंदू विवाह अधिनियम के तहत निराकृत नहीं किए जा सकते। बीते मंगलवार को इस मामले में उच्च न्यायालय इंदौर के न्यायमूर्ति विवेक रूसिया और न्यायमूर्ति गजेंद्र सिंह की युगलपीठ में सुनवाई हुई थी। सुनवाई के दौरान करीब आधा घंटा चली बहस में दोनों पक्षों के तर्क सुनने के बाद अदालत ने अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था। सोमवार को उच्च न्यायालय ने अपना फैसला जारी कर दिया है।

गौरतलब है कि इंदौर कुटुंब न्यायालय ने पिछले दिनों जैन समाज के पक्षकारों की विवाह-विच्छेद की याचिकाएं यह कहते हुए निरस्त कर दी थीं कि केंद्र सरकार द्वारा जैन समाज को अल्पसंख्यक समुदाय घोषित किया गया है। इस संबंध में 27 जनवरी 2014 को राजपत्र भी जारी हो चुका है। ऐसी स्थिति में जैन समाज के अनुयायियों को हिंदू विवाह अधिनियम के तहत अनुतोष प्राप्त करने का अधिकार नहीं है। वे हिंदू धर्म की मूलभूत वैदिक मान्यताओं को अस्वीकार करने वाले हैं और स्वयं को बहुसंख्यक हिंदू समुदाय से अलग कर चुके हैं। उनसे जुड़े वैवाहिक मामलों का निराकरण हिंदू विवाह अधिनियम के तहत नहीं किया जा सकता। यह पहला मौका था, जब कुटुंब न्यायालय ने इस आधार पर कोई याचिका निरस्त की थी कि जैन धर्मावलंबियों के मामले हिंदू विवाह अधिनियम में निराकृत नहीं किए जा सकते। जस्टिस एसए धर्माधिकारी और जस्टिस संजीव एस. कालगांवकर की कुटुंब न्यायालय के इस फैसले को चुनौती देते हुए पक्षकारों ने उच्च न्यायालय में याचिकाएं दायर की थीं।

उच्च न्यायालय में सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से पैरवी करते हुए एडवोकेट पंकज खंडेलवाल ने बताया गया कि हिंदू विवाह विधि मान्य अधिनियम 1949 में दी गई हिंदू की परिभाषा में जैन भी शामिल हैं। संविधान में भी जैन धर्मावलंबियों को हिंदुओं के साथ ही रखा गया है। वर्ष 2014 में जैन समाज को अल्पसंख्यक घोषित किया गया था। इसके बाद से अब तक जैन दंपत्ति के विवाद हिंदू विवाह अधिनियम के तहत निराकृत होते रहे हैं। कई मामले उच्चतम न्यायालय भी निराकृत कर चुका है। वहीं, पत्नी की ओर से अधिवक्ता वर्षा गुप्ता ने कहा कि विवाह के लिए जैन धर्म में भी हिंदुओं के समान ही वाकदान, सप्तपदी आदि सभी नियमों का उल्लेख है।

एडवोकेट पंकज खंडेलवाल ने बताया कि उच्च न्यायालय ने माना कि जब संविधान का आर्टिकल 25 में जिक्र है कि हिन्दुओं में जैन भी आते हैं। वे भी हिन्दू हैं इसलिए उन पर हिन्दू विवाह अधिनियम भी लागू होगा। कुटुम्ब न्यायालय को अगर परेशानी थी कि उसे केसों उच्च न्यायालय रेफर करना था न कि खारिज। उच्च न्यायालय ने माना कि जैनियों की जितनी हिन्दू विधियां हैं, उन पर लागू होती हैं। इसके साथ ही ये केस कुटुम्ब न्यायालय में रेफर कर दिए। वहीं, उल्लेखखित है कि इसी तरह का एक अन्य मामला भी हाईकोर्ट पहुंचा था। उसमें भी यह तर्क दिया गया था कि जैन समाज को माइनॉरिटी का दर्जा मिल गया है, ऐसे में उनके तलाक के केस को भी स्पेशल कोर्ट में ही सुना जाए। इसे लेकर जैन समाज की महिला के एडवोकेट रोहित मंगल की तरफ से हाईकोर्ट में चैलेंज करते हुए पिटीशन दायर की थी। पर मामले में फैमिली कोर्ट ने जैन समाज के तलाक के मामलों में सुनवाई करने से इनकार कर दिया था।

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