विशुद्ध शाकाहार (वेगनिज्म) अपनाना ज़रूरी क्यों?

देखिए, दो तल हैं जिन पर आप समझ सकते हैं, दूध इत्यादि छोड़ने की दिशा में आगे बढ़ सकते हैं। पहला तल है — मानवीयता का, करुणा का; दूसरा तल है — वैज्ञानिक तथ्यों का। आप दोनों में से किसी भी तल पर देखें तो आपको समझ में आ जाएगा कि यह बात ठीक नहीं है। आप मानवीयता, करुणा को एक तरफ भी रख दें और सिर्फ विज्ञान की दृष्टि से देखें तब भी आपको दिख जाएगा कि यह दूध इत्यादि आपके लिए घातक ही है। और अगर करुणा की दृष्टि से देखेंगी तब तो फिर किसी वैज्ञानिक तथ्य की भी ज़रूरत नहीं है, दिख ही जाएगा कि यह क्या है। आप उसको आसानी से सिर्फ इसलिए ग्रहण कर पाती हैं — दूध को, दही को — क्योंकि वो कैसे आप तक पहुँचता है, उसकी पूरी प्रक्रिया से आप अनजान हैं। वह सारे काम आपकी आँखों के सामने नहीं होते। एक गाय या भैंस का जो पूरा जीवन चक्र है यदि आपको दिख जाए, तो फिर आप खुद ही छोड़ देंगी दूध — और गाय-भैंस के जीवन चक्र में मैं यह भी शामिल कर रहा हूँ कि कैसे उनका प्रजनन होता है, उनके बछड़ों, पड़वों के साथ क्या होता है, दूध कैसे उगाहा जाता है और जब वह दूध नहीं दे पाते तब उनका क्या हश्र होता है। ये पूरी चीज़ आप देख पाएँ कि आपको दूध मिलता रहे, इसके लिए, एक पशु को किस नर्क से गुज़रना पड़ता है, तो आपको साफ़ दिखायी देगा कि आप दूध नहीं ख़ून पी रहे हो। वैज्ञानिक दृष्टि से भी बच्चों के लिए दूध का कोई विशेष महत्व नहीं है। प्रकृति में जितने पशु आप देख रहे हैं, उनमें से कोई भी अपनी माँ के अलावा किसी दूसरे का दूध नहीं ग्रहण करता। किसी दूसरे का दूध आपको लाभ देगा ही नहीं, आपका शरीर निर्मित ही नहीं है बचपन के बाद दूध को ठीक से पचा पाने के लिए। दूध को पचा पाने की क्षमता ही सिर्फ नवजात में होती है, शिशु में होती है। आप दूध कितना भी पीते रहो, आप उसे ठीक से पचा ही नहीं सकते। वो आपको नुकसान और देता है। कितनी ही बीमारियाँ हैं जो दूध और दुग्ध उत्पादों की वजह से होती हैं। दूध को आप जीवन से निकाल दीजिए तो न जाने कितनी बीमारियाँ चली जाएंगी।

आचार्य प्रशांत
वेदांत मर्मज्ञ,
संस्थापक प्रशांतअद्वैत संस्था

खबरें और भी हैं...