
- एक मार्च से शुरू होगा नैमिषारण्य तीर्थ की प्रसिद्ध 84 कोसीय परिक्रमा मेला
- शंखनाद होने के बाद प्रस्थान करेगा ‘रामादल’
नैमिषारण्य-सीतापुर। आस्था और आध्यात्म के अनूठे और अनकहे संगम की जीवंत गाथा नैमिषारण्य तीर्थ की प्रसिद्ध 84 कोसीय परिक्रमा रामादल का शंखनाद होने में अब कुछ ही घण्टो का समय बाकी है इस बार गुरुवार व शुक्रवार को दोनों ही दिन अमावस्या का योग होने के चलते इस बार शनिवार को भोर होते ही लाखों की संख्या में रामादल के परिक्रमार्थी तीर्थ के विधान का पालन करते हुए राम नाम जयकारा लगाते हुए पहला आश्रम के महंत व डंका वाले बाबा द्वारा परम्परागत रूप से बजायी जाने वाली डंके की धुन के बाद परिक्रमा मार्ग के विभिन्न मन्दिर तीर्थो में शीश नवाते हुए परिक्रमा के पहले पड़ाव कोरौना के लिए प्रस्थान करेंगे।
इस दौरान इस सनातन परिक्रमा के लिए हर आयु वर्ग के श्रद्धालुओं का उत्साह देखते ही बनता है जो बड़े ही आस्थाभाव से इस परिक्रमा पथ पर आगे बढ़ने के लिए तत्पर दिखते है , धर्म की नगरी नैमिषारण्य तीर्थ में आज से ही परिक्रमा के लिए देश विदेश से श्रद्धालुओं के आने का क्रम शुरू हो जाता है जो सरकारी , निजी बस और अपनी छोटी गाड़ियों से इस अनूठी परिक्रमा का भाग बनने के लिए नैमिष धाम पहुंचते है इस परिक्रमा में देश के विभिन्न प्रान्तों के साथ ही पड़ोसी देश नेपाल , भूटान आदि से बड़ी संख्या में श्रद्धालु इस परिक्रमा में शामिल होते है ।
यह है मान्यता –
नैमिषारण्य के शास्त्री विद्वान पं. पुरूषोत्तम शर्मा बताते है कि मान्यता है कि ये परिक्रमा महर्षि दधीचि ने राक्षस वृत्तासुर के वध के लिए अपनी अस्थियों का दान देने पहले प्रारम्भ की थी इस परिक्रमा में देवराज इंद्र ने सभी देव और तीर्थो को आमंत्रित किया था और इस परिक्रमा में सभी तीर्थों और देवो का दर्शन करने के बाद महर्षि दधीचि ने मिश्रिख तीर्थ में गायों से अपने शरीर को चटवाकर अपनी अस्थियों का दान दिया था जिससे देवराज इंद्र ने वज्र का निर्माण करवाया और वृत्तासुर दैत्य का वध किया गया। मान्यता है 84 कोस की 11 पड़ावों पर की इस यात्रा में सभी 33 कोटि देव और साढ़े तीन करोड़ तीर्थो का वास है, जो वर्तमान में सीतापुर और हरदोई जनपद में आती है।
डंके का है खास महत्व –
इस पावन परिक्रमा में डंके का विशेष महत्व कहा जाता है मान्यता है कि यह डंका स्वयं हनुमान जी की आज्ञा से बजता है महन्त नारायण दास बताते हैं कि अंग्रेजी शासनकाल में एक बार तत्कालीन महन्त लाल दास जी महाराज साधु सन्तों के साथ मध्य प्रदेश जा रहे थे, लखनऊ के पास काकडाबाद में अंग्रेजी शासन के निर्देश पर साधु संतों के दल को रोक दिया गया और डंके को अपने कब्जे में ले लिया महन्त भरत दास बताते हैं कि सुबह जैसे ही आरती का समय हुआ डंका खुद ही बजने लगा जिसे देखकर सब अचरज में पड़ गए बताते है कि उस समय के तत्कालीन गवर्नर लॉर्ड डलहौजी ने महंत लाल दास जी को ताम्रपत्र प्रदान किया और अंग्रेजी शासन को निर्देश दिया की इस दल को कहीं भी ना रोका जाए और जरूरी सुविधाएं दी जाए।
हाईटेक रथ से चलेंगे परिक्रमा अध्यक्ष –
बीते 2 वर्षों की तरह इस बार भी 84 कोसी परिक्रमा अध्यक्ष पहला आश्रम के महंत नारायण दास भव्य आधुनिक रथ पर बैठकर इस परिक्रमा पथ पर निकलेंगे , यह एक मॉडिफाइड रथ है जिसमें महन्त के बैठने के लिए आरामदायक सीट है वही रथ पर सामने चार घोड़े प्रतीक रूप में बने हैं रथ पर आधुनिक साउंड सिस्टम व आकर्षक लाइटिंग भी आकर्षण का प्रमुख केंद्र रहेंगे।
ये है 84 कोसीय परिक्रमा का बिंदुवार पूरा कार्यक्रम –
1 मार्च 2025 नैमिष से पहले पड़ाव कोरौना के लिए प्रस्थान
2 मार्च 2025 दूसरे पड़ाव हरैया को प्रस्थान
3 मार्च 2025 तीसरे पड़ाव नगवाँ कोथावाँ को प्रस्थान
4 मार्च 2025 चौथे पड़ाव गिरधरपुर उमरारी को प्रस्थान
5 मार्च 2025 पांचवे पड़ाव साक्षी गोपालपुर को प्रस्थान
6 मार्च 2025 छठे पड़ाव देवगवां को प्रस्थान
7 मार्च 2025 सातवें पड़ाव मंडरुआ को प्रस्थान
8 मार्च 2025 आठवें पड़ाव जरीगवां को प्रस्थान
9 मार्च 2025 नवें पड़ाव नैमिषारण्य
10 मार्च 2025 दिन सोमवार को दसवें पड़ाव कोल्हुआ बरेठी
11 मार्च दिन मंगलवार ग्यारहवें पड़ाव मिश्रिख तीर्थ