
दिल्ली दंगे से जुड़े मामले में सुप्रीम कोर्ट ने उमर खालिद और शरजील इमाम को जमानत देने से इन्कार कर दिया है. साथ ही पांच आरोपियों को जमानत दे दी है. उमर खालिद और शरजील इमाम को जमानत न मिलना सिर्फ एक कानूनी फैसला नहीं, बल्कि एक नीतिगत संकेत भी है. Supreme Court of India ने माना कि लंबी हिरासत चिंता का विषय है, लेकिन इसे “ट्रंप कार्ड” बनाकर स्वतः जमानत नहीं दी जा सकती. अदालत ने कहा कि जमानत के स्तर पर भी आरोपों और भूमिका की व्यवस्थित जांच जरूरी है यानी देरी अकेली वजह नहीं बन सकती.
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि Unlawful Activities (Prevention) Act की धारा 43D(5) जमानत के सामान्य मानकों से अलग ढांचा बनाती है. इसका अर्थ यह नहीं कि न्यायिक जांच बंद हो जाती है, बल्कि यह कि प्रथम दृष्टया सामग्री और आरोपी की भूमिका को ज्यादा कठोर कसौटी पर परखा जाता है. कोर्ट ने संकेत दिया कि “आतंकी कृत्य” की परिभाषा केवल हिंसा तक सीमित नहीं, आवश्यक सेवाओं में व्यवधान और अर्थव्यवस्था पर प्रभाव भी इसके दायरे में आ सकते हैं.
बराबरी का सिद्धांत क्यों नहीं लगा?
सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली पुलिस की इस दलील से सहमति जताई कि सभी आरोपियों को एक तराजू पर नहीं तौला जा सकता. कोर्ट के मुताबिक, जमानत में समानता को “मैकेनिकल” तरीके से लागू नहीं किया जा सकता; भागीदारी की “हाइरार्की” मायने रखती है. इसी आधार पर कहा गया कि उमर खालिद और शरजील इमाम की भूमिका अन्य आरोपियों से “गुणात्मक रूप से अलग” प्रतीत होती है-यानी कथित साजिश में उनकी स्थिति और प्रभाव अलग स्तर पर आंका गया.
बचाव की दलील
बचाव पक्ष ने ट्रायल में देरी, पांच साल से अधिक हिरासत और प्रत्यक्ष हिंसा के ठोस सबूत न होने की बात रखी. इसके उलट, दिल्ली पुलिस ने इसे एक सुनियोजित, संगठित और ‘पैन-इंडिया’ साजिश बताया-जिसका उद्देश्य सरकार को अस्थिर करना और अंतरराष्ट्रीय ध्यान खींचना था. अभियोजन ने यह भी कहा कि देरी के लिए आरोपी पक्ष का सहयोग न करना जिम्मेदार है और सहयोग मिले तो मुकदमा सीमित समय में निपट सकता है.
न्यायिक संयम
कोर्ट ने रेखांकित किया कि जमानत बचाव का मंच नहीं, लेकिन यह भी कहा कि अनुच्छेद 21 राज्य से लंबी प्री-ट्रायल हिरासत का औचित्य मांगता है. यही संतुलन इस आदेश का केंद्रीय तनाव है-एक तरफ राष्ट्रीय सुरक्षा और साजिश के आरोप, दूसरी तरफ व्यक्तिगत स्वतंत्रता. अदालत ने संकेत दिया कि यह संतुलन केस-टू-केस तय होगा, किसी सामान्य फार्मूले से नहीं.
सुप्रीम कोर्ट ने क्या संदेश दिया?
- UAPA में जमानत ‘ऑटोमैटिक’ नहीं: सुप्रीम कोर्ट ने साफ संदेश दिया कि Supreme Court of India के लिए UAPA जैसे कानूनों में जमानत सामान्य नियम नहीं है. सिर्फ यह तर्क कि आरोपी लंबे समय से जेल में है, अपने-आप में जमानत का आधार नहीं बन सकता. अदालत ने कहा कि ऐसे मामलों में आरोपों की प्रथम दृष्टया गंभीरता और भूमिका की प्रकृति ज्यादा अहम है.
- देरी का मतलब बरी नहीं: कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि ट्रायल में देरी चिंता का विषय हो सकती है, लेकिन इसे “शॉर्टकट” बनाकर जमानत नहीं दी जा सकती. यानी अदालत यह नहीं मानती कि समय बीतने से आरोप कमजोर हो जाते हैं. यह संदेश उन मामलों के लिए अहम है जहां राष्ट्रीय सुरक्षा या बड़ी साजिश के आरोप लगाए जाते हैं.
- ‘बराबरी’ का सिद्धांत मैकेनिकल नहीं: सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सह-आरोपियों को मिली जमानत के आधार पर हर आरोपी को राहत देना जरूरी नहीं. अदालत ने यह संकेत दिया कि कथित साजिश में भूमिका की हाइरार्की मायने रखती है. यानी हर आरोपी को एक ही तराजू पर नहीं तौला जा सकता.
- ‘आतंकी कृत्य’ की परिभाषा पर सख्त नजर: कोर्ट ने यह संदेश भी दिया कि आतंकी गतिविधि केवल हथियार उठाने या सीधे हिंसा तक सीमित नहीं है. अगर किसी कार्रवाई से सार्वजनिक व्यवस्था, आवश्यक सेवाएं या देश की स्थिरता प्रभावित होती है, तो उसे भी गंभीर श्रेणी में देखा जा सकता है.
- मिनी ट्रायल नहीं: अदालत ने दो टूक कहा कि जमानत की सुनवाई ट्रायल का विकल्प नहीं हो सकती. इस स्तर पर सबूतों की अंतिम सत्यता तय नहीं की जाती, बल्कि यह देखा जाता है कि अभियोजन की कहानी पूरी तरह मनगढ़ंत तो नहीं है.
- राजनीतिक नहीं, कानूनी संदेश: इस फैसले से सुप्रीम कोर्ट ने यह भी संकेत दिया कि वह ऐसे मामलों में राजनीतिक दबाव या सार्वजनिक बहस से नहीं, बल्कि कानून की कठोर कसौटी से फैसला करेगा. चाहे मामला कितना ही संवेदनशील क्यों न हो, अदालत का फोकस “कानूनी फ्रेमवर्क” पर रहेगा.
राजनीतिक संदेश और आगे की राह
यह फैसला राजनीतिक बहस को भी धार देता है-समर्थकों के लिए यह कड़े कानूनों के दुरुपयोग का उदाहरण, तो विरोधियों के लिए कानून-व्यवस्था की रक्षा. कानूनी तौर पर संदेश साफ है: UAPA मामलों में जमानत आसान नहीं होगी, खासकर जब अदालत को भूमिका “क्वालिटेटिवली डिफरेंट” लगे. आगे की लड़ाई ट्रायल की गति, सबूतों की कसौटी और संवैधानिक संतुलन पर टिकेगी-जहां हर सुनवाई के साथ यह प्रश्न लौटेगा कि सुरक्षा और स्वतंत्रता के बीच रेखा कहां खींची जाए.














