रुकिए ज़रा! शादी से पहले जान लें 3-6-9 फॉर्मूला, वरना बाद में हो सकता है पछतावा

नई दिल्ली। हर रिश्ते की शुरुआत किसी खूबसूरत सपने या बॉलीवुड फिल्म की तरह होती है। घंटों तक चलने वाली मीठी बातें, बेवजह चेहरे पर रहने वाली मुस्कान और हर अगली मुलाकात का बेसब्री से इंतजार। इसी शुरुआती जोश और दीवानगी में लोग अक्सर साथ रहने, सगाई करने या फिर शादी जैसे जिंदगी के सबसे बड़े फैसले ले बैठते हैं। लेकिन कुछ ही महीनों बाद जब प्यार का खुमार उतरता है और एक-दूसरे की असली आदतें, सोच और व्यवहार सामने आते हैं, तो वही सपनों सा रिश्ता एक बोझ लगने लगता है।

ऐसी ही उलझनों और भविष्य के पछतावे से बचाने के लिए एक दिलचस्प फॉर्मूला है- 3-6-9 नियम। यह कोई ज्योतिष की गणना नहीं, बल्कि एक प्रैक्टिकल ‘पेसिंग गाइड’ है, जो किसी भी रिश्ते को जल्दबाजी के बजाय समझदारी से परखने और आगे बढ़ाने में मदद करती है। अगर आप भी शादी के बंधन में बंधने की सोच रहे हैं, तो यह नियम आपके लिए जानना बेहद जरूरी है।

3 महीने: गुलाबी चश्मे वाला ‘हनीमून फेज’

किसी भी रिश्ते के शुरुआती तीन महीने “हनीमून फेज” कहलाते हैं। इस दौरान पार्टनर की हर बात अच्छी लगती है, यहां तक कि उसकी खामियां भीน่ารัก लगती हैं। दिमाग में प्यार का केमिकल (डोपामिन) इतना हावी होता है कि सबकुछ परफेक्ट नजर आता है। लेकिन तीसरे महीने के खत्म होते-होते यह खुमार उतरने लगता है। अब आप अपने पार्टनर को उसके असल रूप में देखना शुरू करते हैं। उसकी छोटी-छोटी आदतें, सोचने का तरीका और व्यवहार, जो पहले नजर नहीं आता था, अब साफ दिखने लगता है। यही वो पहला मोड़ है, जहां आपको खुद से यह सवाल पूछना चाहिए- “क्या मैं इस इंसान को उसकी असलियत और कमियों के साथ अपना सकता/सकती हूं?”

6 महीने: फन नहीं, अब है ‘रियल’ रिलेशन का टेस्ट

छह महीने पूरे होते-होते आपका रिश्ता सिर्फ डेटिंग, मूवी और घूमने-फिरने वाले ‘फन मोड’ से निकलकर ‘रियल मोड’ में एंट्री कर लेता है। अब तक आप दोनों के बीच छोटे-मोटे झगड़े, किसी बात पर असहमति या तनाव की स्थिति जरूर आ चुकी होती है। यह फेज इस बात का असली टेस्ट है कि आपका रिश्ता सिर्फ अच्छे वक्त का साथी है या आप दोनों मिलकर मुश्किल हालात भी संभाल सकते हैं। यहां सबसे बड़ा सवाल यह होता है कि “क्या हम बहस और झगड़े के बाद एक-दूसरे की बात समझ पा रहे हैं, या सिर्फ अपनी बात मनवाने की जिद कर रहे हैं?” अगर समझदारी जीत रही है, तो आपका रिश्ता सही ट्रैक पर है।

9 महीने: अब है ‘बड़ा फैसला’ लेने का सही समय

नौ महीने का समय इतना होता है कि आप अपने पार्टनर का लगभग हर रंग देख चुके होते हैं- उसका गुस्सा, उसकी खुशी, दुख में उसका व्यवहार, उसकी प्राथमिकताएं और जिंदगी को लेकर उसके असली लक्ष्य। अब रिश्ता सिर्फ इमोशनल एक्साइटमेंट पर नहीं, बल्कि प्रैक्टिकल समझ पर टिकने लगता है। यही वो निर्णायक पड़ाव है, जहां आपको यह तय करना होता है कि क्या आप दोनों की जिंदगी की वैल्यूज और भविष्य की सोच एक जैसी है? क्या आप दोनों एक-दूसरे के लक्ष्यों का सम्मान करते हैं? क्या यह रिश्ता लंबे समय तक चलने के लिए बना है? अगर इन सभी सवालों का जवाब ‘हां’ में है, तो आप अपने रिश्ते को अगले लेवल पर ले जाने के लिए तैयार हैं। और अगर नहीं, तो जल्दबाजी में जिंदगी बर्बाद करने से बेहतर है कि समय रहते एक सही फैसला ले लिया जाए।

क्या है इस नियम का असली मकसद?

3-6-9 नियम का सीधा मकसद आपको जल्दबाजी में लिए गए गलत फैसलों से बचाना है। यह नियम कहता है कि रिश्ता भले ही दिल से शुरू हो, लेकिन उसे दिमाग लगाकर ही आगे बढ़ाना चाहिए। यह आपको अपने पार्टनर को हर कसौटी पर परखने का पूरा समय देता है, ताकि बाद में “मैंने तुम्हें ठीक से समझा ही नहीं” जैसे बहाने न बनाने पड़ें। बेशक हर रिश्ता अलग होता है, लेकिन यह नियम एक शानदार गाइड है जो आपको याद दिलाता है कि जिंदगी के सबसे बड़े फैसले के लिए वक्त लेना कितना जरूरी है।

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