यूपी में ‘93’ की वापसी के संकेत? अखिलेश के नरम सुर और नसीमुद्दीन की एंट्री से तेज हुई सियासी चर्चा…क्या फिर साथ आएंगे ‘बुआ-बबुआ’?

 

लखनऊ: उत्तर प्रदेश की सियासी फिजाओं में एक बार फिर बड़े बदलाव की महक आने लगी है। समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव द्वारा हाल ही में दिए गए संकेतों ने राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा तेज कर दी है कि क्या 2027 के विधानसभा चुनावों में ‘हाथी’ और ‘साइकिल’ फिर से एक साथ नजर आएंगे? पूर्व बसपा दिग्गज और कद्दावर नेता नसीमुद्दीन सिद्दीकी के सपा में शामिल होने के बाद अखिलेश यादव का यह कहना कि “बहुजन समाज और सपा का रिश्ता बहुत गहरा है”, महज एक बयान नहीं बल्कि एक बड़ा राजनीतिक संदेश माना जा रहा है।

अखिलेश यादव का ‘PDA’ फॉर्मूला

अखिलेश यादव का ‘PDA’ (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) फॉर्मूला अब चुनावी नारों से आगे बढ़कर जमीन पर उतरता दिख रहा है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि बसपा के दिग्गज नेताओं को पार्टी में शामिल कर अखिलेश दलित समुदाय के बीच यह संदेश देना चाहते हैं कि सपा ही अब उनके हकों की असल लड़ाई लड़ रही है। मायावती के प्रति अखिलेश के बदले हुए सुर और नसीमुद्दीन सिद्दीकी जैसे ‘बहुजन राजनीति’ के पुराने चेहरों का साथ आना, बसपा के पारंपरिक वोट बैंक में सेंधमारी और विश्वास बहाली की एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है।

इतिहास के उतार-चढ़ाव और 2027 की चुनौती

सपा और बसपा का गठबंधन हमेशा से ‘सत्ता परिवर्तक’ रहा है। 1993 में मुलायम सिंह यादव और कांशीराम की जोड़ी ने भाजपा के बढ़ते रथ को रोका था, लेकिन 1995 के गेस्ट हाउस कांड ने ऐसी दूरियां पैदा कीं जो दशकों तक नहीं भरीं। 2019 के लोकसभा चुनाव में ‘बुआ-बबुआ’ का प्रयोग सफल तो हुआ लेकिन चुनाव के तुरंत बाद गठबंधन टूट गया। अब 2026-27 के मुहाने पर खड़ी यूपी की राजनीति में अखिलेश यादव एक बार फिर ‘समावेशी राजनीति’ का कार्ड खेल रहे हैं, ताकि भाजपा के अजेय किले को सामाजिक न्याय के बड़े मोर्चे से घेरा जा सके।

फिलहाल बसपा प्रमुख मायावती की ओर से इस दिशा में कोई आधिकारिक बयान नहीं आया है, लेकिन सपा में बढ़ती ‘नीली हलचल’ उनके लिए बड़ी चुनौती है। 2024 के लोकसभा चुनाव में बसपा का खाता न खुलना और 2026 के अंत तक संसद के दोनों सदनों में बसपा का प्रतिनिधित्व ‘शून्य’ होने की संभावना ने पार्टी को अस्तित्व के संकट में डाल दिया है। ऐसे में क्या मायावती 2027 के लिए सपा के इस ‘सॉफ्ट संदेश’ को स्वीकार करेंगी या अपनी अलग राह चुनेंगी, यह देखना दिलचस्प होगा।

सियासी बिसात: सीधा मुकाबला या त्रिकोणीय संघर्ष?

उत्तर प्रदेश में योगी सरकार के खिलाफ विपक्ष अब एकजुट होने की फिराक में है। परंपरा, प्रतिनिधित्व और सामाजिक सम्मान के मुद्दों को उछालकर सपा खुद को इस गठबंधन के केंद्र में रख रही है। यदि सपा-बसपा और कांग्रेस का यह सामाजिक समीकरण फिट बैठता है, तो 2027 की चुनावी जंग बेहद रोमांचक और निर्णायक मोड़ पर पहुंच जाएगी। फिलहाल औपचारिक गठबंधन दूर की कौड़ी है, लेकिन बदली हुई जुबान और नए चेहरों की एंट्री ने 2027 का माहौल अभी से गर्म कर दिया है। 

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