राउंड-ट्रिपिंग के आरोपों से घिरी येस बैंक–एआरसी डील

Housing Development and Infrastructure Limited (एचडीआईएल) के निलंबित निदेशक राकेश कुमार वधावन द्वारा दायर विस्तृत शिकायत के बाद YES Bank और Suraksha Asset Reconstruction Private Limited के बीच हुए कर्ज असाइनमेंट सौदे पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। मुंबई पुलिस की आर्थिक अपराध शाखा (ईओडब्ल्यू) से इस मामले में आपराधिक जांच की मांग की गई है, और सूत्रों के अनुसार आरोपों की प्रारंभिक समीक्षा की जा रही है।

शिकायत में आरोप लगाया गया है कि वित्तीय वर्ष 2016-17 से 2018-19 के बीच स्वीकृत और पुनर्गठित किए गए कुछ कर्ज बाद में सुरक्षा एआरसी को ऐसे तरीके से हस्तांतरित किए गए, जिनमें पारदर्शी मूल्य निर्धारण प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया। दावा है कि कर्ज बिक्री से पहले न तो स्वतंत्र मूल्यांकन कराया गया और न ही खुली व प्रतिस्पर्धी बोली प्रक्रिया अपनाई गई।

मामले का सबसे गंभीर पहलू तथाकथित “क्लोज्ड-लूप फंडिंग” और राउंड-ट्रिपिंग से जुड़ा है। शिकायत के अनुसार, तनावग्रस्त परिसंपत्तियों के अधिग्रहण के लिए आवश्यक 15 प्रतिशत मार्जिन राशि वास्तविक बाहरी निवेश से नहीं आई, बल्कि उन समूह कंपनियों के माध्यम से उपलब्ध कराई गई जिन्हें उसी अवधि में येस बैंक से वित्तपोषण प्राप्त हुआ था। आरोप है कि इस व्यवस्था के तहत धन का स्रोत अंततः स्वयं ऋणदाता बैंक ही था, जिससे लेन-देन की निष्पक्षता और नियामकीय अनुपालन पर सवाल उठते हैं।

शिकायत में यह भी उल्लेख है कि येस बैंक की विशेष ऑडिट रिपोर्ट में तनावग्रस्त कर्जों की बिक्री से पहले नीलामी या प्रतिस्पर्धी बोली प्रक्रिया के अभाव और मूल्यांकन दस्तावेजों की कमी को रेखांकित किया गया था। आरोप है कि कुछ SMA-2 वर्गीकृत खातों को भी आवश्यक वसूली प्रयासों के बिना एआरसी को हस्तांतरित कर दिया गया, जिससे बैलेंस शीट को बेहतर प्रदर्शित करने और तनावग्रस्त खातों को “एवरग्रीन” करने की आशंका पैदा होती है।

एक विशेष लेन-देन का हवाला देते हुए शिकायत में कहा गया है कि सैफायर लैंड डेवलपमेंट प्राइवेट लिमिटेड को ₹150 करोड़ का टर्म लोन दिया गया, जबकि आंतरिक दस्तावेजों में ₹100 करोड़ की स्वीकृति का उल्लेख था। आरोप है कि यह कर्ज मोरेटोरियम अवधि के भीतर ही, खाते को एनपीए घोषित किए बिना, एआरसी को असाइन कर दिया गया।

₹154.53 करोड़ की बकाया राशि को ₹150 करोड़ में हस्तांतरित करने को शिकायत में “कलरेबल डिवाइस” करार दिया गया है। दावा है कि न तो स्वतंत्र मूल्यांकन कराया गया, न ही बाजार आधारित प्राइस डिस्कवरी अपनाई गई, और बोर्ड की मंजूरी बाद में ली गई। साथ ही यह भी आरोप है कि येस बैंक ने ₹127.50 करोड़ के सिक्योरिटी रिसीट्स के जरिए परिसंपत्तियों में पर्याप्त आर्थिक हित बनाए रखा, जिससे “ट्रू सेल” की प्रकृति संदिग्ध हो जाती है।

वधावन ने सारफेसी कानून और आरबीआई के उन दिशा-निर्देशों के संभावित उल्लंघन का भी आरोप लगाया है, जो एनबीएफसी वित्तपोषण और परिसंपत्ति प्रतिभूतिकरण को नियंत्रित करते हैं। शिकायत में कहा गया है कि इन असाइनमेंट्स के जरिए सुरक्षा एआरसी को दिवाला कार्यवाहियों में अधिक दावे और मतदान अधिकार प्राप्त हुए, जिससे कॉरपोरेट दिवाला समाधान प्रक्रिया की निष्पक्षता प्रभावित हो सकती है।

ईओडब्ल्यू से आपराधिक साजिश, धोखाधड़ी, आपराधिक विश्वासघात, दस्तावेजों में हेरफेर और धन के दुरुपयोग जैसे संभावित अपराधों की जांच करने का अनुरोध किया गया है। साथ ही संबंधित ऑडिट रिपोर्ट, ट्रांजैक्शन ट्रेल और आंतरिक स्वीकृतियों की विस्तृत जांच की मांग की गई है।

हालांकि, येस बैंक और सुरक्षा एसेट रिकंस्ट्रक्शन प्राइवेट लिमिटेड की ओर से अब तक इन आरोपों पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। यदि प्रारंभिक जांच में आरोपों में तथ्य पाए जाते हैं, तो औपचारिक मामला दर्ज किया जा सकता है।

यह मामला ऐसे समय सामने आया है जब तनावग्रस्त कर्जों की बिक्री और एआरसी मॉडल की पारदर्शिता पर पहले से ही बहस जारी है। ईओडब्ल्यू की संभावित जांच बैंकिंग और एसेट रिकंस्ट्रक्शन ढांचे की विश्वसनीयता पर व्यापक प्रभाव डाल सकती है।

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