बच्चों के ऑनलाइन गेम के पीछे छिपा है ‘डिजिटल जिहाद’….आतंकी संगठन ऐसे कर रहे हैं मासूमों का ब्रेनवॉश

 

Gaming Terror Threat: अगर आपका बच्चा भी घंटों तक मोबाइल या कंप्यूटर पर ऑनलाइन गेम्स खेलता है, तो यह खबर आपकी नींद उड़ा सकती है। लोकप्रिय गेमिंग प्लेटफॉर्म्स, जिन्हें अब तक केवल मनोरंजन का जरिया माना जाता था, अब आतंकी और नफरत फैलाने वाले संगठनों के लिए ‘रिक्रूटमेंट ग्राउंड’ (भर्ती का केंद्र) बन गए हैं। अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा एजेंसियों की ताजा रिपोर्ट्स में एक चौंकाने वाला खुलासा हुआ है कि खतरनाक संगठन ऑनलाइन गेमिंग की आड़ में मासूम बच्चों को बहला-फुसलाकर उन्हें कट्टरपंथ और हिंसा की अंधी गली में धकेल रहे हैं।

पहले दोस्ती, फिर गेमिंग टिप्स और अंत में कट्टरपंथ का जहर

सुरक्षा विशेषज्ञों के अनुसार, यह पूरा नेटवर्क एक सोची-समझी साजिश के तहत काम करता है। इन प्लेटफॉर्म्स पर मौजूद प्राइवेट सर्वर और चैट फीचर्स का फायदा उठाकर आतंकी गिरोह के सदस्य पहले बच्चों से साधारण खिलाड़ी बनकर दोस्ती करते हैं। वे बच्चों को गेम जीतने के टिप्स देते हैं और धीरे-धीरे उनका भरोसा जीतते हैं। एक बार विश्वास कायम होने के बाद, इन बच्चों को ‘क्लोज कम्युनिटीज’ और टेलीग्राम जैसे प्राइवेट चैट चैनल्स पर ले जाया जाता है। यहीं से शुरू होता है असली खेल, जहां उन्हें नफरत भरी सामग्री दिखाई जाती है और उनका मानसिक धर्मांतरण (Brainwash) किया जाता है।

डिजिटल सिमुलेशन: गेम के बहाने हथियारों की ट्रेनिंग

रिपोर्ट में सबसे डरावना खुलासा यह हुआ है कि कुछ गेम्स के भीतर ऐसे ‘डिजिटल वर्ल्ड’ तैयार किए गए हैं, जो हूबहू आतंकी हमलों जैसी स्थितियों का सिमुलेशन (नकल) करते हैं। बच्चे इसे महज एक लेवल पार करना समझते हैं, लेकिन वास्तव में यह उन्हें हिंसक हमलों के लिए मानसिक रूप से तैयार करने की एक प्रक्रिया है। कई मामलों में तो ऑनलाइन गाइड और वीडियो के जरिए बच्चों को विस्फोटक बनाने और अत्याधुनिक हथियारों के इस्तेमाल की जानकारी भी गुप्त रूप से साझा की जा रही है।

नई डिजिटल पीढ़ी पर खतरा और विशेषज्ञों की चेतावनी

दुनियाभर के रिसर्च संस्थानों का मानना है कि आज की ‘डिजिटल नेटिव’ पीढ़ी सोशल मीडिया और ऑनलाइन गेम्स पर अपनी जिंदगी का बड़ा हिस्सा बिताती है। प्राइवेसी सेटिंग्स और एन्क्रिप्टेड चैट की वजह से सुरक्षा एजेंसियों के लिए भी इन गतिविधियों को ट्रैक करना मुश्किल हो रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि आतंकी संगठन अब खुले मैदानों के बजाय इन वर्चुअल स्पेस का इस्तेमाल इसलिए कर रहे हैं क्योंकि यहां बच्चों को निशाना बनाना और उन्हें रेडिकलाइज करना बेहद आसान है।

अभिभावकों के लिए ‘अलार्म बेल’: ऐसे सुरक्षित रखें अपना बच्चा

इस गंभीर खतरे से निपटने में माता-पिता की भूमिका सबसे अहम है। विशेषज्ञों ने अभिभावकों के लिए कुछ जरूरी दिशा-निर्देश जारी किए हैं:

  • पैरेंटल कंट्रोल: गेमिंग ऐप्स और डिवाइस पर पैरेंटल कंट्रोल फीचर्स का अनिवार्य रूप से उपयोग करें।
  • गतिविधियों पर नजर: बच्चा ऑनलाइन किससे बात कर रहा है और किस तरह के ग्रुप्स का हिस्सा है, इस पर नजर रखें।
  • गेमिंग टाइम लिमिट: स्क्रीन टाइम को सीमित करें और बच्चों को बाहरी गतिविधियों के लिए प्रोत्साहित करें।
  • खुली बातचीत: बच्चों को डिजिटल सुरक्षा के बारे में समझाएं और उन्हें बताएं कि किसी भी अनजान व्यक्ति से अपनी निजी जानकारी साझा न करें।

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