लखनऊ अग्निकांड : 15 मौतों के गुनहगारों को क्या होगी उम्रकैद? जानिए बीएनएस की कौन सी धाराएं तय करेंगी सजा

लखनऊ। उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के अलीगंज में हुए भीषण अग्निकांड ने पूरे देश को हिलाकर रख दिया है. इस दिल दहला देने वाले हादसे में अब तक 15 मासूम जिंदगियां काल के गाल में समा चुकी हैं, जिनमें ज्यादातर किशोर और युवा शामिल थे. वहीं, कई लोग किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी (KGMU) के ट्रॉमा सेंटर में वेंटिलेटर पर जिंदगी और मौत के बीच अंतिम सांसें गिन रहे हैं. इस भयावह त्रासदी के बाद चौतरफा दबाव में आई सरकार ने फौरी कार्रवाई करते हुए कई सरकारी अधिकारियों और कर्मचारियों को सस्पेंड कर दिया है, जबकि बिल्डिंग के मालिक सहित कुछ मुख्य आरोपियों को गिरफ्तार कर जेल भेजा जा चुका है.

अब तक की जांच में जो कड़वी सच्चाई सामने आई है, वह बेहद चौंकाने वाली है. जिस इमारत में यह तांडव हुआ, वह कागजों पर पूरी तरह ‘रिहायशी’ (Residential) थी, लेकिन इसके हर फ्लोर पर धड़ल्ले से कमर्शियल एक्टिविटीज चल रही थीं. बेसमेंट से लेकर ऊपरी मंजिलों तक कोचिंग सेंटर और दुकानें चल रही थीं, जहां सैकड़ों छात्र मौजूद थे. हादसे के फौरन बाद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने मामले की गंभीरता को देखते हुए फौरन विशेष जांच दल (SIT) का गठन किया है, जबकि लखनऊ विकास प्राधिकरण (LDA) के वीसी ने भी एक आंतरिक जांच कमेटी बिठा दी है. लेकिन अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या इन तमाम कड़े कदमों के बाद गुनहगारों को सख्त सजा मिलेगी? आइए, इस पूरे घटनाक्रम को देश के नए कानून यानी भारतीय न्याय संहिता (BNS) के नजरिए से समझने की कोशिश करते हैं.

अवैध व्यावसायिक गतिविधियां बनीं 15 मासूमों की मौत का कारण

कानून के मुताबिक किसी भी शुद्ध आवासीय या रेजिडेंशियल इलाके में बिना अनुमति कोचिंग सेंटर या कोई भी व्यावसायिक गतिविधि संचालित करना पूरी तरह से गैरकानूनी और दंडनीय अपराध है. अलीगंज की इस बदकिस्मत इमारत में न सिर्फ इस नियम को ताक पर रखा गया, बल्कि फायर सेफ्टी (अग्नि सुरक्षा) के कोई इंतजाम नहीं थे. इमारत की सीढ़ियां इतनी संकरी थीं कि दो लोग एक साथ ठीक से नहीं निकल सकते थे. रही-सही कसर बिजली कटते ही जाम हुए ‘बायोमेट्रिक ऑटोमैटिक लॉक’ ने पूरी कर दी, जिसने बच्चों को बाहर निकलने का मौका ही नहीं दिया. नियमों की इसी आपराधिक अनदेखी ने एक हंसती-खेलती इमारत को मौत के मलबे में तब्दील कर दिया.

एफआईआर में दर्ज धाराएं: क्या दोषियों को मिलेगी उम्रकैद?

लखनऊ पुलिस ने इस दर्दनाक हादसे को लेकर जो एफआईआर दर्ज की है, उसमें भारतीय न्याय संहिता (BNS) की बेहद गंभीर धाराओं को शामिल किया गया है. पुलिस ने आरोपियों के खिलाफ बीएनएस की धारा 110, 105, 125, 3(5) और उत्तर प्रदेश अग्नि शमन सेवा अधिनियम की धारा 6/10 के तहत मुकदमा दर्ज किया है. कानूनी जानकारों की मानें तो यदि पुलिस कोर्ट में इन धाराओं के तहत पुख्ता सबूत पेश कर देती है और इसी के अनुरूप चार्जशीट दाखिल होती है, तो इस मामले के मुख्य दोषियों को अधिकतम आजीवन कारावास (Umerkaid) की सजा होना तय है.

क्या है बीएनएस की धारा 105 और यह क्यों है इतनी खतरनाक?

भारतीय न्याय संहिता की धारा 105 (जो पहले आईपीसी की धारा 299/304 हुआ करती थी) बेहद गंभीर अपराधों के लिए लगाई जाती है. यह धारा ‘गैर-इरादतन हत्या’ यानी आपराधिक मानव वध (Culpable Homicide) से जुड़ी है. इसका सीधा मतलब यह है कि भले ही आरोपियों का इरादा किसी की जान लेने का न रहा हो, लेकिन उन्हें इस बात की पूरी जानकारी और भान था कि उनके इस कृत्य (बिना फायर सेफ्टी के अवैध कोचिंग चलाना) से किसी की जान जा सकती है. इस धारा के तहत कोर्ट दोषी को उम्रकैद या 10 साल तक की सख्त कैद और भारी जुर्माने की सजा सुना सकता है.

जांच बढ़ने पर लग सकती है लापरवाही से मौत की धारा 106

फिलहाल पुलिस ने जो शुरुआती एफआईआर दर्ज की है, उसमें धारा 106 का जिक्र नहीं है, लेकिन कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि जैसे-जैसे एसआईटी की जांच आगे बढ़ेगी, इस धारा को भी केस में जोड़ा जा सकता है. यह धारा लापरवाही के कारण हुई मौत (Rash or Negligent Act) के मामलों में लागू होती है. जांच एजेंसियां यह देख रही हैं कि कोचिंग सेंटर और बिल्डिंग मालिकों ने सुरक्षा के मानकों को किस हद तक नजरअंदाज किया. इस धारा के तहत दो साल तक की कैद, भारी जुर्माना या दोनों का प्रावधान है.

धारा 110 और 125 के तहत भी कसेगा कानूनी शिकंजा

पुलिस ने अपनी तफ्तीश में बीएनएस की धारा 110 को भी शामिल किया है. इस धारा के तहत सामान्य परिस्थितियों में दोषी पाए जाने पर 10 साल तक की जेल होती है, लेकिन अगर अपराध की प्रकृति बहुत क्रूर या वीभत्स हो, तो विशेष परिस्थितियों में माननीय अदालत इसमें भी आजीवन कारावास की सजा दे सकती है. इसके साथ ही, लोगों की व्यक्तिगत सुरक्षा और जीवन को खतरे में डालने के आरोप में धारा 125 लगाई गई है. रिहायशी इमारत में बिना इमरजेंसी एग्जिट के कोचिंग चलाना और बिजली के झूलते तारों को न हटाना इसी धारा के दायरे में आता है. इसके तहत गंभीर चोट पहुंचने की स्थिति में 3 साल तक की जेल और 10 हजार रुपये तक के जुर्माने का नियम है.

जब सबने मिलकर की साजिश, तो लगेगी बीएनएस की धारा 3(5)

इस मामले में पुलिस ने धारा 3(5) का भी इस्तेमाल किया है, जिसे पुराने कानून में ‘कॉमन इंटेंशन’ या सामान्य आशय (IPC Section 34) कहा जाता था. यह धारा तब प्रभावी होती है जब एक से अधिक लोग मिलकर किसी आपराधिक लापरवाही या कृत्य को अंजाम देते हैं. यदि अदालत में यह साबित हो जाता है कि बिल्डिंग मालिक, कोचिंग संचालक और स्थानीय अधिकारियों ने मिलकर साठगांठ की और नियमों को ठेंगा दिखाया, तो इस धारा के तहत हर एक व्यक्ति को उस अपराध के लिए बराबर का भागीदार माना जाएगा, जैसे उसने वह अपराध अकेले किया हो. यानी मुख्य अपराध की जो भी अधिकतम सजा होगी, वह ग्रुप में शामिल हर एक दोषी को भुगतनी पड़ेगी.

वीआईपी दौरों के बाद अब शुरू होगा असली कानूनी दांव-पेंच

हादसे की भयावहता को देखते हुए सूबे के मुखिया योगी आदित्यनाथ और स्थानीय सांसद व देश के रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने अपने सारे कार्यक्रम रद्द कर तुरंत लखनऊ का रुख किया और पीड़ितों से मुलाकात की. यही वजह है कि फिलहाल पूरा प्रशासनिक अमला बिजली की फुर्ती से दौड़ रहा है. लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या कुछ दिनों बाद जब यह मामला शांत हो जाएगा, तब भी न्याय की यही रफ्तार रहेगी? इसके बाद अदालतों में वकीलों की लंबी जिरह-बहस और तारीख-दर-तारीख का अंतहीन सिलसिला शुरू होगा.

सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता विनीत जिंदल के मुताबिक, “इस तरह के संवेदनशील और जघन्य मामलों में सबसे महत्वपूर्ण कड़ी पुलिस की चार्जशीट होती है. कानूनन ऐसे मामलों में घटना के 60 दिनों के भीतर हर हाल में अदालत में आरोप पत्र दाखिल हो जाना चाहिए. यदि पुलिस समय पर पुख्ता चार्जशीट दाखिल नहीं कर पाती है, तो तकनीकी आधार पर आरोपियों को कोर्ट से आसानी से जमानत (Bail) मिल जाती है. चूंकि इस अग्निकांड में लापरवाही के सबूत बिल्कुल साफ हैं, इसलिए त्वरित न्याय के लिए फास्ट ट्रैक कोर्ट और समयबद्ध चार्जशीट बेहद जरूरी है.” अलीगंज की यह त्रासदी चीख-चीख कर कह रही है कि अब वक्त आ गया है जब रिहायशी इलाकों में चल रहे मौत के इन अड्डों पर हमेशा के लिए ताला लगाया जाए, ताकि फिर किसी मां की गोद सूनी न हो.

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