स्कूलों के बाहर लगेंगे कैमरे, हर स्कूल पर 1.12 लाख रुपये का होगा खर्च; हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को दिया आदेश

लखनऊ। राजधानी में स्कूलों के बाहर बच्चों की सुरक्षा और यातायात व्यवस्था को बेहतर बनाने के लिए इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने अहम निर्देश दिए हैं। कोर्ट ने लखनऊ के याचिका में शामिल सभी 17 स्कूलों के बाहर कैमरे लगाने और इसके लिए होने वाले खर्च की जानकारी उपलब्ध कराने का आदेश दिया है। कोर्ट ने यह भी कहा कि लखनऊ के लिए जारी किए जा रहे इन निर्देशों को पूरे प्रदेश में लागू किया जाना चाहिए।

न्यायमूर्ति आलोक माथुर और न्यायमूर्ति वृजराज सिंह की खंडपीठ ने यह आदेश गोमती रिवरबैंक रेजिडेंट्स वेलफेयर एसोसिएशन की ओर से दाखिल जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान दिया।

हर स्कूल पर करीब 1.12 लाख रुपये का खर्च

कोर्ट ने पुलिस उपायुक्त (यातायात), लखनऊ को निर्देश दिया है कि वह याचिका में शामिल सभी 17 स्कूलों के बाहर कैमरे लगाने और इस काम में होने वाले खर्च की जानकारी दे।

पुलिस उपायुक्त (यातायात) की ओर से इस संबंध में विस्तृत पत्र जिलाधिकारी को भेजा जाएगा। इसके बाद जिलाधिकारी जिला विद्यालय निरीक्षक के माध्यम से संबंधित स्कूलों को इसकी जानकारी उपलब्ध कराएंगे।

सुनवाई के दौरान डीसीपी ट्रैफिक रवीना त्यागी ने अदालत को बताया कि स्कूलों की ओर से लगाए जाने वाले कैमरों को स्मार्ट सिटी के फीड से जोड़ने के लिए प्रत्येक स्कूल पर करीब 1,12,100 रुपये का खर्च आएगा। इसके अलावा कैमरों के रखरखाव, वाई-फाई कनेक्टिविटी और अन्य जरूरी खर्चों पर हर महीने करीब 9 हजार रुपये खर्च होने का अनुमान है।

स्कूल परिसर में 12 कैमरे लगाने का प्रस्ताव

सुनवाई के दौरान न्यायमित्र ने अदालत के समक्ष मानक संचालन प्रक्रिया यानी एसओपी भी प्रस्तुत की। यह एसओपी लामार्टिनियर गर्ल्स कॉलेज के परामर्श से तैयार की गई है।

एसओपी के अनुसार, स्कूल की ओर से परिसर के चारों ओर 12 कैमरे लगाने का प्रस्ताव रखा गया है। इन कैमरों की रिकॉर्डिंग यातायात पुलिस के साथ साझा की जा सकेगी। इससे स्कूल के आसपास यातायात व्यवस्था पर नजर रखने के साथ सुरक्षा संबंधी घटनाओं की निगरानी भी की जा सकेगी।

स्कूल बस और वैन में बच्चों की सुरक्षा का मुद्दा भी उठा

सुनवाई के दौरान स्कूल बसों और वैन चालकों से जुड़े बच्चों की सुरक्षा के मुद्दे पर भी चर्चा हुई। अदालत के सामने बच्चों के यौन उत्पीड़न से संबंधित चिंताएं भी रखी गईं।

बच्चों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए स्कूली वैन और बसों में महिला चालकों की नियुक्ति को लेकर भी प्रस्ताव का मुद्दा उठाया गया। इस संबंध में 30 जुलाई के आदेश के जरिए राज्य सरकार से राय मांगी गई थी, लेकिन परिवहन विभाग की ओर से जवाब नहीं आने के कारण अदालत इस मामले में पूर्ण निर्देश जारी नहीं कर सकी।

इस पर हाईकोर्ट ने परिवहन विभाग के अतिरिक्त मुख्य सचिव को अगली सुनवाई में संबंधित अभिलेखों के साथ व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होने का निर्देश दिया है। मामले की अगली सुनवाई 7 सितंबर को होगी।

लखनऊ के निर्देश पूरे प्रदेश में लागू करने पर जोर

अदालत ने स्पष्ट किया कि मौजूदा निर्देश लखनऊ जिले के संदर्भ में जारी किए जा रहे हैं, लेकिन बच्चों की सुरक्षा और स्कूल परिवहन व्यवस्था से जुड़े इन प्रावधानों को पूरे प्रदेश में लागू किया जाना चाहिए।

राज्य सरकार की ओर से अपर महाधिवक्ता ने कोर्ट को बताया कि 27 मई 2019 की अधिसूचना के माध्यम से विद्यालय परिवहन सुरक्षा समिति का गठन किया जा चुका है और सभी स्कूलों को इसका पालन करना अनिवार्य है।

हाईकोर्ट ने निर्देश दिया कि इस अधिसूचना को प्रभावी तरीके से लागू कराने के लिए अदालत के आदेश की एक प्रति मुख्य सचिव के माध्यम से प्रदेश के सभी जिलाधिकारियों को भेजी जाए।

कोर्ट के इन निर्देशों के बाद अब राजधानी समेत प्रदेशभर के स्कूलों में बच्चों की सुरक्षा, स्कूलों के बाहर यातायात प्रबंधन और सीसीटीवी निगरानी व्यवस्था को लेकर कार्रवाई तेज होने की उम्मीद है।

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