अनुच्छेद 22(1) का उल्लंघन कर रिहा आरोपी की दोबारा गिरफ्तारी आसान नहीं: सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, मजिस्ट्रेट की अनुमति और विभागीय कार्रवाई अनिवार्य

नई दिल्ली।  सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को मौलिक अधिकारों और पुलिस शक्तियों के संतुलन को लेकर एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया है कि यदि संविधान के अनुच्छेद 22(1) का उल्लंघन करते हुए—यानी बिना लिखित कारण बताए—किसी आरोपी को गिरफ्तार किया जाता है और अदालत उसे रिहा कर देती है, तो पुलिस उसे दोबारा अपनी मर्जी से गिरफ्तार नहीं कर सकती।

जस्टिस उज्ज्वल भुइयां और जस्टिस अतुल चंदुरकर की पीठ ने निर्देश जारी करते हुए प्रक्रिया को सख्त बना दिया है, ताकि जांच एजेंसियों द्वारा प्रक्रियात्मक सुरक्षा उपायों के दुरुपयोग को रोका जा सके।

दोबारा गिरफ्तारी के लिए माननी होंगी ये 4 कढ़ी शर्तें

अदालत ने दोबारा गिरफ्तारी की प्रक्रिया को नियंत्रित करने के लिए स्पष्ट नियम तय किए हैं:

  1. मजिस्ट्रेट की पूर्व अनुमति: पुलिस को आरोपी को दोबारा हिरासत में लेने के लिए संबंधित ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट के सामने औपचारिक अर्जी दाखिल कर मंजूरी लेनी होगी।

  2. कारण का लिखित खुलासा: अर्जी दाखिल करने से पहले आरोपी को उसकी गिरफ्तारी के आधार लिखित रूप में दिए जाने आवश्यक हैं।

  3. वरिष्ठ अधिकारी की मंजूरी: अर्जी पर उस पुलिस अधिकारी के ठीक वरिष्ठ (Senior) अधिकारी की मंजूरी होनी चाहिए, जिसने पहली अवैध गिरफ्तारी की थी।

  4. विलंब का वाजिब कारण: अर्जी में स्पष्ट बताना होगा कि पहली बार गिरफ्तारी के वक्त आरोपी को कारण क्यों नहीं बताए जा सके थे।

गलती करने वाले पुलिस अधिकारी पर बैठेगी जांच, जांच अधिकारी भी बदला जाएगा

जस्टिस उज्ज्वल भुइयां ने फैसले में टिप्पणी करते हुए कहा, “एक बार जब संविधान के अनुच्छेद 22(1) का उल्लंघन हो जाता है, तो दोबारा गिरफ्तारी का अधिकार उसी अधिकारी की मर्जी पर नहीं छोड़ा जा सकता। इसे पूरी तरह न्यायिक निगरानी के तहत लागू किया जाना चाहिए।”

कोर्ट ने निर्देश दिया कि सीनियर अधिकारी के सामने जब ऐसी अर्जी आए, तो वे तुरंत मामले की जांच किसी अन्य निष्पक्ष अधिकारी को सौंपेंगे। इसके साथ ही, अनुच्छेद 22(1) जैसी गंभीर संवैधानिक चूक करने वाले दोषी पुलिस अधिकारी के खिलाफ विभागीय अनुशासनात्मक कार्रवाई (Departmental Enquiry) शुरू की जाएगी और जांच के नतीजे उसकी सर्विस बुक (Service Book) में दर्ज किए जाएंगे।

मिहिर राजेश शाह केस के सिद्धांतों का विस्तार

शीर्ष अदालत ने यह फैसला ‘मिहिर राजेश शाह बनाम महाराष्ट्र राज्य (2025)’ के मामले में तय सिद्धांतों को और विस्तार देते हुए सुनाया। कोर्ट ने दोहराया कि:

  • हर कानून पर लागू: अनुच्छेद 22(1) के तहत मिलने वाला यह अधिकार केवल सामान्य आपराधिक मामलों तक सीमित नहीं है, बल्कि विशेष कानूनों (Special Acts) के तहत की जाने वाली गिरफ्तारियों पर भी समान रूप से लागू होता है।

  • पूर्वाग्रह साबित करना जरूरी नहीं: आरोपी को यह साबित करने की आवश्यकता नहीं है कि गिरफ्तारी के आधार न मिलने से उसे क्या नुकसान हुआ, क्योंकि यह एक मौलिक अधिकार (Fundamental Right) है।

  • जमानत नहीं माना जाएगा: गैर-कानूनी गिरफ्तारी रद्द होने के बाद रिहाई को तकनीकी रूप से ‘जमानत’ (Bail) नहीं माना जाएगा, इसलिए दोबारा गिरफ्तारी में सख्त प्रक्रिया का पालन अनिवार्य है।

 

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