
नई दिल्ली। देश के राजनीतिक और प्रशासनिक गलियारों में नए मतदाताओं के ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन के लिए इस्तेमाल होने वाले फॉर्म 6 (ECInet) को लेकर एक बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। चुनाव आयोग के भीतर से ही उठे असहमति के सुरों ने अब कानूनी और राजनीतिक दोनों मोर्चों पर इस मुद्दे को गरमा दिया है। आयोग के दो निर्वाचन आयुक्तों—डॉ. सुखबीर सिंह संधू और डॉ. विवेक जोशी द्वारा दर्ज कराए गए ‘डिसेंट नोट’ (असहमत पत्र) के बाद अब विपक्षी दल सरकार और मुख्य निर्वाचन आयुक्त पर पूरी तरह से हमलावर हो चुके हैं।
क्या है नया बदलाव और क्यों छिड़ा विवाद?
मतदाता सूची में नया नाम दर्ज कराने के लिए ऑनलाइन पोर्टल पर मिलने वाले फॉर्म 6 में ‘विशेष गहन पुनरीक्षण’ (SIR) से जुड़ा एक नया ‘डिक्लेरेशन पार्ट’ (घोषणा खंड) जोड़ दिया गया है। इसके तहत पहली बार वोट देने वाले युवाओं से उनके परिवार के चुनावी रिकॉर्ड से जुड़े तीन सवाल पूछे जा रहे हैं—
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क्या 2000 के दशक की शुरुआत में हुए SIR के दौरान मतदाता सूची में उनका नाम दर्ज था?
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क्या उस पुरानी सूची में उनके माता-पिता या दादा-दादी/नाना-नानी का नाम शामिल था?
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क्या उस सूची में न तो उनका और न ही उनके किसी परिजन का नाम था?
हालांकि इस कॉलम को ‘गैर-अनिवार्य’ (Non-Mandatory) दिखाया गया है, लेकिन तकनीकी अड़चनों के कारण इसका जवाब दिए बिना फॉर्म सबमिट नहीं हो पा रहा है।
चुनाव आयुक्तों और पूर्व CEC ने जताई ये 4 बड़ी आपत्तियां
इस नए बदलाव पर निर्वाचन आयुक्तों के साथ-साथ पूर्व मुख्य निर्वाचन आयुक्त ओ.पी. रावत और पूर्व निर्वाचन आयुक्त अशोक लवासा ने भी गंभीर सवाल खड़े किए हैं:
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कानूनी प्रक्रिया का उल्लंघन: फॉर्म 6 एक वैधानिक (Statutory) फॉर्म है, जो Registration of Electors Rules, 1960 के तहत निर्धारित है। इसमें बदलाव के लिए कानून मंत्रालय की अधिसूचना और औपचारिक संशोधन अनिवार्य है। आयोग केवल एक आंतरिक आदेश जारी करके इसे बदल नहीं सकता।
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युवाओं के मताधिकार पर खतरा: आयुक्त संधू ने अपने ‘डिसेंट नोट’ में साफ आगाह किया था कि इस तरह की अधूरी और अनधिकृत घोषणाएं जोड़ने से युवाओं और नए मतदाताओं के मताधिकार छीनने का खतरा पैदा हो सकता है।
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पीढ़ीगत समस्या और डर का माहौल: पूर्व CEC ओ.पी. रावत ने कहा कि SIR की इस प्रक्रिया ने वोटरों के मन में डर का माहौल बना दिया है। जिन परिवारों के नाम 2000 के पुनरीक्षण के दौरान छूट गए थे, उनके बच्चों के सामने नाम जुड़वाने की बड़ी समस्या खड़ी हो गई है।
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डिजिटल कंट्रोल का केंद्रीकरण: आयुक्तों ने इस बात पर भी आपत्ति दर्ज कराई कि देश के डिजिटल चुनावी डेटाबेस (ECINet और ERONet) का नियंत्रण दिल्ली मुख्यालय में सीमित किया जा रहा है, जिससे जमीनी स्तर के अधिकारियों (EROs) की स्वतंत्रता प्रभावित हो रही है। पिछले 10 महीनों में इस मुद्दे पर 14 बार लिखित आपत्तियां दर्ज कराई गई हैं।
वहीं, दूसरी तरफ निर्वाचन आयोग ने आंतरिक मतभेदों की खबरों का खंडन करते हुए कहा है कि आयोग एक बहु-सदस्यीय संस्था है, जहां वैचारिक असहमति और सुझाव एक सामान्य बात है। आयोग का दावा है कि चुनावी पुनरीक्षण के सभी फैसले सर्वसम्मति से ही लिए गए हैं।
कांग्रेस का तीखा प्रहार: ‘CEC तुरंत दें इस्तीफा’
फॉर्म 6 के मुद्दे पर कांग्रेस ने सरकार और मुख्य निर्वाचन आयुक्त के खिलाफ कड़ा रुख अपनाया है। कांग्रेस प्रवक्ता और वरिष्ठ वकील डॉ. अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा कि इस खुलासे के बाद मुख्य निर्वाचन आयुक्त को एक मिनट भी अपने पद पर रहने का नैतिक अधिकार नहीं है और उन्हें तुरंत इस्तीफा देना चाहिए।
सिंघवी ने सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि मुख्य चुनाव आयुक्त सर्वोच्च प्राधिकारी नहीं हैं, बल्कि वे ‘समान पदों में प्रथम’ हैं। उन्होंने दोनों निर्वाचन आयुक्तों की असहमति की तारीफ करते हुए सभी ‘डिसेंट नोट्स’ को सार्वजनिक करने की मांग की।
लाखों वोटरों के नाम हटने का दावा
कांग्रेस नेता ने आंकड़ों का हवाला देते हुए आरोप लगाया कि SIR के पहले और दूसरे चरण में करीब 7.8 करोड़ मतदाताओं (कुल लिस्ट का 13%) के नाम हटाए जा चुके हैं। वर्तमान में चल रहे अगले चरण में 6.18 करोड़ नाम (17%) हटाए गए हैं और 5.43 करोड़ मतदाताओं को संदेहास्पद मानकर नोटिस भेजा गया है। उन्होंने आशंका जताई कि पूरी प्रक्रिया खत्म होने तक यह आंकड़ा 15 करोड़ तक पहुंच सकता है।













