UNGA में बेंजामिन नेतन्याहू का कड़ा रुख: गाजा युद्ध, हमास और फिलिस्तीन के मुद्दे पर तुर्की, ब्रिटेन और फ्रांस पर क्यों बरसे इजराइली पीएम? जानिए पूरी इनसाइड स्टोरी

न्यूयोर्क (संयुक्त राष्ट्र)। संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) के उच्चस्तरीय सत्र में इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू का संबोधन तीखे आरोपों, रणनीतिक दलीलों और आक्रामक कूटनीतिक संदेशों से भरा रहा। अपने भाषण के दौरान नेतन्याहू ने न केवल मुख्य विरोधी ईरान को आड़े हाथों लिया, बल्कि तुर्की, ब्रिटेन और फ्रांस जैसे प्रमुख देशों पर भी कड़ा निशाना साधा। जब वे मंच पर बोलने आए, तो कई देशों के राजनयिकों ने हॉल से बाहर निकलकर (वॉकआउट) विरोध जताया। हालांकि, नेतन्याहू ने विरोध को खारिज करते हुए अपनी सुरक्षा नीतियों और सैन्य अभियान का आक्रामक तरीके से बचाव किया।

तुर्की के राष्ट्रपति एर्दोगन और नेतन्याहू के बीच तल्खी की मुख्य वजह क्या है?

तुर्की और इजराइल के बीच तनाव का मुख्य केंद्र गाजा युद्ध और हमास की भूमिका है। गाजा में इजराइली सैन्य अभियानों के बाद तुर्की के राष्ट्रपति रेचेप तैयप एर्दोगन ने इजराइल के खिलाफ कड़ा रुख अपनाया है और फिलिस्तीनी अधिकारों के समर्थन में लगातार वैश्विक मंचों पर आवाज उठाई है।

नेतन्याहू ने अपने भाषण में एर्दोगन पर हमास के शीर्ष नेताओं को राजनीतिक शरण देने और इजराइल के खिलाफ नफरत का माहौल बनाने का आरोप लगाया। इजराइल हमास को पूरी तरह से आतंकवादी संगठन मानता है, जबकि तुर्की गाजा में हो रहे मानवीय नुकसान को लेकर इजराइल को कठघरे में खड़ा करता है। यही वैचारिक और राजनीतिक मतभेद दोनों देशों में जुबानी जंग की मुख्य वजह बना हुआ है।

पश्चिमी सहयोगियों पर निशाना: ब्रिटेन और फ्रांस से क्यों चिढ़ा इजराइल?

ब्रिटेन और फ्रांस पारंपरिक रूप से पश्चिमी ब्लॉक में इजराइल के करीबी सहयोगी रहे हैं, लेकिन गाजा में युद्ध की वजह से पैदा हुए मानवीय संकट और फिलिस्तीन को एक स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में मान्यता देने की बढ़ती मांग ने रिश्तों में दूरियां बढ़ा दी हैं।

नेतन्याहू ने तंज कसते हुए कहा कि ब्रिटेन और फ्रांस जैसे देश इजराइल पर औपनिवेशिक मानसिकता का आरोप लगाते हैं, जबकि उनका अपना इतिहास औपनिवेशिक शासन से भरा रहा है। दूसरी तरफ, ब्रिटेन और फ्रांस का कहना है कि उनकी चिंता ऐतिहासिक न होकर गाजा में बेकसूर नागरिकों की सुरक्षा, युद्धविराम और मानवीय सहायता की निर्बाध पहुंच से जुड़ी है।

फिलिस्तीनी राज्य की मान्यता पर छिड़ा कूटनीतिक संग्राम

संबोधन में एक बड़ा मुद्दा फिलिस्तीन को संप्रभु राज्य के रूप में मान्यता देने की वैश्विक कोशिशों का रहा। ब्रिटेन, फ्रांस और कई अंतरराष्ट्रीय समुदाय ‘टू-स्टेट सॉल्यूशन’ (दो-राज्य समाधान) को शांति का एकमात्र रास्ता मानते हैं।

नेतन्याहू ने इस विचार का पुरजोर विरोध करते हुए कहा कि वर्तमान परिस्थितियों में फिलिस्तीन को मान्यता देना हमास और आतंकवाद को इनाम देने जैसा होगा, जिससे इजराइल की राष्ट्रीय सुरक्षा खतरे में पड़ जाएगी। इसके विपरीत, समर्थकों की दलील है कि मान्यता से ही क्षेत्र में स्थायी शांति और फिलिस्तीनियों के राजनीतिक अधिकारों की रक्षा संभव है।

गाजा युद्ध पर नरसंहार के आरोपों का खंडन

गाजा में चल रहे सैन्य अभियान पर लग रहे अंतरराष्ट्रीय आरोपों को खारिज करते हुए नेतन्याहू ने स्पष्ट किया कि इजराइल पर लगाए जा रहे नरसंहार के दावे झूठे हैं। उन्होंने कहा कि इजराइल ने कोई नरसंहार नहीं किया, बल्कि 7 अक्टूबर 2023 को हमास द्वारा किए गए बर्बर आतंकी हमले के बाद अपने नागरिकों की रक्षा की है।

इजराइल का रुख है कि हमास नागरिक आबादी का इस्तेमाल ढाल के रूप में करता है और जब तक सभी बंधकों की सुरक्षित रिहाई नहीं हो जाती, तब तक अभियान जारी रहेगा।

UNGA में वॉकआउट का राजनीतिक संदेश और आगे का रास्ता

नेतन्याहू के भाषण के दौरान दुनिया भर के प्रतिनिधियों का हॉल छोड़कर जाना अंतरराष्ट्रीय मंच पर गहरे मतभेद को उजागर करता है। जहां आलोचक इसे इजराइल की नीतियों के खिलाफ वैश्विक आक्रोश मान रहे हैं, वहीं नेतन्याहू समर्थकों ने इसे इजराइल का साहसिक रुख बताया।

यह भाषण स्पष्ट करता है कि इजराइल बाहरी कूटनीतिक दबाव के बावजूद अपनी सुरक्षा प्राथमिकताओं से समझौता करने को तैयार नहीं है। गाजा में युद्धविराम, बंधकों की वापसी और फिलिस्तीनी राज्य का भविष्य आने वाले समय में वैश्विक राजनीति का सबसे संवेदनशील मुद्दा बना रहेगा।

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